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नींद चैन की आए कैसे
Share nowहाय यहाँ पर हमने देखे, गेहूँ के संग घुन पिसते और दलालों के कारण, भोले- भाले चप्पल घिसते। नींद चैन की आए कैसे, सपनों की खटिया टूटी बनता कोई काम न उनका, लगता है किस्मत रूठी बात नहीं करते अधिकारी, जो हैं यहाँ ऑन ड्यूटी और कर्मचारी भी क्यों अब, कसमें खाते हैं झूठी […]
व्यंग्य : नफ़रत के बीज और वोटों की बारिश
Share nowसुधीर राघव अंग्रेजी में जिसे यूनियन बोलते हैं, हिंदी में उसे संघ कहते हैं. इस तरह हर यूनियनिस्ट संघी है. संघी या यूनियनिस्ट होना बुरी बात नहीं है. बुरा तब लगता है जब मछली तेजराम खाए और कांटा संघी के फंस जाए. मछली का सारा स्वाद और प्रोटीन तेजराम को मिले और दर्द से […]
डालें अच्छे बीज कि कर्म की फसल संबको काटनी पड़ती है
Share nowकर्म की फसल सबको ही काटनी पड़ती है। अपने रास्ते की झाड़ी खुद ही छाँटनी पड़ती है।। और कोई नहीं बांटता हमारी करनी का कुफल। नफ़रत की धूल खुद ही हमें फाँकनी पड़ती है।। दुःख संघर्ष हार बाद भी जन्म विश्वास का होता है। जो कष्टऔर धैर्य से घबरा गया वो निराश होता है।। […]



