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मंदिर से निकला पीडीए का संदेश: डॉ. अनीस बेग ने बरेली कैंट की राजनीति में खोला सामाजिक संवाद का नया अध्याय, मढ़ीनाथ के संतोषी माता मंदिर में महापंचायत के जरिए दिया समावेशी राजनीति का संकेत, धर्म नहीं बल्कि सामाजिक भागीदारी बनी चर्चा का केंद्र

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नीरज सिसौदिया, बरेली

बरेली की राजनीति में पिछले कुछ वर्षों से एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। पहले जहां चुनावी राजनीति मुख्य रूप से जातीय समीकरणों, धार्मिक पहचान और परंपरागत वोट बैंक के इर्द-गिर्द घूमती थी, वहीं अब राजनीतिक दल और नेता सामाजिक स्वीकार्यता के नए रास्ते तलाशते दिखाई दे रहे हैं। मढ़ीनाथ स्थित संतोषी माता मंदिर परिसर में रविवार को आयोजित पीडीए महापंचायत को इसी बदलती राजनीति के संदर्भ में देखा जा रहा है।


बरेली कैंट विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के टिकट के प्रबल दावेदार और बरेली में गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल बन चुके डॉक्टर अनीस बेग की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम को केवल एक राजनीतिक सभा या चुनावी शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखना शायद इसके व्यापक संदेश को सीमित कर देना होगा। दरअसल, यह आयोजन उस सामाजिक संवाद का प्रतीक बनकर सामने आया, जिसमें विभिन्न वर्गों और समुदायों के लोगों ने एक मंच पर बैठकर सामाजिक भागीदारी और राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर चर्चा की।


कार्यक्रम के केंद्र में रहे डॉ. अनीस बेग। एक मुस्लिम समाज से आने वाले नेता के रूप में उनका किसी मंदिर परिसर में आयोजित सामाजिक-राजनीतिक संवाद में प्रमुख भूमिका निभाना स्वाभाविक रूप से चर्चा का विषय बना। लेकिन इस पूरे आयोजन की विशेषता यह रही कि यहां धार्मिक गतिविधि और राजनीतिक गतिविधि के बीच स्पष्ट मर्यादा दिखाई दी। कार्यक्रम का उद्देश्य मंदिर परिसर जैसे सामाजिक रूप से सम्मानित और सार्वजनिक स्थल पर विभिन्न वर्गों के लोगों को एक साथ लाकर संवाद स्थापित करना था।


भारतीय समाज में मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थान भर नहीं रहे हैं। गांवों और कस्बों में मंदिर, धर्मशालाएं और सामुदायिक स्थल लंबे समय से सामाजिक बैठकों, जनकल्याण कार्यक्रमों और सामुदायिक विमर्श के केंद्र भी रहे हैं। मढ़ीनाथ का यह आयोजन भी उसी परंपरा का विस्तार दिखाई देता है, जहां चर्चा का केंद्र धार्मिक विषय नहीं बल्कि सामाजिक भागीदारी, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और जनसरोकार रहे। यहां सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे मुद्दे गूंजते सुनाई दिए। कार्यक्रम में उपस्थित नेताओं और कार्यकर्ताओं ने सामाजिक न्याय, भागीदारी और समाज के विभिन्न वर्गों को साथ लेकर चलने की बात की। यही कारण है कि इस कार्यक्रम को सामाजिक संवाद की नई पहल के रूप में देखा जा रहा है।


कार्यक्रम में समाजवादी पार्टी के जिला अध्यक्ष शुभलेश यादव, महानगर अध्यक्ष शमीम खां सुल्तानी, महिला सभा जिला अध्यक्ष स्मिता यादव, नगर निगम पार्षद दल के नेता गौरव सक्सेना, गुरु प्रसाद काले, व्यापार सभा महानगर अध्यक्ष नीरज गुप्ता, कैंट प्रभारी राजेश मौर्य, महानगर उपाध्यक्ष दिनेश यादव, महानगर उपाध्यक्ष एवं जोन प्रभारी राम प्रकाश यादव उर्फ लल्ला भैया, कैंट विधानसभा अध्यक्ष हरिओम प्रजापति, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष रोहित राजपूत, रणवीर सिंह जाटव, ज्ञान यादव, अक्षित यादव, मुकेश मौर्य, नवीन कश्यप, जावेद गद्दी, हैप्पी यादव, ऋषि यादव, अनुज मौर्य, एडवोकेट संजय वर्मा, बंटी यादव, उत्तम पटेल, निष्ठा पटेल, एडवोकेट जीतू यादव, दिलीप कुमार, जितेंद्र मुंडे, रामसेवक पटेल, हिमांशु राज, रामेंद्र यादव, दिलीप कन्नौजिया, सुधीर राजपूत, अमित मौर्य, डी.के. यादव, रामगोपाल वर्मा, बीना गौतम, आदिल बेग, पंडित दीपक शर्मा और चरण सिंह यादव समेत बड़ी संख्या में पदाधिकारी और कार्यकर्ता मौजूद रहे। इसके अलावा कुलदीप बाल्मीकि, प्रदीप बाल्मीकि, अनिल बाल्मीकि, नीरज बाल्मीकि, पंकज बाल्मीकि, यश बाल्मीकि, राघवेंद्र यादव, डॉ. सुशील, रोहित यादव सहित विभिन्न समाजों के सम्मानित लोगों की भागीदारी ने कार्यक्रम को व्यापक स्वरूप दिया।
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो इस आयोजन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसकी प्रतीकात्मकता है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में अक्सर धार्मिक पहचान को लेकर खींची गई रेखाएं चर्चा का विषय बनती रही हैं। ऐसे माहौल में यदि किसी मुस्लिम नेता की पहल पर मंदिर परिसर में विभिन्न वर्गों और समुदायों की संयुक्त बैठक होती है, तो यह संदेश भी जाता है कि सामाजिक संवाद की संभावनाएं अभी समाप्त नहीं हुई हैं।


डॉ. अनीस बेग के समर्थक इस आयोजन को उनकी राजनीतिक रणनीति से अधिक उनकी सामाजिक सोच का प्रतिबिंब मान रहे हैं। उनका तर्क है कि यदि कोई नेता केवल अपने समुदाय तक सीमित रहना चाहता है तो उसके लिए ऐसे आयोजन की कोई आवश्यकता नहीं होती। लेकिन जब कोई नेता समाज के विभिन्न वर्गों के बीच जाकर संवाद स्थापित करने का प्रयास करता है, तब वह अपनी राजनीतिक पहचान से आगे बढ़कर सामाजिक स्वीकार्यता की दिशा में कदम बढ़ाता है और अनीस बेग भी इसी सामाजिक समरसता को आगे बढ़ा रहे हैं। आज वह बरेली में दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की आवाज बनकर उन्हें जागरूक करने का काम कर रहे हैं।
बरेली कैंट विधानसभा सीट की राजनीतिक संरचना भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। यह क्षेत्र सामाजिक रूप से विविधतापूर्ण है, जहां सभी वर्गों और समुदायों की निर्णायक भूमिका रहती है। ऐसे में कोई भी नेता तभी व्यापक जनसमर्थन हासिल कर सकता है जब वह विभिन्न समूहों के बीच विश्वास का वातावरण बना सके। मढ़ीनाथ की पीडीए महापंचायत को इसी प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।


इस आयोजन ने एक और महत्वपूर्ण सवाल को सामने रखा है। क्या आज की राजनीति केवल वोट बैंक आधारित पहचान तक सीमित रहनी चाहिए, या फिर उसे सामाजिक संवाद और आपसी विश्वास के नए रास्ते भी तलाशने चाहिए? डॉ. अनीस बेग की यह पहल कम से कम इस बहस को जरूर आगे बढ़ाती है। यही वजह है कि मढ़ीनाथ संतोषी माता मंदिर में आयोजित यह महापंचायत केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं बल्कि सामाजिक सहभागिता, संवाद और समावेशी राजनीति के एक प्रयोग के रूप में देखी जा रही है। बरेली की राजनीति में ऐसे प्रयोग कम देखने को मिलते हैं, और शायद यही कारण है कि यह आयोजन सामान्य राजनीतिक बैठकों से अलग पहचान बनाने में सफल रहा है।


कैंट विधानसभा में टिकट की राजनीति आगे क्या मोड़ लेगी, यह भविष्य के गर्भ में है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि डॉ. अनीस बेग ने अपनी मेहनत और पीडीए विचार गोष्ठियों से लेकर महापंचायतों तक के माध्यम से खुद को केवल एक दावेदार के रूप में नहीं, बल्कि विभिन्न समुदायों के बीच संवाद स्थापित करने वाले नेता के रूप में स्थापित कर लिया है।

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