नीरज सिसौदिया, बरेली
सियासत में जहां अक्सर मजहब और जाति की लकीरें खींचकर लोगों को बांटने की कोशिशें होती हैं, वहीं बरेली के डॉ. अनीस बेग अपनी पहचान साम्प्रदायिक सौहार्द, गंगा-जमुनी तहजीब और इंसानियत के रिश्तों को मजबूत करने की कोशिशों से बना रहे हैं। गरीबों के इलाज से लेकर जरूरतमंदों को राहत पहुंचाने तक और हिंदू-मुस्लिम भाईचारे का संदेश देने वाले आयोजनों से लेकर साझा सांस्कृतिक मंचों तक, उनकी गतिविधियों का केंद्र समाज का वह तबका है जिसकी आवाज अक्सर अनसुनी रह जाती है। शाहजहांपुर के मुशायरे में मुख्य अतिथि के रूप में उनकी मौजूदगी इसी सोच की एक और कड़ी बनी।

समाजसेवा और सामाजिक सद्भाव को अपनी सार्वजनिक पहचान का आधार बनाकर डॉ. बेग अब बरेली कैंट की सियासत में भी अपनी अलग जगह तलाश रहे हैं। यही वजह है कि अब उनकी लोकप्रियता बरेली तक सीमित न रहकर पड़ोसी जिलों की सरहदें भी पार कर चुकी है।

डॉ. बेग की सामाजिक पहचान का एक सिरा गंगा-जमुनी तहजीब से जुड़ता है। बरेली की सांस्कृतिक विरासत में धार्मिक विविधता और आपसी मेलजोल की लंबी परंपरा रही है। ऐसे समय में जब सामाजिक संवाद को मजबूत करने की जरूरत लगातार महसूस की जा रही है, वह अपने आयोजनों और सार्वजनिक कार्यक्रमों के जरिये हिंदू-मुस्लिम भाईचारे का संदेश देने की कोशिश करते हैं। उनके कार्यक्रमों में अलग-अलग समुदायों के लोगों की भागीदारी इस बात को रेखांकित करती है कि सामाजिक रिश्ते केवल नारों से नहीं, बल्कि साथ बैठने, एक-दूसरे को सुनने और साझा मंच बनाने से मजबूत होते हैं।

इसका ताजा उदाहरण शाहजहांपुर में देखने को मिला। गांधी भवन सभागार में यूथेरा पोएट्री की ओर से अखिल भारतीय कवि सम्मेलन और मुशायरे का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य गंगा-जमुनी तहजीब और आपसी भाईचारे का संदेश देना था। बरेली से पहुंचे डॉ. अनीस बेग ने बतौर मुख्य अतिथि समाजसेवी संजय गुप्ता के साथ दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। मंच पर कविता और शायरी थी, सभागार में अलग-अलग पृष्ठभूमि के श्रोता थे और आयोजन की मूल भावना साझा संस्कृति को सामने लाना था। डॉ. बेग ने इस आयोजन के लिए तमन्ना और आमिर का आभार जताया।

इस कार्यक्रम की अहमियत केवल इतनी नहीं थी कि बरेली का एक नेता शाहजहांपुर के मंच पर मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचा। अहम बात यह थी कि उन्हें ऐसे आयोजन से जोड़ा गया जिसका केंद्रीय विचार सामाजिक सद्भाव था। इससे यह भी जाहिर होता है कि उनकी पहचान का दायरा बरेली शहर तक सीमित नहीं रहना चाहता। मंडल के दूसरे जिलों में भी सामाजिक और सांस्कृतिक आयोजनों के साथ उनका जुड़ाव दिखाई देने लगा है। हालांकि किसी व्यक्ति की लोकप्रियता का वास्तविक आकलन व्यापक जनसमर्थन और उसके काम के असर से ही किया जा सकता है, लेकिन ऐसे मंचों पर मौजूदगी उसकी सार्वजनिक पहचान के विस्तार का संकेत जरूर देती है।

सियासत में पहचान बनाने के कई रास्ते होते हैं। कोई ताकत के सहारे आगे बढ़ता है, कोई संगठन में अपनी जगह बनाता है तो कोई बड़े नेताओं की नजदीकी को अपनी पूंजी बनाता है। लेकिन एक रास्ता ऐसा भी है, जिस पर चलने के लिए मंचों की चमक से ज्यादा उन गलियों की धूल से रिश्ता जोड़ना पड़ता है, जहां जिंदगी रोजमर्रा की जरूरतों से जूझती है। बरेली के चिकित्सक और समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता डॉ. अनीस बेग ने अपनी सार्वजनिक पहचान का एक बड़ा हिस्सा इन्हीं लोगों के बीच बनाने की कोशिश की है। उनके लिए समाजसेवा केवल राजनीतिक सक्रियता का एक हिस्सा नहीं, बल्कि उस सामाजिक जुड़ाव का माध्यम बनती दिखाई देती है, जिसके सहारे वह बरेली कैंट की सियासत में अपनी अलग जगह बनाते जा रहे हैं।
डॉ. अनीस बेग की कहानी का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उन्होंने अपनी पहचान केवल राजनीतिक मंचों तक सीमित नहीं रखी। डॉ. बेग ने समाजसेवा को व्यक्तिगत प्रयासों से आगे ले जाने के लिए इसवा नाम से संस्था की नींव भी रखी है। इसमें बरेली मंडल के डॉक्टरों को जोड़ने की पहल की गई है। इस प्रयास के पीछे विचार यह है कि चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े लोग अपनी विशेषज्ञता और संसाधनों के जरिये जरूरतमंदों की मदद कर सकें।

यहीं से डॉ. बेग की सामाजिक गतिविधियों का राजनीतिक अर्थ भी निकलता है। बरेली कैंट विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के टिकट के दावेदार माने जा रहे अनीस बेग अपनी दावेदारी के आधार में समाजसेवा, लोगों के बीच मौजूदगी और सामाजिक सद्भाव को प्रमुखता देते हैं। उनके लिए यह संदेश महत्वपूर्ण है कि राजनीति केवल चुनाव के समय मतदाताओं तक पहुंचने का नाम नहीं होनी चाहिए। जनता के बीच भरोसा बनाने के लिए उनके सुख-दुख में शामिल होना और उनकी रोजमर्रा की समस्याओं से जुड़ना भी जरूरी है।

अनीस बेग के सार्वजनिक सफर की एक तस्वीर साफ दिखाई देती है। एक ओर अस्पताल और जरूरतमंद परिवारों के बीच उनकी चिकित्सक की पहचान है, दूसरी ओर गरीब बस्तियों में मदद पहुंचाने की कोशिश और तीसरी ओर मुशायरे-कवि सम्मेलनों के जरिये सामाजिक एकता का संदेश। राजनीति में इन प्रयासों का कितना असर होगा, यह आने वाला समय तय करेगा। लेकिन किसी भी समाज में भरोसे की शुरुआत अक्सर बहुत छोटे कामों से होती है- किसी बीमार बच्चे को इलाज मिलना, किसी जरूरतमंद को ठंड से बचने के लिए गर्म कपड़ा मिलना या किसी मंच पर दो समुदायों का बिना किसी दूरी के साथ बैठना। डॉ. अनीस बेग अपनी सामाजिक पहचान को इन्हीं छोटे-छोटे प्रयासों के सहारे एक बड़े दायरे में ले जाने की कोशिश कर रहे हैं।




