नीरज सिसौदिया, बरेली
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने बरेली में लगातार बढ़ रही गुटबाजी को नियंत्रित करने और संगठन को एकजुट करने के इरादे से शुभलेश यादव को दूसरी बार जिला अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी सौंपी थी। पार्टी नेतृत्व को उम्मीद थी कि शुभलेश यादव अपनी स्वीकार्यता और अनुभव के दम पर जिले में बिखरे संगठन को एक मंच पर लाएंगे। लेकिन कुछ ही हफ्तों में हालात ऐसे बन गए हैं कि जिस गुटबाजी को खत्म करने के लिए उन्हें जिला अध्यक्ष बनाया गया था, वही गुटबाजी अब पहले से ज्यादा खतरनाक रूप धारण करती दिखाई दे रही है। बता दें कि वर्ष 2017 में भी शुभलेश यादव संगठन को सही तरीके से चला पाने में नाकाम रहे थे जिसकी वजह से पार्टी को बरेली जिले में इतिहास की सबसे बड़ी हार मिली थी और पार्टी जिले की सभी नौ सीटों पर हार गई थी जबकि वर्ष 2022 के चुनाव में शिवचरण कश्यप की अध्यक्षता में पार्टी ने दो विधानसभा सीटों पर जीत हासिल की जबकि इन दोनों ही सीटों पर वही पुराने उम्मीदवार ही मैदान में थे जो शुभलेश यादव के कार्यकाल में थे। अब एक बार फिर वही 2017 वाली स्थिति उत्पन्न होती नजर आ रही है। ऐसा न हो कि एक बार फिर इतिहास की सबसे बड़ी हार शुभलेश यादव के नाम दर्ज हो जाए।
वर्तमान में स्थिति यह है कि पहले केवल यादव नेताओं का एक वर्ग नाराज था, लेकिन अब संगठन के निवर्तमान जोन प्रभारी, विधानसभा स्तर के पदाधिकारी और कई टिकट के दावेदार भी असंतोष जताने लगे हैं। पार्टी के भीतर चर्चा है कि शुभलेश यादव की कार्यशैली ने गुटबाजी को खत्म करने के बजाय उसे और अधिक संस्थागत रूप दे दिया है।
बरेली जिले की नौ विधानसभा सीटों में से सात सीटों पर संगठनात्मक संघर्ष की चर्चा खुलकर होने लगी है। कहीं मुस्लिम नेतृत्व खुद को उपेक्षित महसूस कर रहा है तो कहीं यादव नेताओं का एक वर्ग नाराज है। पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं का कहना है कि पहले गुटबाजी सीमित दायरे में थी, लेकिन अब यह विधानसभा स्तर तक फैल चुकी है।
इस विवाद की शुरुआत मीरगंज से मानी जा रही है, जहां निवर्तमान विधानसभा उपाध्यक्ष ने सोशल मीडिया पर सार्वजनिक पत्र जारी कर संगठन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए थे। उस समय इसे व्यक्तिगत नाराजगी माना गया था, लेकिन बाद की घटनाओं ने साबित कर दिया कि मामला केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं था।

विगत गुरुवार 4 जून को फरीदपुर में आयोजित जोन प्रभारियों की बैठक ने सपा की अंदरूनी लड़ाई को पूरी तरह सार्वजनिक कर दिया। संगठनात्मक बैठक के रूप में आयोजित इस कार्यक्रम में जो कुछ हुआ, उसने पार्टी के भीतर चल रही खींचतान को और उजागर कर दिया।
बैठक निवर्तमान विधानसभा क्षेत्र अध्यक्ष बलराम सिंह यादव के सौजन्य से आयोजित की गई थी। हालांकि पोस्टरों और बैनरों को देखकर कई नेताओं ने सवाल उठाए। पोस्टरों में बलराम सिंह यादव के नाम के आगे ‘निवर्तमान’ शब्द तक नहीं लिखा गया था। इससे भी ज्यादा चर्चा इस बात की रही कि जोन प्रभारियों की बैठक के पोस्टरों में जोन प्रभारियों की तस्वीरें तक नहीं थीं।
संगठन के कई नेताओं का कहना है कि बैठक जोन प्रभारियों की कम और टिकट दावेदारों की ज्यादा लग रही थी। पोस्टरों और कार्यक्रम में जिन चेहरों को प्रमुखता मिली, उनमें पिछले तीन चुनाव लगातार हार चुके विजयपाल सिंह, कल्पना सागर, बिजेंद्र माथुर और अन्य दावेदार शामिल थे। पिछले चुनाव में सपा से बगावत कर बसपा के टिकट पर चुनाव लड़कर वोटकटवा बनीं शालिनी सिंह भले बैठक में नहीं पहुंचीं, लेकिन बैनर पर उनकी मौजूदगी जरूर नजर आई। एकमात्र चंद्रसेन सागर ही ऐसे दावेदार थे जो न तो पोस्टरों में नजर आए और न ही मंच पर। उनसे जब इसकी वजह पूछी गई तो उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि वह जिला अध्यक्ष शुभलेश यादव के उस आदेश का पालन कर रहे थे जिसमें शुभलेश ने कहा था कि जोन प्रभारियों और सेक्टर प्रभारियों की बैठक में टिकट का कोई भी दावेदार शामिल नहीं होगा और मुझे आधिकारिक तौर पर इस बैठक की सूचना भी नहीं दी गई थी। हालांकि, शुभलेश यादव ने रजऊ में हुई बैठक में अपने इस आदेश का पालन भी किया था जहां टिकट का कोई भी दावेदार शामिल नहीं हुआ था।

बैठक का एक और चर्चित पहलू फरीदपुर विधानसभा सीट के टिकट दावेदार इंद्रपाल सागर रहे। पार्टी सूत्रों के मुताबिक शुभलेश यादव उन्हें बरेली से अपने साथ लेकर फरीदपुर पहुंचे थे। संगठन के भीतर इसे लेकर तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गईं। विरोधी खेमे के नेताओं ने सवाल उठाया कि जब बैठक संगठनात्मक थी तो किसी एक टिकट दावेदार को विशेष महत्व क्यों दिया गया? कई नेताओं ने इसे राजनीतिक संदेश के रूप में देखा और दावा किया कि इससे दूसरे दावेदारों में असहजता बढ़ी है।
बैठक के दौरान एक और घटना ने सियासी गलियारों में खूब चर्चा बटोरी। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, शुभलेश यादव एक महिला टिकट दावेदार से बातचीत के दौरान कथित रूप से यह कहते सुनाई दिए, “भाभी जी मटन बहुत अच्छा बनाती हैं, लेकिन आज वीरवार है इसलिए आज मटन नहीं खाएंगे।”
यह टिप्पणी कार्यक्रम के बाद पूरे संगठन में चर्चा का विषय बन गई। विरोधी खेमे के नेताओं ने इसे लेकर तंज कसने शुरू कर दिए। कुछ नेताओं का कहना है कि जब पार्टी संगठन गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा हो, तब जिला अध्यक्ष की प्राथमिकताएं अलग दिखाई दे रही हैं। कुछ ने यह भी सवाल उठाए कि लगता है शुभलेश यादव भाभी जी के हाथों का मटन कई बार खा चुके हैं और इसलिए उनका स्वाद भी जानते हैं।
बैठक में मौजूद नेताओं के बीच यह चर्चा भी जोर पकड़ती रही कि शुभलेश यादव एक बार फिर फरीदपुर विधानसभा सीट से विजयपाल सिंह की दावेदारी को आगे बढ़ाना चाहते हैं। हालांकि इस संबंध में शुभलेश यादव की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन पार्टी के अंदर यह चर्चा लगातार चल रही है।
दिलचस्प यह है कि विजयपाल सिंह पिछले तीन विधानसभा चुनाव हार चुके हैं। ऐसे में उनकी संभावित दावेदारी को लेकर संगठन के भीतर पहले से ही मतभेद मौजूद हैं। फरीदपुर में हुई बैठक के बाद ये मतभेद और खुलकर सामने आने लगे हैं।
बैठक खत्म होने के बाद असली राजनीतिक विस्फोट हुआ। पूर्व जिला सचिव कप्तान सिंह यादव ने एक व्हाट्सऐप ग्रुप में पोस्टर को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दर्ज कराई।
उन्होंने एडवोकेट जितेंद्र द्वारा बनाए गए वॉट्सऐप ग्रुप में बैठक में लगाया गया एक बैनर की फोटो शेयर करते हुए लिखा, ‘इस पोस्टर को जिसने भी बनवाया है। उनको बहुत-बहुत बधाई और आभार। इससे उनकी मानसिकता का आभास होता है और यह भी सिद्ध होता है कि अगर आगे भी ऐसे पोस्टर बनते रहे तो 2022 की पुनरावृत्ति होना 100% तय है। इसका शीर्षक बनाया गया है जोनवार बैठक जबकि इस पोस्टर में किसी भी जोन प्रभारी या विधानसभा महासचिव या अन्य किसी विधानसभा के पदाधिकारी का फोटो न लगाकर उनके साहस और मान सम्मान को जान-बूझ कर ठेस पहुंचाने का काम किया गया है। सभी जिम्मेदार संगठन के पदाधिकारियों को इस पर संज्ञान लेकर इस गलती में सुधार लाना चाहिए। यदि हम लोगों को वर्ष 2027 का चुनाव जीतना है और सरकार बनानी है तब। अन्यथा जो हो रहा है वह बहुत अच्छा हो रहा है और आगे जो होगा वो और भी अच्छा होगा।’
कप्तान सिंह यादव की प्रतिक्रिया को संगठन के भीतर व्यापक समर्थन मिलता दिखाई दिया। कई निवर्तमान जोन प्रभारी और पदाधिकारी भी निजी बातचीत में नाराजगी जाहिर करते नजर आए। उनका कहना है कि संगठन के वास्तविक कार्यकर्ताओं की उपेक्षा की जा रही है जबकि टिकट के दावेदारों को मंच पर प्रमुखता मिल रही है। यही वजह है कि नई जिला कार्यकारिणी के गठन को लेकर भी आशंकाएं बढ़ गई हैं। पार्टी के अंदर माना जा रहा है कि यदि कार्यकारिणी के गठन में संतुलन नहीं रखा गया तो बगावत और खुलकर सामने आ सकती है।
‘शुभलेश को खुश करो, टिकट पाओ’ की चर्चा ने बढ़ाई बेचैनी
सबसे गंभीर चर्चा टिकट वितरण को लेकर चल रही है। पार्टी के कई नेताओं का दावा है कि कुछ तथाकथित दलाल और बिचौलिये संभावित टिकट दावेदारों के बीच यह संदेश फैला रहे हैं कि इस बार जनता के बीच काम करने, संगठन मजबूत करने या सर्वे रिपोर्ट की कोई खास अहमियत नहीं होगी क्योंकि जो आईपैक एजेंसी सर्वे कर रही थी उसके साथ तो सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने करार पहले ही तोड़ दिया है। इन लोगों द्वारा कथित तौर पर कहा जा रहा है कि अगर टिकट चाहिए तो जिला अध्यक्ष शुभलेश यादव को खुश रखो। टिकट का रास्ता जनता से नहीं बल्कि जिला अध्यक्ष के दरवाजे से होकर जाता है।
इतना ही नहीं, यह तक कहा जा रहा है कि पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव टिकट वितरण में शुभलेश यादव की राय को ही प्राथमिकता देंगे। इसलिए जो नेता शुभलेश यादव के नजदीक रहेगा, टिकट उसी की झोली में जाएगा। इन चर्चाओं ने संगठन के भीतर बेचैनी को और बढ़ा दिया है। टिकट दावेदारों का एक वर्ग अब जनता के बीच संघर्ष करने की बजाय जिला अध्यक्ष के करीब पहुंचने की कोशिशों में जुटा दिखाई दे रहा है।
2027 से पहले सपा के लिए खतरे की घंटी
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बरेली में समाजवादी पार्टी के सामने भाजपा या अन्य दलों से बड़ी चुनौती फिलहाल उसकी अपनी अंदरूनी राजनीति बनती जा रही है। शुभलेश यादव को गुटबाजी खत्म करने के मिशन के साथ जिला अध्यक्ष बनाया गया था, लेकिन मौजूदा हालात में उनके कार्यकाल में गुटबाजी और गहरी होती दिखाई दे रही है।
फरीदपुर की बैठक ने यह साफ संकेत दे दिया है कि संगठन के भीतर असंतोष अब दबा हुआ नहीं है। यदि जल्द ही इसे नियंत्रित नहीं किया गया तो नई कार्यकारिणी के गठन और टिकट वितरण की प्रक्रिया के दौरान यह संघर्ष और विकराल रूप ले सकता है।
फिलहाल बरेली सपा में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या शुभलेश यादव संगठन को एकजुट कर पाएंगे, या फिर उनकी दूसरी पारी बरेली समाजवादी राजनीति में गुटबाजी के नए काले अध्याय के रूप में दर्ज होगी। अभी तक के घटनाक्रम तो दूसरे विकल्प की ओर इशारा करते नजर आ रहे हैं।
इन सभी मामलों में जब सपा जिला अध्यक्ष शुभलेश यादव से उनका पक्ष जानने का प्रयास किया गया तो उनसे संपर्क नहीं हो सका।




