नीरज सिसौदिया, बरेली
हिन्दुस्तान की सियासत में दिल्ली का रास्ता यूपी से होकर ही जाता है। यहां की 80 सीटें न सिर्फ उत्तर भारत बल्कि पूरे देश की राजनीतिक दिशा तय करती हैं। इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को देश के इस सबसे बड़े राज्य में करारी शिकस्त झेलनी पड़ी है। यहां न मोदी लहर काम आई और न ही योगी का बुलडोजर। मौजूदा सियासी हालातों ने एक नई बहस को जन्म दिया है। कुछ लोग इसे भाजपा के पतन की शुरुआत बताते हैं तो कुछ विपक्ष के उदय का अवसर करार देते हैं। इस बार के लोकसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन ने 80 में से 43 सीटों पर जीत हासिल की है जबकि भाजपा और उसके सहयोगी दलों को 36 सीटें मिली हैं। एक सीट चंद्रशेखर आजाद रावण की आजाद समाज पार्टी कांशीराम के हिस्से में आई है और मायावती की बहुजन समाज पार्टी शून्य पर आकर सिमट गई। भाजपा के लिए सबसे अधिक हैरान करने वाला यह है कि उसे प्रभु श्रीराम की नगरी ने भी नकार दिया जबकि पिछले कई दशकों से भगवा दल इन्हीं श्रीराम के नाम पर सियासत करती आई और कई बार सत्ता का स्वाद भी चखा। दूसरा तथ्य यह है कि योगी के जिस बुलडोजर ने उन्हें दोबारा यूपी की सत्ता पर बिठाया था वह बुलडोजर भी लोकसभा चुनाव में कोई कमाल नहीं दिखा पाया। मतलब साफ है कि यूपी के आगामी विधानसभा चुनाव अब किसी लहर या बुलडोजर के दम पर तो बिल्कुल नहीं होने वाले। ये चुनाव जनता को सीधे तौर पर प्रभावित करने Each बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे जमीनी मुद्दों पर लड़े जाएंगे। ये ऐसे मुद्दे हैं जो हमेशा विपक्ष के पक्ष में काम करते हैं।
मौजूदा चुनाव परिणाम से न सिर्फ समाजवादी पार्टी और कांग्रेस बल्कि पूरा विपक्ष बेहद उत्साहित है। दूसरी ओर पर्याप्त बहुमत न होने के कारण केंद्र सरकार भी बैक फुट पर है। यही वजह है कि सत्ता पक्ष हो या विपक्ष दोनों ने ही आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियां शुरू कर दी हैं।
लोकसभा में मिली अप्रत्याशित जीत के बाद जहां समाजवादी पार्टी के नेता और कार्यकर्ता बेहद उत्साहित हैं, वहीं मरणासन्न कांग्रेस में भी नई जान आ गई है। दोनों ही दलों ने 10 सीटों पर होने वाले विधानसभा उपचुनाव साथ मिलकर लड़ने की घोषणा कर दी है। ये उपचुनाव एक तरह से आगामी विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल हैं। क्योंकि विधानसभा के उप चुनाव के बाद विधानसभा चुनाव के लिए लगभग दो साल और कुछ महीने का ही वक्त शेष रह जाएगा। यूपी में अगले विधानसभा चुनाव जनवरी-फरवरी 2027 में होने हैं। इस बीच योगी सरकार को अपने प्रदर्शन में सुधार करना होगा। अब तक माफिया राज को खत्म करने के नाम पर भाजपा सरकार अपना चुनावी उल्लू सीधा करती रही है लेकिन अब मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद, विकास दुबे जैसे बड़े-बड़े माफिया परलोक सिधार चुके हैं और छोटे-छोटे माफिया सरेंडर कर चुके हैं। कुछ का एनकाउंटर हो चुका है तो कुछ सत्ता सुख भोग रहे हैं जिन्हें खत्म करना योगी सरकार के बूते की बात नहीं है। अखिलेश यादव की छवि बेदाग है। अपनी पार्टी में उन्होंने पुराने माफियाओं और दबंगों को पहले ही किनारे कर दिया है। वह हमेशा मुद्दों की बात करते हैं। वह हमेशा अपने मुख्यमंत्रित्व कार्यकाल में किए गए कामों की तुलना योगी सरकार के कामों से करने की खुली चुनौती देते हैं। सदन हो या सड़क अखिलेश के तीखे सवाल योगी सरकार से लेकर भाजपा कार्यकर्ताओं तक को असहज कर देते हैं। यही वजह है कि भाजपा विधायकों के साक्षात्कार इन दिनों मीडिया में कहीं नजर नहीं आते। यूट्यूबर और न्यूज पोर्टल के पत्रकारों का तो ये विधायक सामना करने तक से कतराते हैं।
भाजपा विधायकों की ये हालत दर्शाती है कि उनके पास गिनाने के लिए बतौर विधायक उपलब्धियों के नाम पर कुछ नहीं है। ये विधायक सिर्फ स्कूलों के वार्षिकोत्सव, सामूहिक विवाह समारोह, जन्मदिन, शोक सभा और परिवार मिलन समारोह टाइप के कार्यक्रमों का शुभारंभ करने तक ही सीमित रह गए हैं। स्थानीय मुद्दे मुंह बाए खड़े हैं, जो आगामी विधानसभा चुनाव में इन्हें निगलने को तैयार बैठे हैं।
विधायकों की यह कार्यशैली यूपी में भाजपा के वनवास की पटकथा लिख रही है।
भाजपा के पतन की शुरुआत की एक और बड़ी वजह पार्टी में व्याप्त गुटबाजी और छोटे नेताओं की बढ़ती महत्वाकांक्षा है। बड़े नेताओं को खत्म करने की हसरत पाले छोटे नेता अब दिग्गजों के पक्ष में सक्रिय नजर नहीं आते। वर्षों से पार्टी कार्यक्रमों में दरी बिछाते आ रहे नेता अब सत्ता सुख चाहते हैं जिसकी राह में सबसे बड़ा रोड़ा दिग्गज नेता हैं। जब तक पुराने छत्रप मैदान में रहेंगे नए को मौका नहीं मिलने वाला। ऐसे नेता अब विपक्षी दलों में जमीन तलाश रहे हैं।
इसके अलावा अयोध्या में शिकस्त यह साबित करती है कि रामलला की कृपा अब भाजपा पर नहीं रह गई। उसे नए मुद्दे तलाशने होंगे और एक बार फिर नए सिरे से नई शुरुआत करनी होगी वरना यूपी की सत्ता से उसका वनवास सुनिश्चित है।
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