लाइफस्टाइल

हम तो हैं परदेस में…

नीरज सिसौदिया
जिंदगी में ख्वाबों की बहुत अहमियत होती है. जो सपने हम देखते हैं वही हमें उम्मीदें बंधाते हैं. उम्मीदें हमें कोशिशें करने पर मजबूर करती हैं और कोशिशें हमें मंजिल तक पहुंचाती हैं. ये सपने ही तो हैं जो हमें जिंदगी का मकसद देते हैं. सोई हुई इच्छाएं हमें नींद में भी पुकारती हैं. सारे सपने बुलाते हैं अपनी ओर एक खूबसूरत जिंदगी बसाने के लिए. फिर निकल पड़ते हैं हम बीते हुए कल की यादों का कारवां लेकर, नई उमंगों, उम्मीदों और कोशिशों के साथ आने वाले कल को हसीन बनाने के लिए.

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अक्सर लोग अपनों के लिए अपनों से दूर, आंखों में कुछ ख्वाब और दिल में कुछ अरमान लेकर निकल पड़ते हैं नई जिंदगी की तलाश में. वह परदेस में अपना नया घरौंदा बना लेते हैं लेकिन इस नई दुनिया को बसाने की चाहत में पुराने घर की दहलीजें सूनी हो जाती हैं. अरमानों का यह सफर एक बार शुरू होता है तो फिर ताउम्र नहीं थमता. जब कभी यादों के जुगनू टिमटिमाते हैं तो एक-एक कर जाने कितनी बातें पर दर परत खुलती जाती हैं. फिर आंखों के सामने तैरने लगते हैं कुछ यादगार लम्हे. कभी पलकों की कोर में ठहर जाते हैं तो कभी आंसू बनकर छलक उठती हैं वो बीते हुए कल की यादें. वक्त बदलता है पर यादें नहीं बदलतीं. ये यादें ही तो हैं जो सिर्फ हमारी अपनी होती हैं. इन्हें न तो कोई चुरा सकता है, न छीन सकता है. कोई भी इन्हें हमसे दूर नहीं कर सकता. ये हमेशा हमारे साथ रहती हैं. ये अनमोल लम्हे परदेस में अपनों से दूरी के दर्द का मरहम होते हैं. अजनबी शहरों में लोग दिल में सुनहरे ख्वाब संजोने से लेकर उन्हें पूरा करने तक एक अलग जिंदगी जीते हैं लेकिन अपनों के प्यार से सराबोर यही कुछ पल उन्हें अक्सर बुलाते हैं, वापस उन्हीं राहों पर, उसी गली में, उसी घर में, जहां से चले थे आने वाले कल के हसीन सपने संजोकर. लेकिन अब तो अपना वह शहर भी हमसे अजनबियों की तरह मिलता है. कोई मुकाम हासिल हो गया तो सिर आंखों पर बिठा लेता है, वरना अपनी पहचान बताना भी मुश्किल हो जाता है. जिंदगी की पूरी इबारत एक फिल्म की कहानी की तरह होती है बचपन के साथ शुरू होता है यह सिलसिला. तरह-तरह के खेल, छोटी-छोटी ख्वाहिशें, रेत के घर, उन्हें बनाने की चाहत, फिर स्कूल-कॉलेज और फिर नौकरी या व्यवसाय का सफरनामा. जिंदगी में एक मोड़ के बाद हम नए रास्ते पर निकल पड़ते हैं. जिंदगी का दस्तूर निराला होता है. मां-बाप भाई बहन के साथ एक घर से जिंदगी शुरू होती है. फिर दोस्त मिलते हैं. बचपन के दिन एक ही आंगन और गलियों में सबके साथ हंसते-खेलते गुजर जाते हैं. दुनियादारी से अनजान मासूमियत स्कूल से पीछा छुड़ाने के रोज नए बहाने खोजती है. उनकी ख्वाहिश भी उनकी उम्र की तरह बहुत छोटी होती हैं. नन्ही आंखें रोज एक नया ख्वाब बुनती हैं| नन्ही अंगुलियां कभी रेत पर इबारतें लिखती हैं तो कभी जमीन पर बिखरे तितलियों के पर चुनती हैं. कभी टोलियां बनाकर बागों से आम और अमरुद चुराने निकल पड़ते हैं तो कभी पापा के पॉकेट से पैसे चुराकर दुकान की ओर दौड़ पड़ते हैं. हर दिन की शुरुआत कुछ नई उमंगों और कुछ नई हसरतों के साथ होती है. बचपन उम्र का एक ऐसा पड़ाव है जिसमें खेलकूद के अलावा कुछ और सोचने की फुर्सत नहीं होती. न खाने का होश रहता है और न ही कपड़े मैले होने की फिक्र. हां, मां की मार का डर हमेशा रहता है. बचपन के यह कुछ ऐसे यादगार पल है जो परदेस में यादों के तौर पर हमारे साथ होते हैं. कभी अपनी ही शरारतें हमें गुदगुदाती हैं तो कभी पलकें भिगो जाती हैं| ये यादें ही तो होती हैं जो किसी सिनेमाई दृश्य की तरह हमारी आंखों की सिल्वर स्क्रीन पर चलने लगती हैं. कविताएं हो कहानियां हो या फिर फिल्में, परदेस जाने वालों की तड़प हर कोई बयां करता है. बॉलीवुड की बात करें तो हर दौर में परदेस जाने वालों की कहानी को बखूबी फिल्माया गया है. चाहे वह ‘नाम’ फिल्म का संजय दत्त का किरदार हो, जो दौलत की चाहत में अपनी मां और भाई से दूर विलायत चला जाता है या फिर ‘आ अब लौट चलें’ फिल्म का राजेश खन्ना का किरदार, जो जिद में परदेस जाकर एक सफल बिजनेसमैन तो बन जाता है मगर परिवार के प्यार से महरूम हो जाता है. असल जिंदगी में भी कुछ ऐसा ही होता है. अरमानों को पूरा करने में उम्र बीत जाती है. लोग मंजिल तो हासिल कर लेते हैं लेकिन जिंदगी का एक अनमोल हिस्सा इसी जद्दोजहद में गुजार देते हैं. अगर परदेस में कोई अपने गांव, जिले या देश का शख्स मिल जाए तो उसे देखकर एकबारगी अपनों की तस्वीर आंखों के सामने से गुजरने लगती है. परदेस में लाखों-करोड़ों लोगों के बीच बस वही अपना लगने लगता है. बचपन तो हमें यादगार लम्हे देकर चला जाता है और जवानी पेट पालने में गुजर जाती है. याद आती हैं वो दुआएं जो उस वक्त हमारे अपनों ने मांगी थी जब हम शहर के लिए रवाना हो रहे थे. वह बड़ा आदमी बनने का ख्वाब जिसका तसव्वुर हमारे अपनों को गुदगुदाता रहता है. मां-बाप के अरमानों और अपनी जिंदगी की जरूरतों को पूरा करने के लिए हम शहर तो आ जाते हैं लेकिन वक्त के थपेड़ों के साथ अपनों की दूरियों का दर्द भी सताता रहता है. जब लोग पैसा कमाने के लिए अपने घर की दहलीज से बाहर कदम निकालते हैं तो वे फिर अपने ही घर के लिए मेहमान बन जाते हैं. खुशी के चार दिन अपनों के साथ बिताने के बाद वापस उन्हें उसी बाहर की दुनिया में लौटना पड़ता है. ऐसे वक्त गुजरता है और दूरियां बढ़ती जाती हैं. मशहूर गजल गजल गायक चंदन दास की एक नज़्म के बोल हैं-
वक्त का ये परिंदा रुका है कहां
मैं था पागल जो इसको बुलाता रहा
चार पैसे कमाने मैं आया शहर गांव मेरा मुझे याद आता रहा

सच ही तो कहा है कि वक्त का परिंदा कभी किसी के लिए नहीं रुकता. बचपन जहां खेलकूद, पढ़ाई-लिखाई और नासमझी में गुजर जाता है, टीनएज मौज मस्ती में गुजर जाती है, वहीं जवानी जिंदगी की जद्दोजहद और अरमानों को पूरा करने की कोशिशों में निकल जाती है. उम्र के ये तीन पड़ाव जिंदगी के सबसे कीमती पड़ाव होते हैं. जिंदगी का दो तिहाई हिस्सा इनमें गुजर जाता है. यही वो पड़ाव होते हैं जब हम अपनों के प्यार को अपनों के साथ पूरी तरह जी सकते हैं लेकिन इस वक्त वही अपने हमसे मीलों दूर रहकर हमारी कामयाबी का इंतजार कर रहे होते हैं. अगर जवानी की मेहनत की बदौलत हम सफल हो ही गए तो बुढ़ापे में घर वापसी पर ना तो मां बाप का प्यार नसीब हो पाता है और न ही अपनों का साथ. बस चंद हसीन यादों का कारवां होता है जिनके सहारे तय करते हैं हम जिंदगी का आखिरी सफर. एक पंजाबी गीतकार ने बड़ी खूबसूरती के साथ इस एहसास को शब्दों में बयां किया है गुरदास मान ने इस गीत को आवाज दी है-
बचपन चला गया, ते जवानी चली गई
जिंदगी की कीमती निशानी चली गई
मुड़-मुड़ याद सतावे पिंड दीयां गलियां दी…
परदेस में आने पर अपनों के साथ- साथ अपना घर तो छूटता ही है, मकान भी किराए के ही नसीब होते हैं. बहुत कम ही लोग होते हैं जो परदेस में अपना आशियाना बना पाते हैं. अधिकतर लोगों की जिंदगी पराए आशियानों में ही गुजरती है. तभी तो कवि बिहारी लाल अंबर कहते हैं-
परिंदे भी नहीं रहते पराए आशियानों में
हमारी उम्र गुजरी है किराए के मकानों में
सच है कि आसमान में उड़ने वाला छोटा सा परिंदा भी तिनका-तिनका चुनकर अपना घोंसला खुद बनाता है. शाम ढलते ही वह वापस अपने उसी घोसले में लौट आता है लेकिन परदेस में जिंदगी तलाशने आए लोग ताउम्र पराए आशियानाें में रहने को मजबूर हो जाते हैं अपना आशियाना भी उनके लिए एक ख्वाब की तरह होता है. किसी का ख्वाब कुछ दिनों में पूरा हो जाता है तो कोई ताउम्र ख्वाबों के पीछे दौड़ता रहता है|

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उच्चतम शिक्षा के लिए भी अब युवाओं को अपने शहर से दूर ऐसे शहरों में रहना पड़ता है जहां पहले से उनके कोई सगे संबंधी या मित्र नहीं होते. वहीं, निजी क्षेत्र में नौकरी भी घरों से दूर मिलती है या परदेस में अपनों से दूर रहने के कारण ऐसे युवाओं के जीवन में अकेलापन हमेशा बना रहता है. मनोचिकित्सक अनीता विरमानी का कहना है कि अकेलेपन की मानसिक बीमारी से ग्रस्त युवाओं की संख्या भी बढ़ती जा रही है. वर्तमान दौर में यह बीमारी अब घर के बाहर नौकरी या पढ़ाई कर रहे युवाओं में भी बढ़ रही है. विद्यार्थी तो फिर भी अपने दोस्तों के साथ रहते हुए हैं इससे पार पा लेते हैं लेकिन नौकरीपेशा लोगों के लिए इससे निकलना आसान नहीं हो पाता| लोग चाहे कुछ भी कहें लेकिन घर से दूर रहते हुए मन में सुरक्षा का डर भी रहता है अजनबी शहरों में कोई अपना न होने से यह परेशानी और बढ़ जाती है. अभिभावकों को यह डर परेशान करता रहता है कि उनके बच्चे कैसे रहते होंगे परदेस में. वैसे तो बेटों को भी दूर भेजने में दुख होता है लेकिन बेटी के घर से दूर रहने पर उसकी चिंता ज्यादा सताती है. बेटियों को अपने शहर से बाहर भेजते वक्त अभिभावकों के मन में सबसे पहला ख्याल यही आता है कि वह नए माहौल में कैसे रह पाएंगी. वहां वह सुरक्षित होंगी या नहीं. दरअसल, लड़कों के लिए यह बात ज्यादा मायने नहीं रखती कि वह किस तरह के इलाके में रह रहे हैं. उनके आसपास के लोग कैसे हैं लेकिन लड़कियों के लिए यह बात काफी अहम है. घर से दूर रहना जहां बच्चों को आत्मनिर्भर बनाता है, वहीं इस दौरान मिलने वाली गलत संगत उनके जीवन की दिशा को भी परिवर्तित कर सकती है. दुनिया में अच्छे और बुरे हर तरह के लोग होते हैं. ऐसे में बस आपको अपने बच्चों को यह सीख देनी है कि वह बुराई से किस तरह खुद को दूर रखें. ऐसे में अभिभावकों को अपने बच्चों पर पूरा ध्यान देना चाहिए जिससे कि आप दूर रहकर भी उनका पूरा ख्याल रख पाए| परदेस जाने वाले लोगों के जज्बातों को एक शायर ने शब्दों में बखूबी पिरोया है. मुनव्वर राणा कहते हैं-
मुसाफिर हैं मगर हम एक दुनिया छोड़ आए हैं, तुम्हारे पास जितना है हम उतना छोड़ आए हैं
नई दुनिया बसाने की एक कमजोर चाहत में
पुराने घर की दहलीज ओं को तन्हा छोड़ आए हैं
पकाकर रोटियां रखती थी मां जिसमें सलीके से हम अपने घर में वो गेहूं की डलिया छोड़ आए हैं.
हमारे लौटाने की दुआएं करता रहता है
हम अपनी छत पर जो चिड़ियों का जत्था छोड़ आए हैं
जो एक सड़क उन्नाव से मोहान जाती थी
वहीं हसरत के ख्वाबों को भटकता छोड़ आए हैं
गले मिलती हुई नदियां गले मिलते हुए मज़हब
इलाहाबाद में कैसा नज़ारा छोड़ आए हैं|

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