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वीरपाल सिंह के बरेली से हटते ही ठंडा पड़ गया सपाइयों का जोश, शशांक यादव को बीएलए प्रभारी बनाने के बाद थम गया बीएलए सम्मेलनों का सिलसिला, जानिए कैसे वीरपाल ने पार्टी में फूंक दी थी नई जान?

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नीरज सिसौदिया, बरेली

बरेली की राजनीति में कुछ नाम ऐसे होते हैं, जिनका असर केवल चुनावी नतीजों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वे पूरे राजनीतिक माहौल को बदलने की क्षमता रखते हैं। ऐसे ही नेताओं में Veerpal Singh Yadav का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय सचिव और पूर्व राज्यसभा सांसद वीरपाल सिंह यादव एक बार फिर चर्चा में तब आए, जब नवंबर 2025 में उन्हें मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) अभियान के तहत बरेली और पीलीभीत का प्रभारी बनाया गया।
जिम्मेदारी मिलते ही उन्होंने जिस तेजी और सक्रियता के साथ काम शुरू किया, उसने न सिर्फ संगठन में नई ऊर्जा भरी, बल्कि लंबे समय से सुस्त पड़ी पार्टी को एक नई दिशा भी दी। आमतौर पर ऐसी जिम्मेदारियां मिलने के बाद औपचारिक बैठकों का दौर चलता है, लेकिन वीरपाल सिंह यादव ने इसे एक अभियान की तरह लिया। जिम्मेदारी मिलने के अगले ही दिन उन्होंने बीएलए (बूथ लेवल एजेंट) की समीक्षा बैठक बुला ली और साफ संदेश दिया कि हर बूथ पर मजबूत और सक्रिय बीएलए होना जरूरी है।
इस सख्त और स्पष्ट निर्देश का असर भी तुरंत दिखाई दिया। महज एक महीने के भीतर बरेली जिले में बूथ स्तर पर बीएलए की एक मजबूत टीम खड़ी हो गई। यह काम आसान नहीं था, क्योंकि लंबे समय से संगठन ढीला पड़ा हुआ था और कार्यकर्ताओं में उत्साह की कमी थी। लेकिन वीरपाल सिंह यादव की सक्रियता और नेतृत्व ने इस चुनौती को अवसर में बदल दिया।
उन्होंने बरेली और पीलीभीत की सभी 13 विधानसभा सीटों पर कई दौर की समीक्षा बैठकें कीं। इन बैठकों में न सिर्फ संगठन की स्थिति का आकलन किया गया, बल्कि हर स्तर पर कमियों को दूर करने की रणनीति भी बनाई गई। इसके बाद बीएलए सम्मेलनों का सिलसिला शुरू हुआ, जिसमें उन्होंने खुद भाग लिया और कार्यकर्ताओं को सीधे संबोधित किया।

इन बैठकों और सम्मेलनों की पूरी रिपोर्ट लेकर वे लखनऊ पहुंचे और पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव को विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने हर विधानसभा सीट की स्थिति, संगठन की ताकत और कमजोरियों के बारे में फीडबैक दिया, जिससे पार्टी नेतृत्व को जमीनी हकीकत समझने में मदद मिली।
बीएलए की टीम तैयार होने के बाद वीरपाल सिंह यादव ने अगला कदम उठाया—सम्मेलन और प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन। इसके तहत जिलेभर में लगातार बीएलए सम्मेलन आयोजित किए गए। दिसंबर में बरेली के आईएमए हॉल में कैंट विधानसभा क्षेत्र का बड़ा सम्मेलन हुआ। इससे पहले फरीदपुर और मीरगंज में भी ऐसे कार्यक्रम आयोजित किए जा चुके थे। चार जनवरी को शहर विधानसभा क्षेत्र में एक और बड़ा सम्मेलन हुआ, जिसमें भारी संख्या में कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया।
यह सिलसिला केवल बरेली तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पीलीभीत जिले में भी इसी तरह के आयोजन किए गए। इन सम्मेलनों का असर सिर्फ भीड़ तक सीमित नहीं था, बल्कि इसका सबसे बड़ा प्रभाव कार्यकर्ताओं के मनोबल पर पड़ा। जो कार्यकर्ता लंबे समय से खुद को हाशिये पर महसूस कर रहे थे, वे एक बार फिर सक्रिय हो गए।
पिछले कुछ वर्षों में बरेली में समाजवादी पार्टी नेतृत्व के अभाव से जूझती नजर आ रही थी। संगठन कमजोर हो रहा था, कार्यकर्ताओं में निराशा बढ़ रही थी और राजनीतिक गतिविधियां सीमित होती जा रही थीं। लेकिन वीरपाल सिंह यादव की सक्रियता ने इस ठहराव को तोड़ दिया। पुराने कार्यकर्ताओं के साथ-साथ युवा चेहरों में भी नई ऊर्जा दिखाई देने लगी।
वीरपाल सिंह यादव की खासियत यह रही कि वे केवल बैठकों तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने हर स्तर पर संवाद किया। कार्यकर्ताओं की समस्याएं सुनीं, उनके समाधान सुझाए और उन्हें संगठन से जोड़े रखा। यही वजह रही कि समाजवादी पार्टी एक बार फिर बरेली में मजबूत होती नजर आने लगी।
उनके भाषण भी इन सम्मेलनों की खास पहचान बने। उनके बोलने का अंदाज, मुद्दों पर पकड़ और सरकार के खिलाफ बेबाक बयानबाजी ने कार्यकर्ताओं को उत्साहित किया। उन्होंने भाजपा सरकार पर खुलकर हमला बोला और बिना किसी झिझक के अपनी बात रखी। लंबे समय बाद सपा के मंचों पर ऐसी आक्रामकता देखने को मिली थी।
इन सम्मेलनों ने यह भी साफ कर दिया कि संगठन, रणनीति और सामाजिक समीकरणों को समझने में वीरपाल सिंह यादव का कोई सानी नहीं है। बरेली में फिलहाल ऐसा कोई दूसरा नेता नजर नहीं आता, जो उनकी तरह सभी पहलुओं को संतुलित कर सके।
उनकी सबसे बड़ी ताकत उनकी सामाजिक पकड़ है। बरेली जिले में यादव मतदाता कई सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाते हैं। बिथरी चैनपुर, फरीदपुर और आंवला जैसी सीटों पर उनका प्रभाव साफ दिखाई देता है। इसके अलावा मीरगंज, बहेड़ी और भोजीपुरा में भी यादव मतदाताओं की अच्छी-खासी संख्या है। शहर और कैंट जैसी सीटों पर भी उनका प्रभाव पूरी तरह खत्म नहीं है।
वीरपाल सिंह यादव को बरेली का ऐसा नेता माना जाता है, जिसके नाम पर यादव समाज एकजुट हो जाता है। यही वजह है कि उनकी सक्रियता का सीधा असर चुनावी समीकरणों पर पड़ता है।
उनकी सक्रियता से जहां समाजवादी पार्टी मजबूत हो रही थी, वहीं भाजपा के लिए यह चिंता का विषय बनता जा रहा था। एक तरफ भाजपा अपने आंतरिक मतभेदों से जूझ रही थी, दूसरी तरफ सपा का संगठन तेजी से खड़ा हो रहा था। बीएलए सम्मेलनों की सफलता और कार्यकर्ताओं में बढ़ता उत्साह भाजपा के लिए खतरे की घंटी माना जा रहा था।
नए साल की शुरुआत में बरेली की राजनीति में नए समीकरण बनते नजर आ रहे थे। ऐसा लग रहा था कि आने वाले समय में मुकाबला पहले से ज्यादा कड़ा होगा। लेकिन इसी बीच एक बड़ा बदलाव हुआ।
वीरपाल सिंह को लखीमपुर का प्रभारी बना दिया गया और उनकी जगह शशांक यादव को बरेली जिले का एसआईआर प्रभारी बना दिया गया। इस बदलाव के साथ ही अचानक पूरे माहौल में ठंडापन आ गया। लापरवाही का आलम यह है कि बहेड़ी विधानसभा सीट पर अब तक विधानसभा का बीएलए सम्मेलन नहीं हो सका है।

बीएलए सम्मेलनों का सिलसिला थम गया। जो गतिविधियां लगातार चल रही थीं, वे अचानक बंद हो गईं। कार्यकर्ताओं की सक्रियता भी कम हो गई। जो लोग हाल ही में फिर से सक्रिय हुए थे, वे एक बार फिर पीछे हटते नजर आए।
अब स्थिति यह है कि बरेली में एसआईआर को लेकर कोई खास चर्चा नहीं हो रही। संगठन की ओर से न तो बड़े कार्यक्रम हो रहे हैं और न ही नियमित बैठकें। जो राजनीतिक हलचल कुछ समय पहले तक दिखाई दे रही थी, वह अब लगभग खत्म हो चुकी है।
बरेली की राजनीति में जो ठहराव टूटता हुआ नजर आ रहा था, वह फिर से लौट आया है। समाजवादी पार्टी एक बार फिर उसी स्थिति में पहुंचती दिख रही है, जहां से वह उभरने की कोशिश कर रही थी।

इस पूरे घटनाक्रम ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि क्या किसी एक नेता की सक्रियता पर संगठन की ऊर्जा टिकी होनी चाहिए? और क्या अचानक हुए बदलावों का असर इतना गहरा होना स्वाभाविक है?
फिलहाल स्थिति यह है कि जहां कुछ समय पहले सपा मजबूती की ओर बढ़ती दिख रही थी, वहीं अब भाजपा एक बार फिर बढ़त बनाती नजर आ रही है। बरेली की सियासत में यह उतार-चढ़ाव आने वाले समय में और क्या मोड़ लेगा, यह देखने वाली बात होगी।

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