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नफरत के दौर में मोहब्बत का घर: जहां रामायण की चौपाइयों के साथ गूंजती हैं कुरान की आयतें, इंसानियत को मजहब से ऊपर रखते हैं इंजीनियर अनीस अहमद खान, पढ़ें मोहब्बत के घर की कहानी एक दलित की जुबानी

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नीरज सिसौदिया, बरेली
आज के दौर में जब समाज में अक्सर धर्म और पहचान के आधार पर खींची गई लकीरें गहरी होती नजर आती हैं, ऐसे समय में समाजवादी अल्पसंख्यक सभा के प्रदेश उपाध्यक्ष और बरेली कैंट विधानसभा सीट से टिकट के प्रबल दावेदार इंजीनियर अनीस अहमद खान एक ऐसी मिसाल बनकर उभरे हैं, जहां इंसानियत सबसे ऊपर है और मजहब उसके बाद आता है। उनका घर सिर्फ एक मकान नहीं, बल्कि सांप्रदायिक सौहार्द की जीवंत तस्वीर है- जहां ईद भी मनती है, दीवाली भी, होली के रंग भी उड़ते हैं और शब-ए-बारात की रौनक भी होती है। यही नहीं, यहां एक ही छत के नीचे रामायण और कुरान दोनों का पाठ किया जाता है।
इंजीनियर की नौकरी से वीआरएस लेकर राजनीति में कदम रखने वाले अनीस अहमद खान ने अपने जीवन में जिस सोच को अपनाया, वही उनके घर और कामकाज में साफ दिखाई देती है। उनके लिए इंसान की पहचान उसका धर्म नहीं, बल्कि उसकी इंसानियत है। यही वजह है कि उनके घर से लेकर दफ्तर तक, हर जगह यह सोच गहराई से महसूस की जा सकती है।

साम्प्रदायिक एकता की मिसाल पेश करते इंजीनियर अनीस अहमद खां।

उनके घर पर रहने वाले रमेश कुमार की कहानी इस परिवार की सोच को और मजबूत करती है। रमेश एक दलित परिवार से आते हैं और बचपन में ही अनीस अहमद खान के घर आ गए थे। उस समय उनकी उम्र महज 13 साल थी। आज रमेश उनके परिवार का अहम हिस्सा बन चुके हैं। रमेश बताते हैं कि उन्हें हमेशा बच्चों की तरह प्यार मिला और उनके परिवार की जिम्मेदारी भी अनीस अहमद खान ने ही उठाई।

इंजीनियर अनीस अहमद खां और रमेश कुमार।

रमेश के लिए यह घर सिर्फ एक जगह नहीं, बल्कि एक ऐसा माहौल है जहां उन्हें पूरी आजादी और सम्मान मिला। वह रोजाना रामायण और श्रीमद्भगवद गीता का पाठ करते हैं, अपने कमरे में मंदिर बनाकर पूजा करते हैं और होली-दीवाली जैसे त्योहार पूरे उत्साह से मनाते हैं। उन्होंने कभी यह महसूस नहीं किया कि वह किसी दूसरे धर्म के परिवार में रह रहे हैं। अनीस अहमद ने उनके लिए जमीन खरीदी, मकान बनवाया और उनके भविष्य को सुरक्षित करने में हर संभव मदद की।

इंजीनियर अनीस अहमद खां

इंजीनियर अनीस अहमद खुद एक पठान परिवार से आते हैं और अपने धर्म का पूरी निष्ठा से पालन करते हैं। वह पांच वक्त के नमाजी हैं, लेकिन दूसरे धर्म का भी उतना ही सम्मान करते हैं। यही संतुलन उन्हें खास बनाता है। उनके लिए धर्म बांटने का नहीं, जोड़ने का माध्यम है।
सिर्फ व्यक्तिगत जीवन ही नहीं, समाज के प्रति भी उनकी सोच उतनी ही संवेदनशील है। वे धार्मिक भेदभाव से ऊपर उठकर हर जरूरतमंद की मदद करते हैं, चाहे वह किसी भी समुदाय का हो। यही वजह है कि हर वर्ग और हर धर्म के लोग उन्हें सम्मान की नजर से देखते हैं।
अब अनीस अहमद खान राजनीति के मैदान में भी सक्रिय हैं और कैंट विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के टिकट के प्रबल दावेदार माने जा रहे हैं। अगर पार्टी उन्हें मौका देती है, तो उनके समर्थकों को पूरा भरोसा है कि उनकी जीत तय हो सकती है। उनकी छवि एक ऐसे नेता की बन रही है, जो सिर्फ वादों की बात नहीं करता, बल्कि अपने जीवन से उदाहरण पेश करता है। वह दलितों को जोड़ने की सिर्फ बात ही नहीं करते बल्कि रमेश कुमार को अपने परिवार का हिस्सा बनाकर एक उदाहरण भी पेश करते हैं जो कोई और मुस्लिम नेता शायद ही कर पाए। अखिलेश यादव पीडीए का नारा देकर दलितों के लिए समाज में जिस बराबरी के दर्जे की बात करते हैं उसे इंजीनियर अनीस अहमद खां दशकों पहले आत्मसात कर चुके हैं। यही वजह है कि आला हजरत की नगरी में उनके साम्प्रदायिक सौहार्द की मिसाल दी जा रही है।
आज जब देश को आपसी भाईचारे और एकता की सबसे ज्यादा जरूरत है, ऐसे में इंजीनियर अनीस अहमद खान जैसे लोग उम्मीद की किरण बनकर सामने आते हैं। उनका घर यह साबित करता है कि अगर नीयत साफ हो और सोच व्यापक, तो धर्म कभी दीवार नहीं बनता—बल्कि इंसानियत के पुल का काम करता है।

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