पंजाब

क्या अबकी बार बलराज ठाकुर के साथ इंसाफ करेगी कांग्रेस? विधानसभा का टिकट मिलेगा या बनेंगे जिला प्रधान? पढ़ें…

नीरज सिसौदिया, जालंधर
जालंधर की सियासत में बलराज ठाकुर एक ऐसा नाम है जो किसी पहचान का मोहताज नहीं. लगभग दो दशक से भी अधिक समय तक पार्षद रहने के बावजूद बलराज ठाकुर पार्टी में हमेशा उपेक्षित ही रहे. कुशल राजनेता और बुद्धिजीवी होने के साथ ही जनता में खासी लोकप्रियता बटोरने वाले बलराज ठाकुर कभी पार्टी नेताओं के चहेतों की लिस्ट में शामिल नहीं हो सके. इसकी एक बड़ी वजह बलराज ठाकुर का स्वभाव भी रहा. शांत एवं सरल स्वभाव के बलराज ठाकुर कभी चाटुकारिता वाली सियासत नहीं कर सके और न ही वह आला नेताओं के हाथों की कठपुतली बन सके. मूलरूप से हिमाचल प्रदेश के रहने वाले बलराज ठाकुर ने अपने दम पर जालंधर की सियासत में अपना अलग मुकाम हासिल किया है.
पिछले निगम चुनावों में जब कांग्रेस सत्ता में आई थी तो योग्यता के आधार पर बलराज ठाकुर का नाम मेयर पद दौड़ में सबसे आगे शामिल था लेकिन पूर्व मंत्री अवतार हैनरी के वफादार जगदीश राज राजा को मेयर की कुर्सी सौंप दी गई. बलराज ठाकुर को प्रदेश कांग्रेस में जनरल सेक्रेटरी का ओहदा थमा दिया गया. उसी दौरान जब नए कांग्रेस जिला प्रधान के चयन की चर्चा होने लगी तो बलराज ठाकुर का नाम भी सामने आया था लेकिन यहां भी चाटुकारिता की सियासत को तरजीह दी गई और हैनरी के करीबी बलदेव सिंह देव के रूप में कठपुतली जिला प्रधान थोप दिया गया. सोशल मीडिया के इस जमाने में एक ऐसा जिला प्रधान बना दिया गया जो ट्विटर और इंस्टाग्राम हैंडल संभालना तो दूर वॉट्सएप भी ठीक से संचालित नहीं कर पाते हैं. सेहत इतनी खराब रहती थी कि जमीनी स्तर पर काम करने की तो कल्पना ही नहीं की जा सकती. नतीजा यह हुआ कि शहरी जिले में कांग्रेस आम आदमी से दूर होती गई. सत्ता में रहते हुए जो मुकाम कांग्रेस जिले में हासिल कर सकती थी वह नहीं कर सकी. वहीं, बलराज ठाकुर सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने के साथ ही जमीनी स्तर पर भी सक्रिय रहते हैं. अगर जिला प्रधान की जिम्मेदारी उन्हें मिलती तो शायद जालंधर में कांग्रेस एक शिखर को हासिल कर सकती थी.
अब बात करें विधानसभा चुनाव की तो कैंट विधानसभा सीट से कांग्रेस के प्रबल दावेदारों में बलराज ठाकुर का नाम भी शामिल है. परगट सिंह की बगावत अब आम हो चुकी है. कैप्टन अमरिंदर सिंह के खिलाफ बयानबाजी कर परगट सिंह ने अपने तेवर दिखा दिए हैं. अगर नवजोत सिंह सिद्धू इस बार भी कमजोर पड़े तो निश्चित तौर पर सबसे पहला टिकट परगट का ही कटेगा. ऐसे में कांग्रेस के पास जगबीर सिंह बराड़, बलराज ठाकुर जैसे नाम ही रह जाएंगे. चूंकि बराड़ यहां से हार का सामना कर चुके हैं ऐसे में कांग्रेस के लिए नए चेहरे पर दांव खेलना ज्यादा बेहतर प्रतीत होता है. ऐसे में बलराज ठाकुर पर दांव खेला जा सकता है. हालांकि, कांग्रेस अगर सिख चेहरे पर ही दांव खेलना चाहेगी तो सरदार तेजिंदर सिंह बिट्टू भी बेहतर विकल्प हो सकते हैं.
बलराज ठाकुर की खासियत यह है कि वह कभी हतोत्साहित नहीं होते. मेयर की कुर्सी न मिलने और जिला प्रधान का पद भी हासिल नहीं होने के बावजूद बलराज ठाकुर निराश नहीं हुए और पार्टी की सेवा में पूरी तत्परता से डटे रहे. अपने लगभग ढाई दशक से भी अधिक के राजनीतिक सफर में बलराज ठाकुर हमेशा बेदाग रहे. एक सियासतदान के लिए यह बहुत बड़ी उपलब्धि है.
अब एक बार फिर विधानसभा चुनाव आने वाले हैं और नया जिला प्रधान भी चुना जाना है. ऐसे में बलराज ठाकुर का नाम एक बार फिर चर्चा में है. अब देखना यह है कि क्या इस बार बलराज ठाकुर के साथ पार्टी इंसाफ करती है या कठपुतली चाटुकारों की फौज के आगे फिर से एक अच्छा सियासतदान दरकिनार कर दिया जाएगा?

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