नीरज सिसौदिया, बरेली
उत्तर प्रदेश की राजनीति में सामाजिक संतुलन और जातीय प्रतिनिधित्व हमेशा से अहम भूमिका निभाता रहा है। चुनावी रणनीति हो या संगठन का ढांचा, हर राजनीतिक दल अलग-अलग समाजों को साथ लेकर चलने की कोशिश करता है। समाजवादी पार्टी भी लंबे समय से इसी सामाजिक समीकरण की राजनीति करती आई है। लेकिन बरेली मंडल की बात करें तो यहां एक ऐसा समाज है, जो खुद को लगातार उपेक्षित महसूस कर रहा है। यह समाज है साहू-राठौर समाज।
बरेली मंडल में समाजवादी पार्टी की संगठनात्मक और चुनावी रणनीति पर नजर डालें तो साफ दिखाई देता है कि साहू-राठौर समाज को न तो चुनावी टिकटों में तरजीह मिली और न ही संगठन में कोई बड़ा पद। यही वजह है कि अब यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि क्या सपा बरेली मंडल में इस समाज की अनदेखी कर रही है, और अगर हां, तो क्या अब पार्टी इस कमी को दूर करने जा रही है?
साल 2022 के विधानसभा चुनाव बरेली मंडल के लिए समाजवादी पार्टी के लिहाज से खास नहीं रहे। इस मंडल में कुल चार जिले आते हैं—बरेली, पीलीभीत, बदायूं और शाहजहांपुर। इन चारों जिलों को मिलाकर कुल 25 विधानसभा सीटें हैं। इन 25 सीटों पर समाजवादी पार्टी ने अलग-अलग जाति और समुदायों से उम्मीदवार उतारे, लेकिन साहू-राठौर समाज से एक भी उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया गया।
अगर टिकट वितरण का जातिगत आंकड़ा देखा जाए तो तस्वीर और भी साफ हो जाती है। सपा ने चार सीटों पर मौर्य, कुशवाह और शाक्य बिरादरी के उम्मीदवार उतारे। पांच सीटों पर मुस्लिम प्रत्याशी मैदान में थे। तीन-तीन सीटों पर कुर्मी और लोधी समाज के उम्मीदवारों को मौका मिला। यादव समाज को चार सीटें दी गईं। वैश्य (सवर्ण) समाज को दो सीटें, ब्राह्मण समाज को एक सीट, जाटव समाज को दो सीटें और एक सीट धोबी समाज के उम्मीदवार को दी गई। लेकिन साहू-राठौर समाज, जिसकी हर विधानसभा क्षेत्र में मजबूत मौजूदगी मानी जाती है, पूरी तरह टिकट वितरण से बाहर रहा।
सिर्फ टिकट ही नहीं, संगठन के स्तर पर भी साहू-राठौर समाज को कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं दी गई। बरेली मंडल के किसी भी जिले में समाजवादी पार्टी ने इस समाज से किसी नेता को जिला अध्यक्ष नहीं बनाया। यानी चुनाव और संगठन दोनों ही स्तरों पर यह समाज खुद को हाशिए पर महसूस करता रहा।
यही वजह है कि अब बरेली जिले के जिला अध्यक्ष पद को लेकर साहू-राठौर समाज के नेता खुलकर अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं। उनका तर्क सीधा है कि जब अब तक उन्हें कोई प्रतिनिधित्व नहीं मिला, तो अब संगठन में संतुलन बनाने के लिए जिला अध्यक्ष पद पर पहला अधिकार इसी समाज का बनता है।
इसी पृष्ठभूमि में बरेली के युवा नेता कमल साहू का नाम तेजी से सामने आया है। कमल साहू न सिर्फ साहू-राठौर समाज से आते हैं, बल्कि उन्हें एक सक्रिय, ऊर्जावान और जमीनी नेता के रूप में देखा जाता है। उन्होंने खुलकर जिला अध्यक्ष पद की दावेदारी जताई है और इसके पीछे उनका तर्क भी मजबूत माना जा रहा है। कमल साहू की सबसे बड़ी ताकत उनकी उम्र और युवाओं के बीच पकड़ है। आज जब राजनीतिक दल युवा मतदाताओं को साधने की कोशिश कर रहे हैं, ऐसे में एक युवा जिला अध्यक्ष पार्टी के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है। बरेली जैसे जिले में, जहां बड़ी संख्या में युवा मतदाता हैं, वहां किसी युवा चेहरे को संगठन की कमान देना एक सकारात्मक संदेश दे सकता है।
राजनीति में भावनाओं से ज्यादा अहम भूमिका आंकड़े निभाते हैं। अगर बरेली मंडल के विधानसभा क्षेत्रों पर नजर डालें तो लगभग हर सीट पर 15 हजार से 35 हजार तक साहू-राठौर वोट मौजूद हैं। यह संख्या किसी भी सीट के हार-जीत का अंतर तय करने के लिए काफी मानी जाती है।
2022 के विधानसभा चुनाव के नतीजे भी इस बात की ओर इशारा करते हैं कि सपा को कई सीटों पर बेहद कम अंतर से हार का सामना करना पड़ा। 25 सीटों में से पार्टी को सिर्फ 5 सीटों पर जीत मिली। कई सीटों पर हार का अंतर 2 हजार से 5 हजार वोटों के बीच रहा, कुछ सीटों पर 10 हजार के करीब और कुछ पर 10 हजार से ज्यादा। ऐसे में अगर साहू-राठौर समाज का समर्थन पूरी तरह पार्टी को मिलता, तो नतीजे कुछ और भी हो सकते थे।
यही वजह है कि अब पार्टी के अंदर भी यह चर्चा है कि अगर संगठन के स्तर पर साहू-राठौर समाज को सम्मान और प्रतिनिधित्व दिया जाए, तो इसका सीधा फायदा पूरे मंडल में मिल सकता है।
बताया जा रहा है कि समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव अगले एक महीने के भीतर बरेली जिले के नए जिला अध्यक्ष की घोषणा कर सकते हैं। हालांकि यह घोषणा पहले भी हो सकती थी, लेकिन पार्टी कुछ और जिलों में भी जिला अध्यक्षों को बदलने की तैयारी में है। इसलिए सभी जिलों के अध्यक्षों की घोषणा एक साथ करने की रणनीति बनाई जा रही है।
इस संभावित बदलाव ने बरेली की राजनीति में हलचल बढ़ा दी है। अलग-अलग समाजों के नेता अपनी-अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं, लेकिन साहू-राठौर समाज का दावा इस बार ज्यादा मजबूत माना जा रहा है, क्योंकि अब तक उन्हें कोई ठोस प्रतिनिधित्व नहीं मिला है।
समाजवादी पार्टी इन दिनों अपने पीडीए फॉर्मूले (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) पर खास जोर दे रही है। पार्टी का दावा है कि यही फॉर्मूला भाजपा के खिलाफ उसका सबसे बड़ा हथियार है। ऐसे में साहू-राठौर समाज, जो पिछड़ा वर्ग की श्रेणी में आता है, इस फॉर्मूले में पूरी तरह फिट बैठता है।
अगर पार्टी कमल साहू जैसे नेता को जिला अध्यक्ष बनाती है, तो यह पीडीए फॉर्मूले को जमीनी स्तर पर लागू करने का एक मजबूत उदाहरण होगा। इससे न सिर्फ साहू-राठौर समाज को संदेश जाएगा, बल्कि अन्य पिछड़े वर्गों में भी सकारात्मक संकेत जाएगा कि पार्टी उन्हें सिर्फ वोट बैंक नहीं, बल्कि नेतृत्व में भी भागीदारी दे रही है।
राजनीति में समय के साथ नेतृत्व का बदलना जरूरी माना जाता है। आज जब भाजपा जैसे दल युवा नेतृत्व को आगे बढ़ा रहे हैं, तब समाजवादी पार्टी पर भी यह दबाव है कि वह संगठन में पीढ़ीगत बदलाव करे। हाल ही में भाजपा ने नितिन नबीन जैसे 45 वर्षीय नेता को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर यह संदेश दिया कि पार्टी भविष्य की राजनीति के लिए तैयार है। इसी संदर्भ में यह सवाल उठता है कि अगर भाजपा राष्ट्रीय स्तर पर युवा चेहरे को आगे कर सकती है, तो समाजवादी पार्टी बरेली जैसे महत्वपूर्ण जिले में कमल साहू को मौका क्यों नहीं दे सकती? ऐसा करने से पार्टी न सिर्फ युवा नेतृत्व को बढ़ावा देगी, बल्कि यह भी दिखाएगी कि वह समय के साथ खुद को बदलने को तैयार है।
कमल साहू को जिला अध्यक्ष बनाना समाजवादी पार्टी के लिए कई मायनों में फायदेमंद हो सकता है। पहला, इससे युवा नेतृत्व को बढ़ावा मिलेगा। दूसरा, बरेली मंडल में उपेक्षित साहू-राठौर समाज को प्रतिनिधित्व मिलेगा। तीसरा, पीडीए फॉर्मूले को मजबूती मिलेगी। और चौथा, संगठन में पीढ़ीगत बदलाव का स्पष्ट संदेश जाएगा। यानी एक फैसले से पार्टी एक साथ कई राजनीतिक और संगठनात्मक लक्ष्यों को हासिल कर सकती है।
बरेली मंडल में समाजवादी पार्टी के सामने यह एक अहम मोड़ है। जिला अध्यक्ष की नियुक्ति सिर्फ एक संगठनात्मक फैसला नहीं, बल्कि आने वाले चुनावों की दिशा तय करने वाला कदम भी हो सकता है। साहू-राठौर समाज की अब तक की उपेक्षा और उनके वोटों की अहमियत को देखते हुए यह देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी नेतृत्व क्या फैसला करता है।
फिलहाल इतना तय माना जा रहा है कि अगले एक महीने के भीतर बरेली को नया जिला अध्यक्ष मिल जाएगा। अब यह पार्टी नेतृत्व पर निर्भर करता है कि वह पुराने ढर्रे पर चलता है या फिर नए सामाजिक और पीढ़ीगत संतुलन के साथ भविष्य की राजनीति का रास्ता चुनता है।





