नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली मंडल की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। जिस दलित राजनीति पर कभी बहुजन समाज पार्टी का एकछत्र राज था, वही राजनीति अब बिखराव, असंतोष और नए विकल्प की तलाश के दौर से गुजर रही है। इसी खाली होती राजनीतिक जमीन पर सर्वजन आम पार्टी तेज़ी से अपने पांव जमा रही है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जयप्रकाश भास्कर के नेतृत्व में दलित समाज का एक बड़ा हिस्सा न केवल संगठित हो रहा है, बल्कि खुद को पारंपरिक दलित राजनीति से अलग पहचान देने की कोशिश भी कर रहा है।
करीब तीन साल पहले अस्तित्व में आई सर्वजन आम पार्टी आज बरेली मंडल की 25 विधानसभा सीटों पर चर्चा के केंद्र में है। यह वही इलाका है, जहां बसपा कभी चुनाव जीतती थी और कई सीटों पर हार-जीत का फैसला अकेले कर देती थी। लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव ने तस्वीर पूरी तरह बदल दी। बसपा का सूपड़ा साफ हो गया और पार्टी शून्य पर सिमट गई। इसके बाद जो राजनीतिक शून्य बना, उसे भरने के लिए सपा और आज़ाद समाज पार्टी आगे तो आईं, लेकिन जमीनी भरोसा पैदा नहीं कर सकीं।
बरेली मंडल की राजनीति इन दिनों तेज़ी से करवट ले रही है। लगभग तीन साल पहले अस्तित्व में आई सर्वजन आम पार्टी अब न सिर्फ बहुजन समाज पार्टी के लिए चुनौती बनती दिख रही है, बल्कि समाजवादी पार्टी की रणनीति को भी असहज कर रही है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जयप्रकाश भास्कर के नेतृत्व में दलित समाज के अलग-अलग वर्ग एक मंच पर आते नजर आ रहे हैं। यही कारण है कि बरेली मंडल की 25 विधानसभा सीटों पर सपा की राह पहले से कहीं ज्यादा कठिन होती जा रही है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश, खासकर बरेली मंडल, लंबे समय तक बसपा का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है। बरेली मंडल में बरेली के अलावा पीलीभीत, बदायूं और शाहजहांपुर जिले शामिल हैं। इन जिलों की कई सीटों पर दलित समाज 18 से 28 प्रतिशत तक है। पहले यह वोट बसपा का स्थायी आधार माना जाता था, लेकिन 2022 के बाद यह आधार टूट चुका है।
आजाद समाज पार्टी ने कोशिश जरूर की, लेकिन उसका प्रभाव सीमित क्षेत्रों तक ही रहा। इसके उलट सर्वजन आम पार्टी ने स्थानीय नेतृत्व, जातिगत संतुलन और संगठन निर्माण पर फोकस किया।बरेली जिले की फरीदपुर, बिथरी चैनपुर, भोजीपुरा, मीरगंज, नवाबगंज और बरेली कैंट जैसी सीटों पर दलित वोट बैंक चुनावी नतीजों को पलटने की ताकत रखता रहा है। खास तौर पर जाटव और धोबी समाज यहां की राजनीति की दिशा तय करते रहे हैं।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह तस्वीर तेजी से बदली है। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव इस बदलाव के सबसे बड़े गवाह बने। कभी बरेली मंडल में सीटें जीतने वाली बसपा इस चुनाव में शून्य पर सिमट गई। यही वह दौर था जब एक तरफ बसपा का प्रभाव कमजोर पड़ा और दूसरी तरफ सर्वजन आम पार्टी का उदय शुरू हुआ।
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि बसपा की सबसे बड़ी कमजोरी यह रही कि पार्टी का झुकाव लगातार एक ही जाति समूह, खासकर जाटव समाज, तक सीमित होता चला गया। इससे धोबी, वाल्मीकि, पासी, कोरी और अन्य दलित वर्गों में नाराजगी बढ़ी। बरेली जिले में यह नाराजगी खुलकर सामने आई। धोबी समाज पहले ही बसपा से दूरी बना चुका था और बाद में जाटव समाज के कुछ प्रभावशाली चेहरे भी पार्टी छोड़कर दूसरी सियासी राहों पर चल पड़े।
इसका सबसे बड़ा उदाहरण फरीदपुर विधानसभा सीट है। यहां बसपा की पूर्व प्रत्याशी शालिनी सिंह ने 2022 में चुनाव लड़ा। शालिनी सिंह को कुल 14,478 वोट मिले, जबकि समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी विजयपाल सिंह मात्र 2,921 वोटों से चुनाव हार गए। सियासी विश्लेषकों का मानना है कि शालिनी सिंह को मिले वोटों में करीब पांच हजार वोट ऐसे थे जो उनकी व्यक्तिगत पकड़ और जातीय प्रभाव के चलते आए, जिनमें बड़ी संख्या जाटव वोटों की मानी जाती है। यही वोट सपा की हार का बड़ा कारण बने।
फरीदपुर अकेली सीट नहीं थी। बरेली मंडल की कई अन्य सीटों पर भी बसपा प्रत्याशी जीत तो दर्ज नहीं कर पाए, लेकिन उन्होंने सपा के समीकरण जरूर बिगाड़ दिए। हालांकि चुनाव के बाद स्थिति तेजी से बदली। बसपा की हार से पार्टी के कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटा, संगठन कमजोर हुआ और जमीनी पकड़ ढीली पड़ने लगी। इसी खाली जगह को सर्वजन आम पार्टी ने भरना शुरू किया।
जयप्रकाश भास्कर ने सबसे पहले धोबी समाज को संगठित किया, जो खुद को बसपा में उपेक्षित महसूस कर रहा था। इसके बाद धीरे-धीरे उन्होंने पूरे दलित वोट बैंक को जोड़ने की रणनीति पर काम शुरू किया। पिछले तीन वर्षों में गांव-गांव, कस्बे-कस्बे संगठन खड़ा किया गया। छोटे सम्मेलन, सामाजिक बैठकें और स्थानीय मुद्दों पर सक्रियता ने सर्वजन आम पार्टी को दलित समाज के बीच पहचान दिलाई।
आज हालात यह हैं कि बरेली मंडल का बड़ा हिस्सा सर्वजन आम पार्टी को बसपा के विकल्प के रूप में देखने लगा है। यह बदलाव सिर्फ बसपा के लिए खतरा नहीं है, बल्कि समाजवादी पार्टी के लिए भी चिंता का विषय बनता जा रहा है। वजह साफ है-अगर दलित वोट बसपा की जगह सर्वजन आम पार्टी में शिफ्ट होता है और उसका एक हिस्सा सपा के साथ जाने की बजाय अलग खड़ा रहता है, तो सपा को सीधा नुकसान होगा।
बरेली जिले की बात करें तो यहां फरीदपुर, भोजीपुरा, मीरगंज और नवाबगंज जैसी सीटों पर दलित समाज की संख्या 20 से 30 प्रतिशत के बीच मानी जाती है। इन सीटों पर दलित वोट अगर एकजुट हो जाए, तो किसी भी बड़े दल का गणित बिगड़ सकता है। 2022 में बसपा कमजोर रही, लेकिन आगे अगर सर्वजन आम पार्टी मजबूती से मैदान में उतरती है, तो सपा की राह आसान नहीं रहने वाली।
इसी सियासी पृष्ठभूमि में जयप्रकाश भास्कर ने आगामी 23 फरवरी को संत गाडगे जी महाराज की जयंती पर बरेली के आईएमए हॉल में विशाल शक्ति प्रदर्शन का ऐलान किया है। इससे पहले वह लखनऊ में प्रदेश स्तरीय आयोजन कर अपनी ताकत दिखा चुके हैं। बरेली का यह कार्यक्रम सिर्फ एक आयोजन नहीं, बल्कि सर्वजन आम पार्टी की राजनीतिक ताकत की असली परीक्षा माना जा रहा है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अगर यह शक्ति प्रदर्शन सफल रहता है, तो यह न सिर्फ सर्वजन आम पार्टी को नई पहचान देगा, बल्कि बरेली मंडल में दम तोड़ती बसपा के ताबूत की आखिरी कील भी साबित हो सकता है। वहीं सपा के लिए यह साफ संदेश होगा कि अब उसे दलित राजनीति को सिर्फ पुराने समीकरणों के भरोसे नहीं छोड़ना चाहिए।
राजनीतिक गलियारों में यह सवाल अब खुले तौर पर उठ रहा है। बरेली मंडल में जिस तरह बसपा संगठन विहीन और कार्यकर्ता विहीन नजर आ रही है, उससे यह कहना गलत नहीं होगा कि पार्टी यहां अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है।
कुल मिलाकर, बरेली मंडल की दलित राजनीति एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है। बसपा का कमजोर होना, सपा की रणनीतिक उलझन और सर्वजन आम पार्टी का उभार- इन तीनों ने मिलकर आने वाले चुनावों को बेहद दिलचस्प और चुनौतीपूर्ण बना दिया है। अब देखना यह है कि दलित समाज किसे अपना स्थायी राजनीतिक मंच मानता है और कौन-सी पार्टी इस बदलते समीकरण का सबसे ज्यादा फायदा उठा पाती है।

बरेली मंडल में दलित राजनीति का पुनर्जन्म, सर्वजन आम पार्टी से बसपा की बढ़ी बेचैनी, मंडल की 25 सीटों पर जयप्रकाश भास्कर के नेतृत्व में एकजुट हो रहे दलित, पढ़ें क्या कहते हैं नए समीकरण?




