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फूल-मालाओं और केक कटिंग से आगे बढ़ा सपा प्रमुख अखिलेश यादव के जन्मदिन का जश्न : आर्थिक तंगी से जूझते बच्चों के सपनों का सहारा बने सपा नेता राजेश अग्रवाल, तत्काल दिलवाईं किताबें और स्कूल ड्रेस, सैकड़ों महिलाओं के सम्मान और जनसेवा के संगम ने जीते दिल

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नीरज सिसौदिया, बरेली

राजनीति अक्सर भाषणों, नारों और शक्ति प्रदर्शन तक सीमित दिखाई देती है, लेकिन कभी-कभी कुछ ऐसे पल भी आते हैं, जब जनप्रतिनिधि जनता के दर्द को केवल सुनते नहीं, बल्कि उसे अपना दर्द बनाकर उसका समाधान भी करते हैं। सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव के जन्मदिन को केवल राजनीतिक आयोजन तक सीमित न रखकर उनके जन्मदिन के दूसरे दिन बरेली कैंट विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के टिकट के प्रबल दावेदार, बरेली विकास प्राधिकरण (बीडीए) के सदस्य, पूर्व विधानसभा प्रत्याशी राजेश अग्रवाल ने इसे सेवा, संवेदना और सामाजिक सरोकारों का उत्सव बना दिया। एक ओर आर्थिक तंगी के कारण फीस, किताबों और स्कूल ड्रेस के अभाव में पढ़ाई छोड़ने की कगार पर पहुंचे बच्चों के भविष्य को संवारने की पहल की गई, तो दूसरी ओर समाज में उल्लेखनीय योगदान देने वाली सैकड़ों महिलाओं का सम्मान कर उन्हें नई पहचान देने का संदेश दिया गया। इस आयोजन ने यह भी दिखाया कि यदि राजनीति का उद्देश्य समाज के अंतिम व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान लाना हो, तो जन्मदिन जैसे अवसर भी जनसेवा का माध्यम बन सकते हैं।


होली चौराहा स्थित अग्रवाल धर्मशाला में राजेश अग्रवाल ने महिलाओं के सम्मान के साथ-साथ उन परिवारों की पीड़ा को केंद्र में रखा, जो बढ़ती महंगाई और आर्थिक संकट के बीच अपने बच्चों का भविष्य बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कार्यक्रम धीरे-धीरे एक सामाजिक अभियान में बदल गया, जहां सम्मान के साथ संवेदना भी थी और राजनीति के साथ मानवीय जिम्मेदारी भी।


आज ऐसे हजारों परिवार हैं, जिनके लिए स्कूल खुलने का मतलब केवल नई किताबें खरीदना नहीं, बल्कि फीस, यूनिफॉर्म, कॉपियां और अन्य खर्चों की चिंता भी है। कई घरों में माता-पिता यह तय नहीं कर पाते कि पहले रसोई चलाएं या बच्चे की फीस जमा करें। इसी दर्द को राजेश अग्रवाल ने कार्यक्रम के केंद्र में रखा। जब कुछ जरूरतमंद परिवारों ने बताया कि उनके बच्चे फीस जमा न होने के कारण स्कूल से बाहर होने की स्थिति में हैं, किसी के पास किताबें खरीदने के पैसे नहीं हैं तो किसी के पास स्कूल ड्रेस तक नहीं है, तब केवल सहानुभूति नहीं दिखाई गई, बल्कि मौके पर ही उनके समाधान की पहल की गई।


कार्यक्रम में जिन बच्चों की फीस बकाया थी, उनके लिए आर्थिक सहायता की व्यवस्था की गई। जिनके पास किताबें और ड्रेस नहीं थीं, उनके लिए भी तत्काल सहयोग सुनिश्चित किया गया। कई अभिभावकों की आंखों में राहत के आंसू साफ दिखाई दिए। उनके लिए यह केवल आर्थिक मदद नहीं थी, बल्कि इस भरोसे का एहसास भी था कि समाज में अब भी ऐसे लोग हैं जो गरीब के बच्चे की पढ़ाई को अपनी जिम्मेदारी समझते हैं।
किसी भी जनप्रतिनिधि की सबसे बड़ी पहचान चुनावी मंच नहीं, बल्कि संकट की घड़ी में जनता के साथ खड़े होने से बनती है। राजेश अग्रवाल का यह प्रयास भी उसी दिशा में देखा जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों से वे लगातार सामाजिक सरोकारों से जुड़े कार्यक्रमों के जरिए आम लोगों के बीच अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। यही कारण है कि शहर के सामाजिक और राजनीतिक हलकों में उनकी कार्यशैली की चर्चा लगातार बढ़ रही है।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में महिलाओं का सम्मान भी किया गया। महिलाओं को सम्मानित कर यह संदेश दिया गया कि परिवार और समाज की मजबूती में उनकी भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। यह आयोजन केवल औपचारिक सम्मान समारोह नहीं रहा, बल्कि समाज के उन वर्गों को केंद्र में लाने का प्रयास था, जिनकी आवाज अक्सर बड़े आयोजनों में दब जाती है।


अपने संबोधन में राजेश अग्रवाल ने कहा कि अखिलेश यादव की राजनीति हमेशा समाज के अंतिम व्यक्ति तक सम्मान और अधिकार पहुंचाने की रही है। यदि उनके जन्मदिवस पर किसी जरूरतमंद बच्चे की पढ़ाई बच जाए, किसी मां के चेहरे पर मुस्कान लौट आए और किसी गरीब परिवार को यह भरोसा मिल जाए कि समाज उसके साथ खड़ा है, तो इससे बड़ा उपहार कोई नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि समाज सेवा किसी अवसर की मोहताज नहीं होती और यह अभियान आगे भी लगातार जारी रहेगा।
कार्यक्रम की अध्यक्षता समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता दिनेश यादव ने की, जबकि मजदूर मंडल के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मण सिंह राणा ने मार्गदर्शन दिया। महेंद्र विक्रम सिंह के विशेष सहयोग और अरविंद राजपूत के प्रभावी संचालन ने कार्यक्रम को व्यवस्थित रूप दिया। बैंक ऑफ बड़ौदा के सेवानिवृत्त वरिष्ठ प्रबंधक अरुण शर्मा, पूर्व पार्षद सीताराम रघुवंशी, नीरज सैनी, कुलदीप राणा, श्याम कुमार, सूरज कुमार, अजय कुमार सहित अनेक कार्यकर्ताओं ने आयोजन को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


यह कार्यक्रम एक सवाल भी छोड़ गया- क्या राजनीति केवल सत्ता तक पहुंचने का माध्यम है या फिर समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति का सहारा बनने का भी दायित्व है? बरेली में हुए इस आयोजन ने कम से कम एक दिन के लिए यह संदेश जरूर दिया कि यदि जनप्रतिनिधि चाहें तो मंचों से निकलकर सीधे लोगों के जीवन में उम्मीद की रोशनी भी जगा सकते हैं। जिन बच्चों के लिए स्कूल की फीस एक असंभव सपना बन चुकी थी, उनके चेहरे पर लौटी मुस्कान शायद इस पूरे आयोजन की सबसे बड़ी उपलब्धि रही।

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