नीरज सिसौदिया, बरेली
उत्तर प्रदेश की राजनीति में अक्सर यह सवाल उठता रहा है कि चुनाव के अलावा राजनीतिक दलों के कार्यालय आखिर कितने सक्रिय रहते हैं। आमतौर पर जनता की धारणा यही बनती है कि पार्टी दफ्तर केवल बैठकों, बयानबाजी और चुनावी रणनीति तक सीमित रह जाते हैं। लेकिन बरेली महानगर में समाजवादी पार्टी ने इस परंपरा को बदलने की दिशा में एक नया प्रयोग शुरू किया है। यह प्रयोग केवल संगठनात्मक बदलाव नहीं, बल्कि पार्टी की कार्यशैली को पूरी तरह बदलने की कोशिश माना जा रहा है।
समाजवादी पार्टी के महानगर अध्यक्ष शमीम खां सुल्तानी ने महानगर इकाई में एक ऐसी व्यवस्था लागू की है, जिसने पार्टी कार्यालय को केवल राजनीतिक अड्डे से आगे बढ़ाकर “जनसुनवाई और त्वरित कार्रवाई केंद्र” बनाने की कोशिश शुरू कर दी है। इसके तहत महानगर के पदाधिकारियों, पार्षदों, प्रकोष्ठ अध्यक्षों और अन्य जिम्मेदार नेताओं की सप्ताह के हर दिन ड्यूटी तय कर दी गई है। अब रोजाना सुबह 11 बजे से शाम 5 बजे तक पार्टी के जिम्मेदार नेता कार्यालय में मौजूद रहेंगे।
सबसे खास बात यह है कि यह व्यवस्था केवल मौखिक निर्देशों तक सीमित नहीं है। बाकायदा लिखित ड्यूटी चार्ट जारी किया गया है, जिसमें रविवार से शनिवार तक अलग-अलग नेताओं की जिम्मेदारी तय की गई है। कौन नेता किस दिन कार्यालय में बैठेगा, कौन जनता की समस्याएं सुनेगा, कौन संगठनात्मक कार्यों को देखेगा और किसे तत्काल मौके पर पहुंचना होगा—सब कुछ तय कर दिया गया है।
गपशप से जनसंपर्क केंद्र तक का सफर
समाजवादी पार्टी कार्यालय में पहले भी नेताओं का आना-जाना लगा रहता था। कोई सुबह आता था, कोई दोपहर में, तो कोई सिर्फ औपचारिक उपस्थिति दर्ज कराकर चला जाता था। कई बार पार्टी कार्यकर्ता या आम लोग अपनी समस्या लेकर पहुंचते थे, लेकिन संबंधित जिम्मेदार नेता उपलब्ध नहीं होते थे। इससे संगठन की सक्रियता पर सवाल उठते थे और कार्यालय की उपयोगिता सीमित होकर रह जाती थी।
शमीम खां सुल्तानी ने इसी अव्यवस्था को सबसे पहले चिन्हित किया। उन्होंने महसूस किया कि यदि पार्टी को विधानसभा चुनाव से पहले मजबूत संगठनात्मक ढांचे में बदलना है तो नेताओं की जवाबदेही तय करनी होगी। इसी सोच के साथ उन्होंने कार्यालय व्यवस्था को व्यवस्थित और अनुशासित रूप देने का फैसला किया।
अब स्थिति यह होगी कि यदि कोई व्यक्ति नगर निगम की समस्या लेकर पार्टी कार्यालय पहुंचता है तो संबंधित पार्षद या नेता उसी समय उपलब्ध रहेगा। अगर किसी मोहल्ले में सफाई, पानी, सड़क, बिजली या अतिक्रमण जैसी शिकायत होगी तो तुरंत संबंधित प्रतिनिधि सक्रिय हो सकेगा। इसी तरह यदि शहर में कोई बड़ा सामाजिक, प्रशासनिक या राजनीतिक मुद्दा पैदा होता है तो पार्टी की टीम तत्काल मौके पर पहुंच सकेगी।

चुनावी तैयारी से कहीं बड़ा है यह प्रयोग
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह व्यवस्था केवल कार्यालय संचालन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आगामी विधानसभा चुनाव की रणनीति का हिस्सा भी है। समाजवादी पार्टी समझ चुकी है कि केवल सोशल मीडिया या बड़े कार्यक्रमों से चुनाव नहीं जीते जाते। जनता के बीच लगातार मौजूद रहना और छोटी-छोटी समस्याओं में साथ खड़ा होना अब राजनीति की सबसे बड़ी जरूरत बन चुका है।
बरेली महानगर में भाजपा का मजबूत संगठन लंबे समय से सक्रिय माना जाता रहा है। ऐसे में समाजवादी पार्टी भी अब अपने संगठन को बूथ स्तर तक सक्रिय और जवाबदेह बनाने की कोशिश कर रही है। शमीम खां सुल्तानी का यह मॉडल उसी दिशा में उठाया गया कदम माना जा रहा है।
इस व्यवस्था से एक और बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। अब पार्टी कार्यकर्ताओं को भी यह पता रहेगा कि किस दिन कौन नेता कार्यालय में मिलेगा। इससे कार्यकर्ताओं की भागीदारी बढ़ेगी और संगठन में समन्वय बेहतर होगा। अभी तक कई बार कार्यकर्ता यह शिकायत करते थे कि पार्टी कार्यालय पहुंचने पर जिम्मेदार लोग नहीं मिलते। नई व्यवस्था इस दूरी को कम कर सकती है।
हर दिन अलग टीम, हर दिन अलग जिम्मेदारी
जारी ड्यूटी चार्ट के अनुसार सप्ताह के सातों दिन अलग-अलग टीमों को जिम्मेदारी दी गई है। इनमें महानगर उपाध्यक्ष, सचिव, पार्षद, विधानसभा अध्यक्ष और विभिन्न प्रकोष्ठों के अध्यक्ष शामिल हैं।
रविवार को शेर सिंह गंगवार, डॉ. अमित सक्सेना, हसीब खान, शमीम अहमद, सलीम अंसारी, संजय वर्मा, अनुज आनंद वाल्मीकि, विक्रांत सिंह पाल, खलीक उर रहमान और के. पी. सिंह राठौर को जिम्मेदारी दी गई है।
सोमवार को दिनेश यादव, मो. आरिफ कुरैशी, रईस मियां अब्बासी, मो. वसीम, मोहित सक्सेना, दीपक यादव और रेहान रजा खान कार्यालय संभालेंगे।
मंगलवार की टीम में गोविंद सैनी, अनिल जौहरी, अलीम सुल्तानी, इकबाल बिल्डर, सय्यद जमील अहमद, युधिष्ठिर पाल सिंह, नाजिम कुरैशी और मेराज अंसारी शामिल हैं।
बुधवार को राजेश मौर्य, समयुन खान, सनी मिर्जा, हरिओम प्रजापति, इसराफिल खान राशमी, चंद्रसेन पाल, नीरज गुप्ता और आदित्य कश्यप जिम्मेदारी निभाएंगे।
बृहस्पतिवार को रामप्रकाश यादव, अब्दुल कय्यूम खां मुन्ना, मो. शाकिर, धीरज यादव हैप्पी, ऋषि यादव, रियाज हुसैन रजा, रमीज हाशमी, सरताज गजल अंसारी और अमित गिहार की ड्यूटी लगाई गई है।
शुक्रवार को राजेश अग्रवाल, रईस मियां अब्बासी, गुल बशर अंसारी, महेश यादव, राशिद अहमद गाजी, अहमद खान टीटू, मो. अफसान खान, अशफाक चौधरी और सुनील सागर मौजूद रहेंगे।
शनिवार को अनुज गंगवार, डॉक्टर शफीक उद्दीन, गौरव सक्सेना, सलीम पटवारी, ओमान रजा, दीपक वाल्मीकि, ऋषि राम यादव, रेहान अंसारी, बाबर अली उर्फ डॉ. चांद और मोहसिन खान को जिम्मेदारी दी गई है।
सपा के भीतर भी हो रही चर्चा
महानगर अध्यक्ष की इस नई व्यवस्था की चर्चा अब पार्टी के भीतर भी तेजी से हो रही है। कई पुराने नेताओं का मानना है कि लंबे समय बाद महानगर संगठन में ऐसा प्रयोग देखने को मिला है, जिसमें केवल नारे नहीं बल्कि कार्यशैली बदलने की कोशिश दिखाई दे रही है।
कुछ नेताओं का कहना है कि इससे संगठन में अनुशासन बढ़ेगा। वहीं कुछ लोग इसे “फुल टाइम पॉलिटिक्स मॉडल” के रूप में भी देख रहे हैं, जहां पार्टी नेता केवल चुनावी मौसम में नहीं बल्कि पूरे साल जनता के बीच सक्रिय रहेंगे।
राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में यह प्रयोग सफल रहा तो अन्य जिलों में भी इसी तरह की व्यवस्था लागू की जा सकती है। खासकर शहरी राजनीति में जहां जनता सीधे पार्षदों और स्थानीय नेताओं से जवाब चाहती है, वहां इस तरह की व्यवस्था राजनीतिक लाभ दे सकती है।
जनता से सीधा संवाद बनाने की कोशिश
समाजवादी पार्टी लंबे समय से यह आरोप झेलती रही है कि सत्ता से बाहर होने के बाद उसका संगठन उतना सक्रिय नहीं रहता जितना चुनावी दौर में दिखाई देता है। नई व्यवस्था इसी धारणा को बदलने का प्रयास भी मानी जा रही है।
शमीम खां सुल्तानी की रणनीति साफ दिखाई दे रही है—पार्टी कार्यालय को जनता से जोड़ो, नेताओं को जवाबदेह बनाओ और कार्यकर्ताओं को सक्रिय रखो। यदि कोई व्यक्ति अपनी समस्या लेकर आता है तो उसे कम से कम यह भरोसा तो हो कि वहां कोई जिम्मेदार व्यक्ति मौजूद मिलेगा।
इस व्यवस्था से पार्टी को राजनीतिक लाभ मिले या नहीं, यह आने वाला समय बताएगा। लेकिन इतना तय है कि समाजवादी पार्टी ने बरेली महानगर में संगठनात्मक राजनीति का एक नया प्रयोग जरूर शुरू कर दिया है। ऐसे दौर में जब अधिकांश राजनीतिक कार्यालय केवल पोस्टर, प्रेस कॉन्फ्रेंस और बयानबाजी तक सीमित नजर आते हैं, तब किसी दल का अपने नेताओं की बाकायदा ड्यूटी तय करना अपने आप में अलग पहल मानी जा रही है।
अब देखने वाली बात यह होगी कि यह प्रयोग केवल कुछ महीनों तक सीमित रहता है या वास्तव में समाजवादी पार्टी की नई कार्यसंस्कृति बन पाता है। फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि बरेली में समाजवादी पार्टी ने “नई हवा” का संदेश देने की कोशिश शुरू कर दी है।




