नीरज सिसौदिया, बरेली
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 भले अभी दूर हों, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपने मोहरे सजाने शुरू कर दिए हैं। समाजवादी पार्टी भी उन विधानसभा सीटों पर विशेष रणनीति बना रही है, जहां पिछले कई चुनावों से भाजपा का दबदबा कायम है। बरेली शहर विधानसभा सीट ऐसी ही सीटों में शामिल है। इसी सीट से अब समाजवादी पार्टी के शहर विधानसभा क्षेत्र अध्यक्ष हसीव खान ने चुनाव लड़ने की इच्छा जताकर राजनीतिक हलचल तेज कर दी है।
पार्टी सूत्रों और स्थानीय राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि संगठन में लंबे समय तक सक्रिय रहने वाले नेताओं को इस बार प्राथमिकता मिल सकती है। ऐसे में हसीव खान का नाम स्वाभाविक रूप से चर्चा के केंद्र में आ गया है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि उन्होंने चुनावी मौसम का इंतजार करने के बजाय वर्षों तक लगातार संगठन और जनता के बीच काम किया है।
हसीव खान की राजनीतिक पहचान किसी बड़े शक्ति प्रदर्शन या मंचीय राजनीति से नहीं बनी। उनकी पहचान मोहल्लों, गलियों और बूथों तक पहुंचने वाले नेता की है। समाजवादी पार्टी ने जब उन्हें बरेली शहर विधानसभा क्षेत्र की जिम्मेदारी सौंपी, तभी से उन्होंने संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने का अभियान शुरू किया। कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना, नए लोगों को पार्टी से जोड़ना और स्थानीय मुद्दों को लगातार उठाना उनकी कार्यशैली का हिस्सा रहा है। इसका परिणाम पिछले विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव में बरेली शहर विधानसभा सीट पर भाजपा की कमजोर होती ताकत और कम होते वोटों के आंकड़ेे के रूप में देखने को मिला।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बरेली शहर जैसे कठिन विधानसभा क्षेत्र में यदि समाजवादी पार्टी आज पहले की तुलना में अधिक सक्रिय दिखाई देती है तो उसके पीछे स्थानीय संगठन की मेहनत भी एक बड़ा कारण है। इस संगठनात्मक मेहनत में हसीव खान की भूमिका को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।
हसीव खान की राजनीति का सबसे अलग पहलू उनका डोर-टू-डोर जनसंपर्क मॉडल माना जाता है। उनका मानना है कि चुनाव जीतने का रास्ता बड़ी रैलियों से नहीं बल्कि लोगों के घर तक पहुंचने से निकलता है। वे अक्सर कहते हैं कि टिकट मिलने के बाद शुरू किया गया जनसंपर्क केवल औपचारिकता बनकर रह जाता है। जनता उस नेता को याद रखती है जो बिना चुनाव के भी उनके सुख-दुख में साथ खड़ा हो। यही सोच उनकी राजनीतिक कार्यशैली की पहचान बन चुकी है।
उनका मानना है कि यदि नेता रोजमर्रा की जिंदगी में लोगों की समस्याएं सुनता है, उनके समाधान के लिए प्रयास करता है और हर परिस्थिति में उपलब्ध रहता है, तभी मतदाता उससे भावनात्मक रूप से जुड़ता है।
समाजसेवा से बनी अलग पहचान
राजनीति के साथ-साथ समाजसेवा के क्षेत्र में भी हसीव खान लगातार सक्रिय रहे हैं। जरूरतमंद लोगों की मदद करना, बच्चों की पढ़ाई के लिए निशुल्क लाइब्रेरी का संचालन करना, सरकारी स्कूलों की तस्वीर बदलने में भी मदद करना, स्थानीय समस्याओं के समाधान के लिए प्रशासन तक आवाज पहुंचाना और सामाजिक आयोजनों में भागीदारी उनकी सक्रियता का हिस्सा रही है। इसी वजह से उनकी पहचान केवल पार्टी पदाधिकारी तक सीमित नहीं है। क्षेत्र के अनेक लोग उन्हें ऐसे नेता के रूप में देखते हैं, जिनसे सीधे संपर्क किया जा सकता है।
संगठन की सीढ़ियां चढ़कर पहुंचे यहां तक
हसीव खान की दावेदारी अचानक सामने नहीं आई है। उन्होंने करीब डेढ़ दशक से अधिक समय तक संगठन में विभिन्न जिम्मेदारियां निभाई हैं। एक साधारण कार्यकर्ता से शुरुआत कर उन्होंने अलग-अलग पदों पर काम किया, कई चुनावों में संगठन की जिम्मेदारी संभाली और चुनावी प्रबंधन को बेहद करीब से समझा।
बताया जाता है कि उन्होंने पहले अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने पर ध्यान दिया और उसके बाद ही विधानसभा चुनाव लड़ने की इच्छा जताई। यही कारण है कि उनकी दावेदारी को संगठन के भीतर गंभीरता से देखा जा रहा है।
भाजपा के गढ़ में चुनौती आसान नहीं
बरेली शहर विधानसभा सीट लंबे समय से भाजपा का मजबूत गढ़ मानी जाती है। यहां से मौजूदा समय में भाजपा के अरुण कुमार सक्सेना विधायक हैं और वन राज्य मंत्री भी हैं। यह सीट कायस्थ बहुल मानी जाती है जो भाजपा का कोर वोटर है लेकिन सिर्फ कायस्थों के दम पर सीट जीतना मुश्किल नहीं है। यहां समाजवादी पार्टी की हार की एक वजह यह भी है कि मौजूदा विधायक अरुण कुमार कुछ मुस्लिम वोट भी ले जाते हैं। हसीव खान ने मुस्लिम वोटों के इसी बिखराव को रोकने का काम किया है जिसकी वजह से पिछले दो चुनावों में भाजपा उम्मीदवारों को उतने वोट नहीं मिल सके जितने कि हसीव खान के विधानसभा अध्यक्ष बनने से पहले मिला करते थे। इस बार समाजवादी पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती ऐसा उम्मीदवार उतारने की होगी, जो केवल चुनावी चेहरा न होकर पूरे क्षेत्र में सक्रिय रहा हो। भाजपा के मजबूत संगठनात्मक ढांचे का मुकाबला केवल वही नेता कर सकता है जिसकी अपनी टीम हो, बूथ स्तर तक पकड़ हो और जनता के बीच लगातार मौजूदगी हो। हसीव खान की दावेदारी को इसी नजरिए से देखा जा रहा है।
पार्टी से जुड़े सूत्रों का कहना है कि बरेली शहर विधानसभा सीट पर संगठनात्मक सक्रियता के आधार पर हसीव खान का नाम प्रमुख दावेदारों में गिना जा रहा है। हालांकि अंतिम फैसला पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व ही करेगा।
टिकट की दौड़ में क्यों अलग नजर आते हैं हसीव खान
राजनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि टिकट के अन्य संभावित दावेदारों की तुलना में हसीव खान की सबसे बड़ी ताकत उनका लंबा संगठनात्मक अनुभव और लगातार जमीनी सक्रियता है। उन्होंने अपनी राजनीतिक पहचान किसी बड़े पद या बाहरी समर्थन के बजाय कार्यकर्ताओं और जनता के बीच काम करके बनाई है। यही वजह है कि बरेली शहर विधानसभा सीट पर समाजवादी पार्टी के भीतर जब भी संभावित उम्मीदवारों की चर्चा होती है तो हसीव खान का नाम प्रमुखता से सामने आता है।
अब फैसला अखिलेश यादव के नेतृत्व पर
2027 का विधानसभा चुनाव समाजवादी पार्टी के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। पार्टी उन सीटों पर नए समीकरण बनाने की कोशिश कर रही है, जहां अब तक सफलता नहीं मिली। बरेली शहर विधानसभा सीट भी उनमें शामिल है।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पार्टी नेतृत्व संगठन में वर्षों तक पसीना बहाने वाले चेहरे पर भरोसा जताएगा, या फिर किसी नए राजनीतिक समीकरण को प्राथमिकता देगा। फिलहाल इतना तय माना जा रहा है कि बरेली शहर की राजनीति में हसीव खान ने अपनी दावेदारी दर्ज कराकर टिकट की लड़ाई को दिलचस्प जरूर बना दिया है। आने वाले महीनों में पार्टी का फैसला यह तय करेगा कि भाजपा के गढ़ में समाजवादी पार्टी किस चेहरे के सहारे नई चुनौती पेश करेगी।




