नीरज सिसौदिया, बरेली
नगर निगम की एकमुश्त समाधान योजना (ओटीएस) को लेकर अब सवाल खड़े होने लगे हैं। पुराने गृहकर बकायेदारों को राहत देने के लिए लाई गई इस योजना में केवल तीन साल पुराने बकाये के ब्याज पर छूट दिए जाने और करीब 13 साल पुराने गृहकर के ब्याज पर राहत नहीं मिलने को लेकर पूर्व विधानसभा प्रत्याशी और पार्षद राजेश अग्रवाल ने नगर निगम की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि जब योजना का उद्देश्य बकायेदारों को राहत देकर कर वसूली को आसान बनाना है तो फिर पुराने बकाये को राहत के दायरे से बाहर रखने का आधार क्या है।
राजेश अग्रवाल ने नगर निगम अधिकारियों से मुलाकात कर ओटीएस को लेकर स्थिति स्पष्ट करने की मांग की। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि तीन साल पुराने गृहकर बकाये पर ब्याज में राहत दी जा रही है तो वर्ष 2014 से चले आ रहे पुराने बकाये के ब्याज पर राहत क्यों नहीं दी जा रही। उनके मुताबिक, बड़ी संख्या में ऐसे लोग हो सकते हैं जिनका गृहकर लंबे समय से बकाया है और ब्याज जुड़ते-जुड़ते मूल कर से कहीं अधिक राशि हो गई है। ऐसे लोगों के लिए ओटीएस तभी वास्तविक राहत साबित होगी, जब पुराने बकाये के ब्याज को लेकर भी स्पष्ट और व्यावहारिक प्रावधान हो।
राजेश अग्रवाल ने कहा कि एकमुश्त समाधान योजना के नाम से यदि जनता को राहत देने की बात कही जा रही है तो उसके नियमों की जानकारी भी स्पष्ट तरीके से लोगों तक पहुंचनी चाहिए। उनका सवाल है कि योजना में राहत की समय सीमा तीन वर्ष तक सीमित रखने का आधार क्या है और उससे पुराने बकायेदारों को राहत क्यों नहीं दी जा रही है। उन्होंने नगर निगम से इस संबंध में स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की है, ताकि करदाताओं के बीच भ्रम की स्थिति पैदा न हो।
उन्होंने नगर निगम के कर्मचारियों और अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी नाराजगी जताई। राजेश अग्रवाल का आरोप है कि कई जगहों पर लोगों को ओटीएस के नियमों की सही जानकारी नहीं दी जा रही है। उनका कहना है कि जब कोई नागरिक अपने बकाये का समाधान करने और नगर निगम का कर जमा करने के लिए आगे आ रहा है तो उसे नियमों की स्पष्ट जानकारी देना विभाग की जिम्मेदारी है। यदि लोगों को ही योजना के प्रावधानों को लेकर भ्रमित रखा जाएगा तो फिर एकमुश्त समाधान योजना का उद्देश्य कैसे पूरा होगा।
राजेश अग्रवाल ने अधिकारियों और कर्मचारियों को अपनी कार्यप्रणाली में सुधार करने की हिदायत देते हुए कहा कि जनता नगर निगम के पास अपना बकाया कर जमा करने के लिए आती है, इसलिए उसके साथ किसी तरह की लापरवाही नहीं होनी चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि लोगों को ओटीएस के नाम पर गुमराह किया गया या उन्हें वास्तविक राहत नहीं मिली तो वह इस मामले को उच्च अधिकारियों के समक्ष उठाएंगे और शिकायत करेंगे।

दरअसल, नगर निगम की ओटीएस को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि पुराने गृहकर बकायेदारों को राहत का लाभ किस सीमा तक दिया जा रहा है। तीन साल के बकाये पर ब्याज में राहत और उससे पुराने बकाये पर अलग व्यवस्था ने उन लोगों के बीच सवाल पैदा कर दिए हैं जिनका कर लंबे समय से जमा नहीं हुआ है। ऐसे में यह मामला केवल ब्याज में छूट का नहीं, बल्कि योजना की पारदर्शिता और उसके उद्देश्य से भी जुड़ गया है।
राजेश अग्रवाल का कहना है कि अगर नगर निगम वास्तव में ज्यादा से ज्यादा बकायेदारों से कर वसूलना चाहता है तो उसे ऐसी नीति बनानी चाहिए जिससे लंबे समय से बकाया गृहकर जमा करने वाले लोगों को भी प्रोत्साहन मिले। उनका तर्क है कि कई परिवार आर्थिक या अन्य कारणों से वर्षों तक गृहकर जमा नहीं कर पाए और अब जब एकमुश्त भुगतान की योजना सामने आई है तो उन्हें उम्मीद है कि ब्याज के बोझ से राहत मिलेगी। लेकिन यदि पुराने बकाये पर ब्याज का बोझ जस का तस रहता है तो ऐसे लोग योजना का लाभ लेने से पीछे हट सकते हैं।
यहां एक दूसरा महत्वपूर्ण सवाल योजना के प्रचार-प्रसार को लेकर भी है। यदि ओटीएस के नियम आम नागरिक के लिए पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं तो नगर निगम को इसके लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने चाहिए। किस अवधि के बकाये पर कितनी राहत मिलेगी, किन शर्तों के तहत भुगतान करना होगा और पुराने बकायेदारों के लिए क्या व्यवस्था है—इन सभी बिंदुओं की जानकारी सार्वजनिक किए जाने की जरूरत है।

राजेश अग्रवाल ने इसी पारदर्शिता की मांग करते हुए कहा कि नगर निगम का काम जनता को परेशान करना नहीं, बल्कि उसकी समस्याओं का समाधान करना है। उन्होंने अधिकारियों से कहा कि गृहकर से जुड़े मामलों में नागरिकों को सही जानकारी दी जाए और ओटीएस के प्रावधानों को लेकर किसी तरह का भ्रम न पैदा होने दिया जाए।
अब निगाह नगर निगम प्रशासन के रुख पर है। राजेश अग्रवाल द्वारा उठाए गए सवालों के बाद सबसे अहम मुद्दा यही है कि तीन साल पुराने बकाये के ब्याज पर राहत का प्रावधान किस आधार पर किया गया है और 13 साल पुराने गृहकर के बकायेदारों के लिए क्या व्यवस्था है। यदि नगर निगम इन सवालों का स्पष्ट जवाब देता है तो योजना को लेकर बनी भ्रम की स्थिति दूर हो सकती है। वहीं, यदि पुराने बकायेदारों को राहत नहीं मिलती है तो ओटीएस की उपयोगिता और उसके वास्तविक उद्देश्य को लेकर बहस आगे भी जारी रह सकती है।




