नीरज सिसौदिया, बरेली
समाजवादी पार्टी के बरेली जिलाध्यक्ष शुभलेश यादव को जिले की कमान संभाले अभी कुछ ही महीने हुए हैं, लेकिन इस दौरान उनके कामकाज और पार्टी नेताओं के साथ कथित नजदीकियों को लेकर विवाद लगातार सामने आते रहे हैं। अब 6 अगस्त को होटल डिप्लोमेट में आयोजित पीडीए महापंचायत को लेकर पार्टी के भीतर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। कार्यक्रम ऐरन दंपति की ओर से आयोजित किया गया था और इसमें फरीदपुर विधानसभा सीट से सपा के टिकट के प्रबल दावेदार विजयपाल सिंह को मंच पर प्रमुखता मिली, जबकि दूसरे दावेदार चंद्रसेन सागर को न तो आमंत्रित किया गया और न ही कार्यक्रम के पोस्टर-बैनर में जगह दी गई। इससे चंद्रसेन सागर के समर्थकों में नाराजगी है।

विवाद सिर्फ इतना ही नहीं है। बरेली कैंट विधानसभा सीट से सपा के टिकट के दो अन्य प्रमुख दावेदारों की ओर से भी 6 अगस्त को अलग-अलग कार्यक्रम आयोजित किए गए थे। ये वो दावेदार हैं जो वर्षों से क्षेत्र में काम कर रहे हैं और कई पीडीए पंचायतें, सम्मेलन आदि आयोजित कर चुके हैं। इन कार्यक्रमों में भी जिला अध्यक्ष शुभलेश यादव नहीं पहुंचे। ऐसे में इन दावेदारों के समर्थक भी सवाल उठा रहे हैं कि अगर जिले का पार्टी संगठन सभी दावेदारों और नेताओं को समान महत्व देता है तो एक ही दिन आयोजित कार्यक्रमों में नेताओं की मौजूदगी को लेकर इतना अंतर क्यों दिखाई दे रहा है।
पार्टी के अंदर चल रही इस खींचतान को लेकर अब पुराने विवाद भी फिर चर्चा में आ गए हैं। पार्टी के कुछ नेताओं का कहना है कि शुभलेश यादव की कार्यशैली को लेकर पहले भी समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव तक शिकायत पहुंचाई जा चुकी है। दावा है कि बदायूं दौरे के दौरान बरेली के कुछ यादव नेताओं ने अखिलेश यादव से जिला संगठन में कथित गुटबाजी और चुनिंदा नेताओं को प्राथमिकता दिए जाने की शिकायत की थी। इसके बाद आपसी मतभेद दूर करने के लिए बैठक कराने की जिम्मेदारी बरेली के ही एक यादव नेता को दिए जाने की बात सामने आई थी। बरेली क्लब में बैठक भी हुई, लेकिन उसमें भी सभी प्रमुख नेताओं की मौजूदगी नहीं रही।
अब 6 अगस्त के कार्यक्रम के बाद एक बार फिर पार्टी के भीतर सवाल उठ रहे हैं कि आखिर बरेली में समाजवादी पार्टी किस दिशा में जा रही है और क्या विधानसभा टिकट के दावेदारों को लेकर अभी से खेमेबंदी शुरू हो गई है?
ऐरन दंपति की पहली पीडीए महापंचायत और उठे सवाल
6 अगस्त को होटल डिप्लोमेट में सुप्रिया ऐरन और उनके पति प्रवीण सिंह ऐरन की ओर से पीडीए महापंचायत, संवाद एवं परिचर्चा का आयोजन किया गया। आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर इसे महत्वपूर्ण राजनीतिक कार्यक्रम के तौर पर देखा गया, क्योंकि सुप्रिया ऐरन एक बार फिर बरेली कैंट विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के टिकट की दावेदारी कर रही हैं।
कार्यक्रम में पार्टी नेताओं, पार्षदों और पूर्व पार्षदों की मौजूदगी रही। हालांकि, कार्यक्रम को लेकर पार्टी के भीतर यह सवाल भी उठा कि जिस आयोजन का नाम पीडीए महापंचायत रखा गया, उसमें पीडीए यानी पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समुदाय के आम लोगों की तुलना में पार्टी नेताओं और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की संख्या अधिक क्यों रही।
कार्यक्रम का राजनीतिक महत्व इसलिए भी बढ़ गया क्योंकि यह कैंट विधानसभा सीट से टिकट की दावेदारी के बीच आयोजित हुआ था। सुप्रिया ऐरन वर्ष 2022 में कांग्रेस छोड़कर समाजवादी पार्टी में शामिल हुई थीं। उस समय लखनऊ में पार्टी में उनके शामिल होने के दौरान शुभलेश यादव की मौजूदगी भी रही थी।
पार्टी के भीतर यह चर्चा भी है कि शुभलेश यादव सुप्रिया ऐरन के काफी करीबी माने जाते हैं। खुद शुभलेश यादव कई पार्टी नेताओं के सामने यह दावा करते रहे हैं कि 2022 के विधानसभा चुनाव में सुप्रिया ऐरन को कैंट सीट से समाजवादी पार्टी का टिकट दिलाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। अब जब सुप्रिया ऐरन फिर कैंट से टिकट की दावेदारी कर रही हैं, ऐसे में 6 अगस्त का कार्यक्रम स्वाभाविक तौर पर राजनीतिक नजरिए से भी महत्वपूर्ण हो गया।

पोस्टर से ही शुरू हो गया था विवाद
पीडीए महापंचायत को लेकर विवाद कार्यक्रम के दिन ही शुरू नहीं हुआ। इससे पहले ऐरन दंपति की ओर से जारी किए गए एक पोस्टर को लेकर भी पार्टी के अंदर चर्चा हुई थी। पोस्टर में बरेली के कई छोटे-बड़े नेताओं और विधानसभा टिकट के दावेदारों की तस्वीरें लगाई गई थीं। इनमें फरीदपुर विधानसभा सीट से टिकट के दावेदार विजयपाल सिंह की तस्वीर भी थी, जबकि उसी सीट से टिकट के प्रबल दावेदार माने जा रहे चंद्रसेन सागर की तस्वीर पोस्टर में दिखाई नहीं दी।
इसी बात को लेकर चंद्रसेन सागर के समर्थकों के बीच चर्चा शुरू हुई थी। अब जब 6 अगस्त की महापंचायत में भी चंद्रसेन सागर को आमंत्रित नहीं किया गया और विजयपाल सिंह मंच पर मौजूद रहे, तो दोनों घटनाओं को जोड़कर देखा जा रहा है। सपा के स्थानीय राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी है कि विजयपाल सिंह और जिला अध्यक्ष शुभलेश यादव की नजदीकियां पिछले कुछ समय से चर्चा में रही हैं। इससे पहले फरीदपुर विधानसभा क्षेत्र में शुभलेश यादव की विजयपाल सिंह और मटन वाली भाभी के साथ कथित नजदीकियों को लेकर भी पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच चर्चाएं होती रही हैं। अब ऐरन दंपति का नाम भी इसी राजनीतिक समीकरण से जोड़ा जा रहा है।
हालांकि, इन चर्चाओं को लेकर संबंधित नेताओं की ओर से किसी तरह का आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है और पार्टी स्तर पर भी किसी गुटबाजी को औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं किया गया है।
चंद्रसेन सागर को नहीं बुलाया तो समर्थकों में नाराजगी
फरीदपुर विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के टिकट के प्रमुख दावेदारों में चंद्रसेन सागर का नाम लगातार चर्चा में है। स्थानीय स्तर पर उनकी सक्रियता और चुनावी तैयारियों को लेकर भी पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच चर्चा रहती है। ऐसे में उनके समर्थकों को यह बात खटक रही है कि जिले में आयोजित पार्टी से जुड़े एक बड़े कार्यक्रम में उन्हें बुलाया तक नहीं गया, जबकि उसी विधानसभा सीट से टिकट के दूसरे दावेदार विजयपाल सिंह को मंच पर जगह दी गई।
चंद्रसेन सागर के समर्थकों का तर्क है कि अगर यह कार्यक्रम पार्टी की विचारधारा और पीडीए को मजबूत करने के लिए था तो उसमें सभी प्रमुख दावेदारों और नेताओं को समान रूप से आमंत्रित किया जाना चाहिए था। समर्थकों की नाराजगी का एक और कारण यह है कि जिला अध्यक्ष शुभलेश यादव और चंद्रसेन सागर के बीच कथित तौर पर लंबे समय से शीतयुद्ध की स्थिति बताई जाती रही है। दोनों नेताओं की गतिविधियों और सार्वजनिक बयानों को लेकर समय-समय पर पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच चर्चाएं होती रही हैं।

चंद्रसेन सागर ने दिया अलग अंदाज में जवाब
हालांकि, चंद्रसेन सागर ने खुद इस पूरे मामले को लेकर जिस तरह प्रतिक्रिया दी, वह भी चर्चा का विषय बन गई। जब उनके समर्थकों ने कार्यक्रम में उनकी तस्वीर नहीं लगाए जाने और आमंत्रित नहीं किए जाने को लेकर उनसे सवाल किया तो उन्होंने वॉट्सऐप ग्रुप में जवाब दिया।
उन्होंने कहा कि ऐरन जी उनकी तस्वीर लगाएं या न लगाएं, इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। उन्होंने यह भी कहा कि वह पार्टी पदाधिकारी नहीं हैं कि उन्हें किसी कार्यक्रम में बुलाया जाना या पोस्टर पर उनकी तस्वीर लगाना जरूरी हो। चंद्रसेन सागर ने अपने जवाब में यह भी स्पष्ट किया कि उनका मूल संबंध फरीदपुर से है और कैंट विधानसभा क्षेत्र से उनका राजनीतिक संबंध नहीं है। उन्होंने कहा कि कैंट के पंचशील नगर में उनके एक-दो रिश्तेदार रहते हैं और वह उनसे भी समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी को वोट देने के लिए कह देंगे।
उन्होंने खुद को अखिलेश यादव का सिपाही बताते हुए कहा कि जिले में उनके समर्थकों का वोट समाजवादी पार्टी को जाएगा, चाहे कोई उम्मीदवार उन्हें बुलाए या न बुलाए। उनका यह जवाब पार्टी के भीतर इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि उन्होंने सीधे तौर पर किसी पर आरोप लगाने के बजाय खुद को पार्टी और राष्ट्रीय अध्यक्ष के प्रति प्रतिबद्ध बताया। साथ ही उन्होंने सम्मान को लेकर भी अपनी बात रखी और संकेत दिया कि जहां सम्मान न हो, वहां जाने की जरूरत नहीं है।
कैंट के दो दावेदारों के कार्यक्रम में भी नहीं पहुंचे शुभलेश
विवाद की दूसरी कड़ी बरेली कैंट विधानसभा सीट से जुड़ती है। 6 अगस्त को कैंट सीट से सपा के टिकट के दो प्रमुख दावेदारों की ओर से अलग-अलग कार्यक्रम आयोजित किए गए थे। इनमें से एक दावेदार की ओर से पीडीए जन संवाद कार्यक्रम आयोजित किया गया था जिसमें सैकड़ों की तादाद में आम लोग पहुंचे थे, जबकि दूसरे दावेदार ने समाजसेवा से जुड़ा कार्यक्रम रखा। दोनों कार्यक्रमों का अपना-अपना राजनीतिक महत्व था, क्योंकि कैंट विधानसभा सीट पर सपा के टिकट को लेकर कई नेताओं के बीच दावेदारी चल रही है।
आरोप है कि जिला अध्यक्ष शुभलेश यादव इनमें से किसी भी कार्यक्रम में नहीं पहुंचे। दूसरी तरफ उसी दिन ऐरन दंपति के कार्यक्रम में उनकी मौजूदगी रही। यही बात अब उन दोनों दावेदारों के समर्थकों को भी खटक रही है। उनका सवाल है कि यदि जिला अध्यक्ष सभी दावेदारों और नेताओं के लिए समान रूप से उपलब्ध हैं तो एक ही दिन आयोजित कार्यक्रमों में उनकी मौजूदगी को लेकर इतना अंतर क्यों है। समर्थकों का कहना है कि जिला अध्यक्ष का पद किसी एक गुट या उम्मीदवार के लिए नहीं बल्कि पूरे संगठन के लिए होता है। इसलिए जिलाध्यक्ष को सभी नेताओं के कार्यक्रमों में संतुलन बनाए रखना चाहिए।
जब टिकट तय ही हैं तो मेहनत क्यों करें?- समर्थकों का सवाल
पार्टी के भीतर नाराजगी जताने वाले कार्यकर्ताओं का सबसे बड़ा सवाल टिकट को लेकर है। उनका कहना है कि समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव लगातार विधानसभा टिकट के दावेदारों से जमीन पर काम करने, संगठन मजबूत करने और जनता के बीच रहने की अपेक्षा कर रहे हैं। ऐसे में यदि स्थानीय स्तर पर ही किसी नेता को किसी खास दावेदार के करीब माना जाने लगे और दूसरे दावेदारों से दूरी दिखाई दे तो इससे कार्यकर्ताओं में गलत संदेश जाता है।
कुछ समर्थकों का सवाल है कि अगर जिले के संगठन में ही यह धारणा बनने लगे कि कौन नेता किसके पक्ष में है और किसे टिकट मिलने वाला है, तो बाकी दावेदारों और उनके समर्थकों से पूरी ताकत के साथ पार्टी के लिए काम करने की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
यही सवाल फरीदपुर विधानसभा सीट को लेकर भी उठ रहा है। यहां विजयपाल सिंह और चंद्रसेन सागर दोनों की दावेदारी चर्चा में है। ऐसे में किसी एक दावेदार की सार्वजनिक कार्यक्रम में प्रमुख उपस्थिति और दूसरे की अनुपस्थिति को पार्टी कार्यकर्ता राजनीतिक संकेत के तौर पर देख रहे हैं।

अखिलेश यादव तक पहुंच चुकी है शिकायत
शुभलेश यादव को लेकर विवाद नया नहीं है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, कुछ समय पहले बरेली के ही कुछ यादव नेताओं ने समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के सामने जिला संगठन में कथित गुटबाजी का मुद्दा उठाया था। बताया जाता है कि जब अखिलेश यादव बदायूं दौरे पर आए थे, उस दौरान बरेली के कुछ यादव नेताओं ने उनसे शिकायत की कि जिला अध्यक्ष पार्टी के सभी नेताओं को समान महत्व नहीं देते और चुनिंदा नेताओं को ही अपने कार्यक्रमों में प्रमुखता देते हैं। सूत्रों का दावा है कि शिकायत के बाद अखिलेश यादव ने बरेली के एक यादव नेता को आपसी मतभेद दूर कराने के लिए बैठक बुलाने की जिम्मेदारी दी थी। इसके बाद बरेली क्लब में एक बैठक भी आयोजित की गई। हालांकि, इस बैठक में भी कुछ बड़े यादव नेताओं की अनुपस्थिति ने संगठन के भीतर चल रही खींचतान को खत्म करने के प्रयासों पर सवाल खड़े कर दिए।
पार्टी के भीतर इस बात को लेकर भी चर्चा है कि जब राष्ट्रीय नेतृत्व तक शिकायत पहुंच चुकी है और मतभेद दूर करने की कोशिश की जा चुकी है, इसके बावजूद यदि इसी तरह के आरोप फिर सामने आ रहे हैं तो संगठन के लिए यह गंभीर संकेत है।
सवाल सिर्फ टिकट का नहीं, संगठन की एकजुटता का है
समाजवादी पार्टी के सामने आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर सबसे बड़ी चुनौती केवल टिकट वितरण नहीं बल्कि संगठन को एकजुट रखना भी है। चुनाव से पहले टिकट के दावेदारों के बीच प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक है। लेकिन जब यही प्रतिस्पर्धा संगठन के भीतर गुटबाजी की शक्ल लेने लगे तो उसका असर चुनावी प्रदर्शन पर भी पड़ सकता है।
बरेली में कई विधानसभा सीटों पर समाजवादी पार्टी के भीतर टिकट के लिए दावेदार सक्रिय हैं। कैंट, फरीदपुर समेत अन्य सीटों पर भी नेता अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने में जुटे हैं। ऐसे में जिला अध्यक्ष की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। जिलाध्यक्ष को एक तरफ संगठन को मजबूत करना होता है तो दूसरी तरफ अलग-अलग गुटों और दावेदारों के बीच संतुलन भी बनाना पड़ता है।
यदि किसी कार्यक्रम में एक दावेदार को मंच पर जगह मिलती है और दूसरे को आमंत्रण तक नहीं मिलता, या एक दावेदार के कार्यक्रम में जिलाध्यक्ष की मौजूदगी होती है और दूसरे के कार्यक्रम से दूरी रहती है, तो इससे राजनीतिक संदेश अपने आप बनता है-चाहे संबंधित नेताओं की मंशा कुछ भी हो।

‘ऐरन और विजयपाल प्रेम’ की चर्चा क्यों?
शुभलेश यादव और सुप्रिया ऐरन की राजनीतिक नजदीकी की चर्चा की एक वजह 2022 का घटनाक्रम भी है। जब सुप्रिया ऐरन ने कांग्रेस छोड़कर समाजवादी पार्टी का दामन थामा था, तब शुभलेश यादव की लखनऊ में मौजूदगी रही थी।
इसके बाद से दोनों के बीच राजनीतिक नजदीकी की चर्चा पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच बनी रही। शुभलेश यादव द्वारा कई नेताओं के सामने यह दावा किए जाने की बात भी सामने आती रही है कि 2022 में सुप्रिया ऐरन को कैंट से टिकट दिलाने में उन्होंने भूमिका निभाई थी। अब सुप्रिया ऐरन फिर कैंट से टिकट की दावेदारी कर रही हैं और इसी बीच उनके द्वारा आयोजित पीडीए महापंचायत में शुभलेश यादव की मौजूदगी ने चर्चाओं को और हवा दे दी है। इसी कार्यक्रम में फरीदपुर से विजयपाल सिंह की मौजूदगी और चंद्रसेन सागर की अनुपस्थिति ने फरीदपुर की राजनीति को भी इस पूरे घटनाक्रम से जोड़ दिया। यही वजह है कि पार्टी के भीतर कुछ लोग इसे केवल एक कार्यक्रम की सामान्य तस्वीर के तौर पर नहीं देख रहे, बल्कि इसे आगामी टिकट की राजनीति से जोड़कर देख रहे हैं।
संगठन में बढ़ रही है खेमेबंदी?
समाजवादी पार्टी के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बरेली संगठन में वास्तव में खेमेबंदी बढ़ रही है या फिर अलग-अलग नेताओं के कार्यक्रमों को लेकर पैदा हुई नाराजगी को राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का परिणाम माना जाए। यह भी संभव है कि किसी कार्यक्रम में किसी नेता की मौजूदगी या अनुपस्थिति के पीछे स्थानीय स्तर की व्यस्तता या अन्य कारण हों। लेकिन जब एक ही दिन कई कार्यक्रम आयोजित हों और उनमें पार्टी के प्रमुख नेताओं की मौजूदगी अलग-अलग दिखाई दे, तो चुनावी माहौल में उसके राजनीतिक अर्थ निकाले जाना स्वाभाविक है। खास तौर पर तब, जब संबंधित नेता विधानसभा टिकट के दावेदार हों और पार्टी संगठन के शीर्ष पद पर बैठा व्यक्ति किसी एक खेमे के करीब होने की चर्चा में हो।
फिलहाल 6 अगस्त की पीडीए महापंचायत के बाद बरेली समाजवादी पार्टी में एक बार फिर अंदरूनी समीकरण चर्चा में हैं। चंद्रसेन सागर के समर्थक नाराज हैं, कैंट के दो दावेदारों के समर्थक भी सवाल उठा रहे हैं और शुभलेश यादव की कार्यशैली को लेकर पहले की शिकायतें फिर चर्चा में आ गई हैं।
अब नजर अखिलेश यादव के अगले कदम पर
बरेली समाजवादी पार्टी के भीतर चल रही इस पूरी खींचतान के बीच सबसे महत्वपूर्ण नजर अब पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव पर रहेगी। यदि वास्तव में जिला संगठन को लेकर राष्ट्रीय नेतृत्व तक शिकायत पहुंच चुकी है और आपसी मतभेद दूर करने की कोशिश भी की गई थी, तो आने वाले दिनों में संगठनात्मक स्तर पर क्या कदम उठाया जाता है, यह देखना महत्वपूर्ण होगा।
वहीं, टिकट के दावेदारों के लिए भी यह समय बेहद अहम है। अभी टिकट का अंतिम फैसला नहीं हुआ है। ऐसे में हर दावेदार अपनी जमीन मजबूत करने में जुटा है। लेकिन यदि दावेदारों के बीच यह धारणा बनने लगे कि टिकट का फैसला पहले ही किसी खास समीकरण के आधार पर हो चुका है, तो इससे पार्टी के अंदर असंतोष बढ़ सकता है।
चंद्रसेन सागर ने फिलहाल खुद को विवाद से अलग रखते हुए यह संदेश देने की कोशिश की है कि उनके लिए पार्टी और अखिलेश यादव सर्वोपरि हैं। लेकिन उनके समर्थकों की नाराजगी को नजरअंदाज करना पार्टी के लिए आसान नहीं होगा। इसी तरह कैंट सीट के दूसरे दावेदारों के कार्यक्रमों में जिला अध्यक्ष की अनुपस्थिति भी आने वाले दिनों में चर्चा का विषय बनी रह सकती है।
कुल मिलाकर 6 अगस्त की पीडीए महापंचायत ने समाजवादी पार्टी के भीतर पीडीए की राजनीति से ज्यादा टिकट और संगठन की राजनीति को चर्चा में ला दिया है। जिस कार्यक्रम का उद्देश्य पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों को एक मंच पर लाने का संदेश देना था, वह अब पार्टी के अंदर कथित गुटबाजी, टिकट की दावेदारी और नेताओं की नजदीकियों के सवालों के बीच घिर गया है।
अब देखना यह है कि जिला अध्यक्ष शुभलेश यादव इन आरोपों और नाराजगी को किस तरह संभालते हैं और क्या पार्टी नेतृत्व बरेली में सभी दावेदारों और नेताओं के बीच संतुलन कायम करने के लिए कोई स्पष्ट पहल करता है। चुनावी राजनीति में टिकट की घोषणा से पहले ही यदि दावेदारों के बीच दूरियां बढ़ती हैं, तो उसका सीधा असर बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं और संगठन की चुनावी तैयारी पर पड़ सकता है। ऐसे में बरेली समाजवादी पार्टी के लिए चुनौती केवल मजबूत उम्मीदवार चुनने की नहीं, बल्कि टिकट की घोषणा से पहले ही संगठन को टूटने से बचाने की भी है।




