गीत – मात्रा विधान 16/16
हुआ यह कैसा बंटाधार
बचा ना रिश्तों में आधार
धन – दौलत ने रिश्ते तोड़े
यों अपने अपनापन छोड़े
हुआ है दिल भी अब व्यापार
बचा ना रिश्तों में आधार
हुआ यह कैसा बंटाधार
ईर्ष्या की जड़ गहरी बोई
रिश्तों ने मर्यादा खोई
सूखी प्रेम की बंदनवार
बचा ना रिश्तों में आधार
हुआ यह कैसा बंटाधार
मातु – पिता जो पूजे जाते
घर में आज उपेक्षा पाते
बच्चे भूल गए संस्कार
बचा ना रिश्तों में आधार
हुआ यह कैसा बंटाधार
भाई – भाई जब दूर हुए
उनमें झगड़े भरपूर हुए
भूले बचपन वाला प्यार
बचा ना रिश्तों में आधार
हुआ यह कैसा बंटाधार
द्वेष छोड़ कर मन को साधो
दीप प्रेम का पुनः जला दो
मिटेगा जीवन का अँधियार
बचेगा रिश्तों का आधार
तो कैसे होगा बंटाधार
✍️सुभाष राहत, बरेली





