इंटरव्यू

तीन साल में हासिल किया मुकाम, बन गए हैं शायरी की दुनिया का बड़ा नाम, मिलिये शायरी की दुनिया के आनंद से

हुनर कभी उम्र देखकर नहीं आता. दुनिया में कई ऐसे लोग भी हुए हैं जिन्होंने छोटी सी उम्र में बड़ी-बड़ी उपलब्धियां हासिल कीं और अपनी अलग पहचान बनाई. ऐसा ही एक नाम है आनंद पाठक जिन्होंने महज तीन वर्ष पूर्व लेखन शुरू किया और आज शायरी की दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बना चुके हैं. साहित्य जगत के इस उभरते हुए सितारे का अंदाज बेहद जुदा है. उनकी शायरी सामाजिक परिवेश की हकीकत बयां करती है तो कभी प्रेम की पीड़ा का भी एहसास कराती है.
सुप्रसिद्ध युवा शायर आनंद पाठक का जन्म 4 फरवरी सन् 1988 को पिता रामपाल शर्मा एवं माता कुसुम कांता शर्मा के संभ्रांत परिवार में उत्तर प्रदेश के बरेली जनपद में हुआ था। उन्होंने पी.जी.डी.एम. इन मार्केटिंग एंड एच. आर., एम. ए. इकोनॉमिक्स तक शिक्षा व डिप्लोमा प्राप्त किया। सन् 2017 से लेखन कार्य प्रारंभ कर दिया अपनी बेहतरीन गजलों एवं उनकी अद्भुत प्रस्तुति के कारण आपने अल्प समय में ही शायरी की दुनिया में अपनी पहचान बना ली। आपकी मुख्य विधा गजल व मुक्तक हैं। अनेक स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित हुई हैं और अनेक संस्थाओं द्वारा आप को विभिन्न उपाधियों से अलंकृत किया जा चुका है। अदबी गुलदस्ता साहित्य एवं सामाजिक संस्था के उपाध्यक्ष आनंद पाठक जी कवि सम्मेलन व मुशायरे का आयोजन कराने में रूचि रखते हैं और कई आयोजन अपने संयोजन में करा चुके हैं।आप की गजलों का प्रसारण आकाशवाणी बरेली एवं आकाशवाणी रामपुर से हो चुका है। साथ ही प्रतिष्ठित न्यूज चैनल पर भी इनका काव्य पाठ प्रसारित हुआ है।

माता पिता के साथ आनंद पाठक

पाकिस्तान के मशहूर शायर जॉन एलिया को अपना आदर्श मानने वाले आनंद पाठक देश के कई शहरों में अखिल भारतीय मुशायरों में अपना काव्य पाठ कर लोगों का दिल जीत कर अपना मुरीद बनाने में कामयाब रहे हैं। आपको अपनी अधिकतर रचनाएं याद हैं, यही इनकी विशेषता है। मृदुभाषी आनंद पाठक मिलनसार व्यक्तित्व के धनी हैं. लोगों में शीघ्र घुलमिल जाते हैं. उनकी ही एक गज़ल प्रस्तुत है-

अंधों को अपना हाथ दिखाना फ़िज़ूल है
बहरों को हाल दिल का सुनाना फ़िज़ूल है।

नफ़रत की आँधियों की हैं अब साज़िशें यहाँ
उल्फ़त का इक चराग़ जलाना फ़िज़ूल है।

जिनके सबब न सर को उठा कर ही चल सकें
ऐसे गुनाह करना कराना फ़िज़ूल है।

इक बात जान लीजिये जब दिल नही मिलें
तब रूठना फ़िज़ूल मनाना फ़िज़ूल है।

जब पालते हों आप ही ख़ुद आस्तीं में साँप
इल्ज़ाम दुश्मनों पे लगाना फ़िज़ूल है।

जब आप पर इलाज नहीं मेरे दर्द का
फिर बात आपको तो बताना फ़िज़ूल है।

मतलब नहीं है आपको *पाठक* से जब कोई
फिर आपका यूँ हक़ भी जताना फ़िज़ूल है।

प्रस्तुतकर्ता -उपमेंद्र सक्सेना एड. (साहित्यकार) बरेली

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