यूपी

अगम मौर्य का अहम और भगवत सरन गंगवार का वहम पड़ा महंगा, पुराने रणनीतिकारों की अनदेखी ले डूबी सपा को

नीरज सिसौदिया, बरेली
विधानसभा के सेमिफाइनल में जीत का दंभ भरने वाली समाजवादी पार्टी जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में औंधे मुंह गिर पड़ी। पार्टी नेताओं का अहम और वहम पार्टी को ले डूबा। यही वजह रही कि बरेली में जिला पंचायत अध्यक्ष की जीती हुई बाजी भी समाजवादी पार्टी हार गई।
दरअसल, बरेली में सपा उम्मीदवार की हार इसलिए भी हैरान करती है क्योंकि यहां मुकाबला बहुत मुश्किल नहीं था। समाजवादी पार्टी के पास 26 सीटें थीं और भाजपा के पास उसकी आधी थीं। इसके बावजूद जब चुनाव हुए तो समाजवादी पार्टी अन्य वोटों को जोड़ने की बजाय अपने वोट तक नहीं बचा सकी। जो उम्मीदवार सपा के टिकट पर चुनाव लड़े वो भी भगवा रंग में रंग गए। सपा जिला अध्यक्ष अगम मौर्य का मिस मैनेजमेंट और पूर्व मंत्री भगवत सरन गंगवार का ओवर कॉन्फिडेंस पार्टी को ले डूबा। अगम मौर्य अपने अहम में इस कदर चूर हो गए कि उन्होंने समाजवादी पार्टी के उन नेताओं से भी सलाह मशविरा करना जरूरी नहीं समझा जो विपरीत परिस्थितियों में भी पार्टी को जीत दिलाने में सफल रहे थे। इनमें से एक नेता और पूर्व सांसद वीरपाल सिंह यादव और डा. मो.खालिद जैसे नेता तो अब पार्टी छोड़कर प्रगतिशील समाजवादी पार्टी में जा चुके हैं लेकिन जिला सहकारी संघ के पूर्व अध्यक्ष व पार्टी के पूर्व जिला महासचिव महेश पांडेय और जिला पंचायत की राजनीति में महारथ हासिल कर चुके पूर्व विधायक महिपाल सिंह जैसे नेता शामिल हैं।

जब डिप्टी मेयर का चुनाव था तो उस वक्त प्रदेश में मायावती (बसपा) और भाजपा के गठबंधन की सरकार थी. उस वक्त डिप्टी मेयर पद के लिए कुल साठ वोट पड़ने थे जिसमें सपा के अपने सिर्फ आठ वोट थे. यह डा. मो. खालिद की रणनीति का ही असर था कि पार्टी के आठ वोट और प्रदेश में विपक्षी सरकार होने के बावजूद जब डिप्टी मेयर के लिए वोट पड़े तो डा. मो. खालिद 40 वोट ले गए और भाजपा के गुलशन आनंद को करारी हार का सामना करना पड़ा था. उस वक्त पूरे प्रदेश में सपा का सिर्फ एक ही डिप्टी मेयर बरेली में बना था और वह डा. मो. खालिद ही थे.

डा. मोहम्मद खालिद

इस जीत पर तब मुलायम सिंह यादव ने वीरपाल सिंह यादव और डा. मो. खालिद को सार्वजनिक रूप से शाबाशी भी दी थी.
महेश पांडेय का जिक्र यहां पर इसलिए भी जरूरी हो जाता है क्योंकि महेश पांडेय वह शख्स हैं जिन्होंंने वर्ष 2018 में यूपी में भाजपा की सरकार होने के बावजूद जिला सहकारी संघ के अध्यक्ष पद का चुनाव अपनी रणनीति के दम पर पार्टी को जिताया था और किरन चौधरी जिला सहकारी संघ की अध्यक्ष बन सकी थीं। यह वह दौर था जब तत्कालीन सहकारिता मंत्री मुकुट बिहारी सरकारी अमले के साथ मिलकर भाजपा उम्मीेदवार को जिताने में जुटे थे और केंद्रीय मंत्री संतोष गंगवार एवं तत्कालीन वित्त मंत्री राजेश अग्रवाल भी भाजपा प्रत्याशी को जिताने के लिए पूरा जोर लगा चुके थे। उस वक्त चुनाव का संचालन महेश पांडेय ने ही किया था और महेश पांडेय की रणनीति की वजह से ही समाजवादी पार्टी अपना अध्यक्ष बनाने में कामयाब हो सकी थी।

महेश पांडेय

अगर अगम मौर्य ने उनसे जीत के मंत्र लिए होते तो शायद बरेली में सियासी हवाओं का रुख मोड़ा जा सकता था. पूर्व मंत्री भगवत सरन गंगवार को भी यह वहम हो गया था कि चुनाव जीतने के लिए उन्हें किसी की भी जरूरत नहीं है. इसलिए उन्होंने भी दिग्गजों को दरकिनार ही किया.

इसी तरह जिला पंचायत की राजनीति में माहिर पूर्व विधायक महिपाल सिंह को भी खास तवज्जो नहीं दी गई। अगम मौर्य चाहते तो इन दिग्गजों से सलाह मशविरा कर सकते थे लेकिन अपने अहम के आगे उन्होंने महेश पांडेय जैसे नेता को भी कोई तवज्जो नहीं दी जिसका नतीजा सबके सामने है। वहीं पार्टी के कुछ आला नेता इस हार के लिए अगम मौर्य के अहम के साथ ही पूर्व मंत्री भगवत सरन गंगवार के ओवर कॉन्फिडेंस को भी जिम्मेदार मानते हैं। उनका कहना है कि भगवत सरन गंगवार को यह वहम हो गया था कि इतनी सीटें जीतने के बाद वह जिला पंचायत अध्यक्ष बनाने में अकेले ही कामयाब हो जाएंगे लेकिन ऐसा नहीं हो सका। इतना ही नहीं महानगर अध्यक्ष शमीम खां सुल्तानी और सचिव मो. कलीमुद्दीन को छोड़कर महानगर टीम के पदाधिकारी भी अपना अध्यक्ष बनाने के प्रति गंभीर नजर नहीं आए। पिछले दिनों जब एक होटल में पार्टी का आयोजन किया गया था तो उक्त दोनों पदाधिकारियों को छोड़कर कोई भी पदाधिकारी उस पार्टी में ही नहीं पहुंचा था। इससे स्पष्ट है कि वीरपाल सिंह यादव के प्रसपा में जाने के बाद बरेली में बिखरी हुई सपा अब तक एकजुट नहीं हो सकी है। मजबूत लीडरशिप का अभाव भी इस हार की एक बड़ी वजह है। अगम मौर्य वीरपाल सिंह यादव जैसा दबदबा बना पाने में फिलहाल नाकाम साबित हुए हैं। हार के बाद सपा नेता भले ही इसे सत्ता का चुनाव बता रहे हों लेकिन असल में यह आला सियासतदानों की रणनीतिक हार है. 

बहरहाल, जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में मिली हार के बाद पार्टी नेताओं को अपने अहम और वहम से बाहर आ जाना चाहिए। क्योंकि सिर्फ सदस्यों के जीतने से सरकार नहीं बनती, सरकार बनाने में सियासी जोड़तोड़ की सबसे अहम भूमिका होती है। चुनाव रणनीति से जीता जाता है, अहम और वहम से नहीं। अगर अब भी सपा नेता अहम और मुगालते की राजनीति में उलझे रहे तो आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी को एक बार फिर पराजित होने से कोई नहीं रोक सकता।

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