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उपसभापति के चुनाव ने कराई मेयर उमेश गौतम की फजीहत, चहेते को नहीं सौंप सके कुर्सी, पार्षदों की सियासी चाल के आगे नहीं चल सकी मेयर की, बरेली से लखनऊ तक पार्षदों के बिछाये जाल में फंस गया उमेश गौतम का सपना, उपसभापति चुनाव ने बरेली भाजपा में बदलते शक्ति संतुलन का दिया बड़ा संदेश, जानिये कैसे?

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नीरज सिसौदिया, बरेली

राजनीति में कहा जाता है कि असली ताकत उसी की होती है जिसकी बात संगठन मान ले। बरेली नगर निगम के उपसभापति चुनाव ने विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा के भीतर बदलते शक्ति संतुलन की एक नई तस्वीर पेश कर दी है। नगर निगम के मेयर उमेश गौतम जिस चेहरे को दूसरी बार उपसभापति की कुर्सी पर बैठाना चाहते थे, वह सपना पूरा नहीं हो सका। पार्टी संगठन ने अंततः पार्षद पूनम राठौर को अधिकृत प्रत्याशी घोषित कर दिया। इस फैसले को सिर्फ उपसभापति का चुनाव नहीं, बल्कि भाजपा के भीतर बदलते राजनीतिक समीकरणों और संगठन की बढ़ती ताकत के रूप में देखा जा रहा है।
सूत्रों के मुताबिक, मेयर उमेश गौतम की पहली पसंद पूर्व उपसभापति सर्वेश रस्तोगी थे। नगर निगम के मौजूदा कार्यकाल में एक बार उपसभापति रह चुके सर्वेश रस्तोगी को दूसरी बार भी उसी पद पर बैठाने की तैयारी लंबे समय से चल रही थी। लेकिन इस बार हालात पहले जैसे नहीं थे। भाजपा पार्षदों का एक बड़ा वर्ग इसके खिलाफ खुलकर सामने आ गया।
सूत्र बताते हैं कि जैसे ही भाजपा पार्षदों को यह जानकारी मिली कि मेयर उमेश गौतम एक बार फिर सर्वेश रस्तोगी को उपसभापति बनाना चाहते हैं, उन्होंने संगठित होकर इसका विरोध शुरू कर दिया। पार्षदों ने नगर निगम सदन की उपनेता शालिनी जौहरी से लेकर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष पंकज चौधरी, प्रदेश संगठन महामंत्री धर्मपाल सिंह, वन एवं पर्यावरण राज्य मंत्री अरुण कुमार सक्सेना, बरेली कैंट विधायक संजीव अग्रवाल, सांसद छत्रपाल गंगवार सहित पार्टी के तमाम प्रमुख पदाधिकारियों को पत्र भेजे।
इन पत्रों में स्पष्ट मांग की गई कि नगर निगम बोर्ड के एक ही कार्यकाल में किसी भी पार्षद को दूसरी बार उपसभापति बनने का अवसर नहीं दिया जाना चाहिए। पार्षदों का तर्क था कि यदि एक ही व्यक्ति को बार-बार मौका मिलेगा तो अन्य पार्षदों के साथ न्याय नहीं होगा और संगठन में अवसर की समानता का संदेश भी खत्म हो जाएगा।
सूत्रों के अनुसार, पार्षदों की इस सामूहिक नाराजगी और शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचे विरोध के बाद पार्टी संगठन ने पूरे मामले पर गंभीरता से विचार किया। अंततः मेयर की पसंद पर संगठन की राय भारी पड़ी और पूनम राठौर को भाजपा का अधिकृत प्रत्याशी घोषित कर दिया गया।
पूनम राठौर को अधिकृत उम्मीदवार घोषित किए जाने के साथ ही उनके निर्विरोध उपसभापति चुने जाने का रास्ता भी लगभग साफ हो गया। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि संगठन ने जिस तरह समय रहते निर्णय लिया, उससे संभावित विवाद भी टल गया और पार्टी के भीतर एक स्पष्ट संदेश भी चला गया कि अंतिम फैसला संगठन का ही होगा।
नगर निगम में भाजपा के कुल 51 पार्षद निर्वाचित हुए थे। इनमें से तीन पार्षदों का निधन हो चुका है, जिससे वर्तमान में पार्टी के 48 पार्षद हैं।
सूत्रों के अनुसार, इनमें से करीब 30 से अधिक पार्षद स्पष्ट रूप से इस पक्ष में नहीं थे कि सर्वेश रस्तोगी को एक ही कार्यकाल में दूसरी बार उपसभापति बनाया जाए। यानी भाजपा के आधे से कहीं अधिक पार्षद मेयर की पसंद के खिलाफ खड़े दिखाई दिए।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि किसी भी निर्वाचित निकाय में यदि इतने बड़े स्तर पर जनप्रतिनिधि किसी निर्णय का विरोध करें तो उसका असर संगठन के फैसले पर पड़ना स्वाभाविक है।
पार्टी नेतृत्व ने स्थानीय जनप्रतिनिधियों की भावना को प्राथमिकता देते हुए सर्वेश रस्तोगी के बजाय पूनम राठौर के नाम पर मुहर लगा दी। जैसे ही यह निर्णय सामने आया, भाजपा के भीतर और शहर के राजनीतिक गलियारों में इसकी चर्चा शुरू हो गई।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यह केवल एक पद का चुनाव नहीं, बल्कि इस बात का संकेत है कि भाजपा में अब स्थानीय स्तर पर संगठन की भूमिका पहले से कहीं अधिक प्रभावी हो गई है। यदि किसी प्रस्ताव को पार्षदों का व्यापक समर्थन नहीं मिलता, तो केवल किसी प्रभावशाली नेता की इच्छा के आधार पर उसे लागू कराना आसान नहीं रह गया है।

मेयर की सियासी ताकत पर उठे सवाल

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा राजनीतिक असर मेयर उमेश गौतम की छवि पर पड़ता दिखाई दे रहा है। लंबे समय से नगर निगम की राजनीति में मजबूत पकड़ रखने वाले मेयर पहली बार अपनी पसंद के उम्मीदवार को संगठन से मंजूरी नहीं दिला सके।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम केवल एक चुनावी फैसला नहीं, बल्कि मेयर के प्रति भाजपा पार्षदों में अंदर ही अंदर बढ़ते असंतोष का भी संकेत है। साथ ही यह भी माना जा रहा है कि नगर निगम की राजनीति में मेयर की पहले जैसी पकड़ अब कमजोर होती दिखाई दे रही है।

राजनीतिक गलियारों में इस घटनाक्रम को इस रूप में भी देखा जा रहा है कि **उमेश गौतम के पैरों तले की राजनीतिक जमीन अब धीरे-धीरे खिसकने लगी है। अब तक नगर निगम में जिनकी राजनीतिक इच्छा को अंतिम माना जाता था, इस बार उनकी पसंद संगठन और पार्षदों की सामूहिक राय के सामने टिक नहीं सकी।

विधानसभा की राजनीति पर भी पड़ सकता है असर

मेयर उमेश गौतम लंबे समय से नगर निगम की राजनीति से आगे बढ़कर विधानसभा चुनाव लड़ने की इच्छा रखते हैं। पार्टी के अंदर चर्चा है कि वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव में उनकी नजर बरेली कैंट या बिथरी चैनपुर विधानसभा सीट पर है।
ऐसे समय में यदि नगर निगम के अधिकांश भाजपा पार्षद ही उनके राजनीतिक फैसले के साथ खड़े नहीं दिखाई देते, तो इसका संदेश स्वाभाविक रूप से प्रदेश नेतृत्व तक भी जाता है। भाजपा में टिकट वितरण के दौरान केवल जनाधार ही नहीं, बल्कि संगठन में स्वीकार्यता, कार्यकर्ताओं का समर्थन और जनप्रतिनिधियों के बीच प्रभाव भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

पूनम राठौर को मिला संगठन का भरोसा

दूसरी ओर, पूनम राठौर का अधिकृत प्रत्याशी बनना इस बात का संकेत भी माना जा रहा है कि संगठन कार्यकर्ताओं और पार्षदों की सामूहिक भावना को महत्व दे रहा है। इससे पार्टी के भीतर यह संदेश गया है कि अवसर का वितरण निष्पक्ष तरीके से होना चाहिए और किसी एक चेहरे को बार-बार आगे बढ़ाने की परंपरा को संगठन स्वीकार करने के मूड में नहीं है।

बदलते राजनीतिक समीकरणों का संकेत

विधानसभा चुनाव से पहले हुए इस पूरे घटनाक्रम ने बरेली भाजपा में नए राजनीतिक समीकरणों की चर्चा तेज कर दी है। उपसभापति चुनाव ने यह स्पष्ट कर दिया कि अब नगर निगम की राजनीति में केवल मेयर की इच्छा से फैसले नहीं होंगे, बल्कि संगठन और निर्वाचित पार्षदों की सामूहिक राय अधिक प्रभावी होती जा रही है।
यही वजह है कि राजनीतिक विश्लेषक इस पूरे घटनाक्रम को एक साधारण संगठनात्मक निर्णय नहीं, बल्कि बरेली भाजपा में बदलते शक्ति संतुलन का महत्वपूर्ण संकेत मान रहे हैं। आने वाले दिनों में इसका असर न केवल नगर निगम की राजनीति, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण और स्थानीय नेतृत्व की भूमिका पर भी देखने को मिल सकता है।

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