नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली की कैंट विधानसभा सीट पर राजनीतिक हलचल लगातार तेज होती जा रही है। आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर जहां विभिन्न दलों के नेता अपनी-अपनी रणनीति बनाने में जुटे हैं, वहीं समाजवादी पार्टी के पूर्व प्रत्याशी और पार्टी टिकट के प्रबल दावेदार माने जा रहे राजेश अग्रवाल ने एक ऐसी पहल शुरू की है, जिसने राजनीतिक गलियारों के साथ-साथ आम जनता के बीच भी खास चर्चा पैदा कर दी है। इस पहल का नाम है — ‘अधिकार लेने की पंचायत’।
रविवार को माधोबाड़ी स्थित पार्टी पैलेस हॉल में इसकी शुरुआत हुई। कार्यक्रम में समाजवादी पार्टी के महानगर अध्यक्ष शमीम खां सुल्तानी विशेष रूप से मौजूद रहे। बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों, महिलाओं, युवाओं और बुजुर्गों ने पंचायत में भाग लेकर अपनी समस्याएं रखीं। शुरुआत से ही कार्यक्रम का माहौल ऐसा दिखाई दिया मानो यह कोई सामान्य राजनीतिक बैठक नहीं, बल्कि जनता और नेता के बीच सीधा संवाद हो।

जनता के अधिकारों को केंद्र में रखकर बनाई नई रणनीति
राजेश अग्रवाल की यह पहल केवल चुनावी कार्यक्रम भर नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे जनता से सीधे जुड़ने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। पंचायत में पहुंचे लोगों ने राशन, पेंशन, बिजली, पानी, सड़क, आवास, स्वास्थ्य सेवाओं और सरकारी योजनाओं से जुड़ी कई समस्याएं सामने रखीं। कई लोगों ने यह भी कहा कि उन्हें आज तक यह जानकारी ही नहीं थी कि वे किन सरकारी योजनाओं का लाभ पाने के हकदार हैं।
इसी मुद्दे को केंद्र में रखते हुए राजेश अग्रवाल ने कहा कि उनके इलाके में बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जिन्हें अपने अधिकारों की जानकारी तक नहीं है। जानकारी के अभाव में लोग वर्षों तक परेशान होते रहते हैं। उन्होंने कहा कि सिर्फ भाषण देने या आश्वासन बांटने से हालात नहीं बदलते, बल्कि लोगों को यह समझाना जरूरी है कि उनका अधिकार क्या है और उसे हासिल कैसे किया जाए।
राजेश अग्रवाल के मुताबिक, “जब तक आम आदमी अपने अधिकार नहीं समझेगा, तब तक वह व्यवस्था से अपना हक नहीं ले पाएगा। इसलिए हमने अधिकार लेने की पंचायत शुरू की है, ताकि लोगों को उनके अधिकारों की जानकारी भी मिले और उनकी समस्याओं का समाधान भी हो।”

तीन दशक पुराने जनसेवा के काम को मिला नया नाम
राजेश अग्रवाल की राजनीति केवल चुनावी मौसम तक सीमित नहीं रही है। इलाके के लोग बताते हैं कि वह पिछले लगभग तीन दशकों से जन समस्याओं के समाधान और जरूरतमंदों की मदद में सक्रिय रहे हैं। चाहे किसी गरीब का इलाज कराना हो, किसी की पेंशन लगवानी हो, बिजली विभाग या नगर निगम से जुड़े मामलों में अधिकारियों तक बात पहुंचानी हो, राजेश अग्रवाल लगातार ऐसे मामलों में सक्रिय दिखाई देते रहे हैं।
अब उसी काम को उन्होंने संगठित रूप देकर ‘अधिकार लेने की पंचायत’ का नाम दिया है। यही वजह है कि इस पहल को जनता के बीच अच्छी प्रतिक्रिया मिलती दिखाई दे रही है। पंचायत में पहुंचे कई लोगों का कहना था कि पहली बार कोई नेता केवल वोट मांगने नहीं, बल्कि उनकी बात सुनने और समाधान कराने के लिए आया है।
कार्यक्रम में मौजूद लोगों ने खुलकर अपनी समस्याएं रखीं। कुछ समस्याओं का समाधान पहले ही कराया जा चुका था, जिसकी जानकारी पंचायत में दी गई। वहीं कई नई समस्याओं को लेकर राजेश अग्रवाल ने तुरंत संबंधित विभागों से संपर्क करने और समाधान की प्रक्रिया शुरू करने की बात कही।

चुनावी माहौल में बढ़ती सक्रियता
बरेली कैंट विधानसभा सीट हमेशा से राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती रही है। इस सीट पर हर चुनाव में मुकाबला दिलचस्प रहता है। ऐसे में राजेश अग्रवाल की लगातार बढ़ती सक्रियता ने राजनीतिक समीकरणों को नई दिशा दे दी है।
पिछले कुछ समय में उन्होंने कई जनआंदोलनों के जरिए अपनी अलग पहचान बनाई है। चौपला बदायूं रोड रेल अंडरपास का मुद्दा हो या स्थानीय समस्याओं को लेकर धरना-प्रदर्शन, राजेश अग्रवाल लगातार जनता के बीच सक्रिय नजर आए हैं। यही कारण है कि उनकी छवि केवल एक पारंपरिक नेता की नहीं, बल्कि संघर्ष करने वाले नेता की बनती जा रही है।
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि राजेश अग्रवाल ने जनता के बीच जिस तरह लगातार मौजूदगी बनाए रखी है, उससे वह कैंट सीट पर समाजवादी पार्टी के सबसे मजबूत चेहरों में शामिल हो चुके हैं। खास बात यह भी है कि उनकी राजनीति केवल किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं दिखाई देती। विभिन्न समुदायों के बीच उनकी पहुंच लगातार बढ़ती नजर आ रही है।

विरोधियों पर भारी पड़ती दिख रही रणनीति
चुनावी मैदान में इस समय कई नेता सक्रिय हैं, लेकिन राजेश अग्रवाल की रणनीति उन्हें अलग पहचान देती दिखाई दे रही है। जहां कई नेता केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित हैं, वहीं राजेश अग्रवाल सीधे जनता के बीच पहुंचकर उनकी समस्याओं पर काम कर रहे हैं। इसका असर भी साफ दिखाई दे रहा है।
राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि उन्होंने अपने काम और जनआंदोलनों के दम पर इतनी बड़ी राजनीतिक लकीर खींच दी है कि अन्य कई दावेदार फिलहाल उनके मुकाबले कमजोर दिखाई पड़ रहे हैं। खासकर हिन्दू चेहरों में फिलहाल ऐसा कोई नाम नहीं दिख रहा जो जनसंपर्क और सक्रियता के मामले में उनके बराबर नजर आए।
हालांकि राजनीति केवल जनसेवा और सक्रियता से ही नहीं चलती। टिकट की दौड़ में संगठनात्मक समीकरण, जातीय संतुलन, पार्टी नेतृत्व की पसंद और अंदरूनी रणनीतियां भी अहम भूमिका निभाती हैं। यही कारण है कि राजेश अग्रवाल के समर्थक उन्हें मजबूत दावेदार मान रहे हैं, लेकिन राजनीतिक जानकार यह भी कहते हैं कि अंतिम फैसला पार्टी नेतृत्व और चुनावी समीकरणों पर निर्भर करेगा।
पंचायत बनी जनता और नेता के बीच सीधा संवाद
‘अधिकार लेने की पंचायत’ की सबसे खास बात यह रही कि इसमें औपचारिक राजनीतिक भाषण कम और संवाद ज्यादा देखने को मिला। लोग खुलकर अपनी बात रखते नजर आए। कई महिलाओं ने घरेलू समस्याओं और सरकारी योजनाओं में आ रही दिक्कतों को सामने रखा। युवाओं ने रोजगार और शिक्षा से जुड़े मुद्दे उठाए। बुजुर्गों ने पेंशन और स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर अपनी परेशानी बताई।
राजेश अग्रवाल हर व्यक्ति की बात ध्यान से सुनते नजर आए। कई मामलों में उन्होंने तुरंत नोट बनवाए और टीम को समाधान की जिम्मेदारी सौंपी। यही वजह रही कि कार्यक्रम खत्म होने के बाद भी लोगों के बीच इस पहल को लेकर चर्चा बनी रही।
कैंट सीट की राजनीति में नया प्रयोग
बरेली कैंट की राजनीति में लंबे समय बाद ऐसा प्रयोग देखने को मिल रहा है जिसमें जनता को केवल श्रोता नहीं, बल्कि सहभागी बनाने की कोशिश की जा रही है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह अभियान लगातार जारी रहा तो इसका असर आने वाले चुनाव में दिखाई दे सकता है।
राजेश अग्रवाल जिस तरह जनता के अधिकारों को मुद्दा बना रहे हैं, उससे उनकी राजनीति को सामाजिक सरोकारों से जोड़कर देखा जा रहा है। यह पहल उन्हें केवल एक उम्मीदवार नहीं, बल्कि जनसरोकार वाले नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश भी मानी जा रही है।
फिलहाल इतना तय माना जा रहा है कि बरेली कैंट की चुनावी लड़ाई में राजेश अग्रवाल ने अपनी मौजूदगी मजबूती से दर्ज करा दी है। आने वाले दिनों में यह ‘अधिकार लेने की पंचायत’ कितनी बड़ी राजनीतिक ताकत बनती है, इस पर सबकी नजर बनी रहेगी।




