नीरज सिसौदिया, बरेली
नाथ नगरी का सियासी मिजाज तेजी से करवट बदल रहा है। कभी समाजवादी पार्टी का नाम सुनते ही जिसे सिर्फ मुस्लिम मतदाताओं का प्रतिनिधि दल समझा जाता था, अब उसी सपा की साइकिल बरेली कैंट विधानसभा के हिंदू बाहुल्य इलाकों में भी रफ्तार पकड़ने लगी है। इस बदलाव की बड़ी वजह हैं दो नेता—डॉ. अनीस बेग और राजेश अग्रवाल।
समाजवादी पार्टी चिकित्सा प्रकोष्ठ के जिला अध्यक्ष डॉ. अनीस बेग और महानगर उपाध्यक्ष व शहर सीट से सपा के पूर्व प्रत्याशी राजेश अग्रवाल, दोनों ने बीते कुछ वर्षों में कैंट विधानसभा क्षेत्र में ऐसा माहौल तैयार किया है जिसने भाजपा के परंपरागत वोट बैंक में हलचल मचा दी है।
बरेली जिले की कुल नौ विधानसभा सीटें हैं, लेकिन कैंट और शहर सीट की राजनीति बाकी सीटों से बिल्कुल अलग है। यहां चुनावी समीकरण जातीय खांचे में ज्यादा फिट नहीं बैठते। यहां की राजनीति सीधी टक्कर भाजपा और सपा के बीच ही घूमती रही है।
पिछले चुनाव में जब सपा ने वैश्य समाज से आने वाली सुप्रिया ऐरन को प्रत्याशी बनाया, तब भी वैश्य वोटर भाजपा प्रत्याशी संजीव अग्रवाल के साथ चले गए। इसका साफ मतलब है कि मुस्लिम मतदाता चाहे एकमुश्त सपा को वोट दें, लेकिन वैश्य और हिंदू मतदाता परंपरागत रूप से भाजपा के साथ ही रहे हैं। यही कारण है कि सपा नेताओं को समझ आ गया है कि अगर उन्हें जीत का स्वाद चखना है तो सिर्फ मुस्लिम वोट बैंक के भरोसे नहीं बैठा जा सकता।
अनीस बेग और राजेश अग्रवाल की रणनीति
दोनों नेताओं की रणनीति साफ है-भाजपा के वोट बैंक में सेंध लगाना। और इसके लिए उन्होंने वही रास्ता चुना है जिस पर भाजपा सालों से चलती आई है, यानी हिंदुत्व और धार्मिक आयोजनों में सक्रिय भागीदारी। राजेश अग्रवाल खुद हिंदू हैं, इसलिए वे मंदिरों में आरती करने से लेकर शोभायात्राओं में अग्रिम पंक्ति में नजर आते हैं। अनीस बेग भले ही आरती न करें, लेकिन वे हर धार्मिक आयोजन में किसी न किसी रूप में भागीदारी निभाते रहते हैं और हिंदुओं की आस्था का पूरा सम्मान करते हैं। उनका अंदाज ऐसा है कि लोग उन्हें “अपना” मानने लगे हैं।
दोनों नेताओं ने सिर्फ चुनावी साल का इंतजार नहीं किया। ढाई-तीन साल पहले ही उन्होंने धार्मिक आयोजनों में उसी तरह की सहभागिता शुरू कर दी जैसी भाजपा नेता करते रहे हैं। यही वजह है कि सुभाष नगर, मढ़ीनाथ, कालीबाड़ी, गंगापुर और रामपुर गार्डन जैसे हिंदू बहुल इलाकों में उनका परसेप्शन तेजी से मजबूत हुआ है।
पिछले सावन में जब कांवड़िए बरेली की सड़कों से होकर गुजरे तो उनका स्वागत भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ-साथ सपा नेताओं ने भी किया। राजेश अग्रवाल और अनीस बेग ने न सिर्फ पुष्प वर्षा कराई बल्कि जलपान और आराम की व्यवस्था भी कराई। इससे कांवड़ियों में यह संदेश गया कि सपा सिर्फ मुस्लिमों की पार्टी नहीं है बल्कि हिंदुओं की आस्था का सम्मान करने वाली पार्टी भी हो सकती है।

शोभायात्राओं में बढ़ती भागीदारी
अगस्त्य मुनि महाराज की शोभायात्रा हो या फिर श्रीरामनवमी का जुलूस- हर जगह इनकी मौजूदगी ने सपा के लिए नया आधार तैयार किया। लोगों ने यह देखा कि जो नेता पहले सिर्फ मुस्लिम समाज से जुड़े कामों में दिखाई देते थे, अब वे हिंदुओं के धार्मिक आयोजनों में भी बराबर खड़े हैं। राजेश अग्रवाल तो कई बार ढोल-नगाड़ों के साथ शोभायात्रा में शामिल होते नजर आए। इससे उनकी छवि एक सामान्य राजनेता की नहीं बल्कि “अपनों में से एक” की बनी। वहीं, डॉ. अनीस बेग ने स्वास्थ्य सेवाओं और मेडिकल कैंप के जरिए शोभायात्राओं में हिस्सा लिया। वे श्रद्धालुओं की सेवा करते नजर आए।

भाजपा कार्यकर्ताओं में बेचैनी
इस सक्रियता का असर भाजपा खेमे में साफ दिखने लगा है। कुछ भाजपा कार्यकर्ता अब यह मानने लगे हैं कि राजेश अग्रवाल और अनीस बेग जिस तरह से हिंदू मतदाताओं का परसेप्शन बदल रहे हैं, उससे भविष्य में भाजपा के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। अब तक भाजपा का यह दावा था कि हिंदू मतदाता उनके साथ चट्टान की तरह खड़े हैं, लेकिन कैंट क्षेत्र में यह धारणा धीरे-धीरे बदल रही है।
मुस्लिम वोट बैंक पर सपा का भरोसा बरकरार
इस सीट पर मुस्लिम वोटर हमेशा से सपा के साथ रहे हैं और 2027 के विधानसभा चुनाव में भी इसके बदलने की संभावना बहुत कम है। लेकिन जीत के लिए यह पर्याप्त नहीं है। यही वजह है कि सपा के दोनों नेता हिंदू समाज की ओर रुख कर रहे हैं।
टिकट की जंग भी दिलचस्प
अनीस बेग और राजेश अग्रवाल दोनों ही समाजवादी पार्टी से टिकट के दावेदार हैं। दोनों जानते हैं कि टिकट सिर्फ एक को मिलेगा। लेकिन जिस तरह से दोनों मिलकर भाजपा के वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर रहे हैं, उससे साफ है कि चाहे जिसे टिकट मिले, फायदा पार्टी को ही होगा।
कैंट की गलियों में आजकल एक ही चर्चा है कि सपा नेताओं का रवैया बदल गया है। अब ये सिर्फ मुस्लिमों की पार्टी नहीं रही। कांवड़ियों की सेवा भी कर रहे हैं। मंदिरों में आरती भी कर रहे हैं। ये बातें धीरे-धीरे कैंट के हिंदू मतदाताओं के बीच फैल रही हैं और यही भाजपा के लिए सबसे बड़ा खतरा है।
चुनावी मेढकों से अलग दिखे दोनों नेता
अक्सर चुनाव से कुछ महीने पहले ही नेता बाहर निकलकर सक्रिय हो जाते हैं, जिन्हें जनता “चुनावी मेढक” कहकर पुकारती है। लेकिन अनीस बेग और राजेश अग्रवाल ने ढाई-तीन साल पहले से ही धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों में भाग लेना शुरू कर दिया था। यही वजह है कि उनकी छवि सिर्फ चुनावी नेता की नहीं बल्कि क्षेत्र के स्थायी कार्यकर्ता की बन रही है।
बहरहाल, बरेली कैंट का राजनीतिक परिदृश्य अब सीधी लड़ाई से ज्यादा जटिल हो गया है। भाजपा के हिंदुत्व के एजेंडे को चुनौती देने के लिए सपा के दो नेता उसी एजेंडे को अपने ढंग से अपनाकर हिंदू मतदाताओं के बीच जगह बनाने में लगे हैं। अगर यह सिलसिला ऐसे ही जारी रहा तो 2027 के विधानसभा चुनाव में कैंट सीट का गणित पूरी तरह बदल सकता है। भाजपा के लिए यह चेतावनी है और सपा के लिए उम्मीद की नई किरण।





