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हिंदू बनाते हैं न मुसलमान बनाते हैं, इंसान हैं पर ‘धरती के भगवान’ बनाते हैं, पढ़ें मो. कलीमुद्दीन का स्पेशल इंटरव्यू

‘मस्जिदों पर जान दी,  कुर्बां शिवालों पर हुए
कितने काले तजुर्बे उजली किताबों पर हुए’
हिन्दू-मुस्लिम के बंटवारे ने हिन्दुस्तान की धरती को न जाने कितनी बार लहू के रंग में रंग दिया. न जाने कितने सियासतदानों ने निजी स्वार्थ के लिए हिंदू-मुस्लिम के नाम पर जनता को बांटने का काम किया. ऐसे फिरकापरस्तों की वजह से विकास की दौड़ में हिन्दुस्तान बहुत पीछे छूट गया. ये लोग कभी घर वापसी के नाम पर हिंदू बनाते हैं तो कभी लव जिहाद के नाम पर मुसलमान बनाते हैं लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हुए जिन्होंने इंसान को न हिंदू बनाया और न ही मुसलमान बनाया. उन्होंने सिर्फ इंसान को इंसान बनाया. आज हम आपको रूबरू कराने जा रहे हैं उत्तर प्रदेश के बरेली जिले की एक ऐसी ही शख्सियत से जो न सिर्फ होनहारों को इंसान बनाते हैं बल्कि उन्हें ‘धरती का भगवान’ कहलाने लायक भी बनाते हैं. इस शख्सियत का नाम है मोहम्मद कलीमुद्दीन, जो नवाबगंज तहसील के एक छोटे से गांव के रहने वाले किसान के बेटे हैं. बरेली के राजेंद्र नगर में वह ओमेगा क्लासेस के नाम से एक कोचिंग संस्थान चलाते हैं जिसमें बच्चों को मेडिकल एंट्रेस एग्जाम की तैयारी कराई जाती है. वैसे तो कोचिंग की सालाना फीस 72 हजार रुपये है लेकिन गरीब बच्चों से वह कोई फीस नहीं लेते. हर साल वह लगभग सौ से भी अधिक गरीब बच्चों को नि:शुल्क कोचिंग भी मुहैया करा रहे हैं. इतना ही नहीं जिन गरीब बच्चों के पास रहने और खाने के लिए पैसे नहीं होते उन्हें कलीमुद्दीन नि:शुल्क हॉस्टल की सुविधा भी मुहैया कराते हैं. कलीमुद्दीन के मन में यह ख्याल कैसे आया? उनकी कोचिंग से पढ़े हुए कितने गरीब बच्चे आज एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहे हैं? क्या कलीमुद्दीन सिर्फ प्रोफेशनल डॉक्टर बनाने तक ही सीमित हैं या बच्चों को वाकई ‘धरती का भगवान’ बनाना चाहते हैं? कलीमुद्दीन ने सिर्फ मुस्लिम बच्चों को ही मुफ्त कोचिंग दी है अथवा दूसरे धर्म के बच्चों को भी तरजीह देते हैं? गरीब बच्चों को आइडेंटिफाई करने का उनका क्राइटेरिया क्या है? ऐसे कई मुद्दों पर इंडिया टाइम 24 के संपादक नीरज सिसौदिया से ओमेगा क्लासेस के डायरेक्टर मो. कलीमुद्दीन ने खुलकर बात की. पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश…
सवाल : आपका बचपन कहां बीता, पारिवारिक पृष्ठभूमि क्या है?
जवाब : मैं मूल रूप से नवाबगंज के गांव टहा प्यारी नवादा का रहने वाला हूं. मेरे पिता मोहम्मद फरीजुद्दीन किसान हैं. हम तीन भाई एक बहन हैं जिसमें मैं सबसे छोटा हूं. संयुक्त परिवार है हमारा. मेरा बचपन अलग-अलग जगहों पर बीता. मेरी प्राथमिक शिक्षा मुजैना में हुई. उसके बाद मेरा सिलेक्शन स्पोर्ट्स कोटे से कुमाऊँ रेजीमेंट केंद्र, रानीखेत में हो गया तो मैंने वहां पढ़ाई की लेकिन एक-दो साल में ही मैं वहां से वापस आ गया और आगे की पढ़ाई मैंने बरेली में की. बरेली के बाद मैं मेडिकल की तैयारी करने कानपुर चला गया. वहीं से मैंने पीजी विद साइंस किया.

सवाल : बरेली में कोचिंग खोलने का विचार कैसे आया?
जवाब : उस दौर में बरेली में मेडिकल के लिए कोई अच्छी कोचिंग नहीं थी, इसलिए बरेली और आसपास के लोगों को मेडिकल की तैयारी के लिए दूसरे शहरों का रुख करना पड़ता था. बाहर जाने वाले छात्रों को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता था. उन मुश्किलों को झेलते हुए लक्ष्य हासिल करना बेहद कठिन हो जाता है. ऐसे में कई छात्रों की जिंदगी का कीमती समय बर्बाद हो जाता है और कई छात्रों को निराश होकर घर वापस लौटना पड़ता है जिससे वे हताश हो जाते हैं. मैंने इस दर्द को सहा है और गहराई से महसूस भी किया है. जब मैं तैयारी करने बाहर गया तो मुझे भी काफी परेशानियां झेलनी पड़ीं. तभी मेरे मन में विचार आया कि अब अपने शहर और आसपास के लोगों के लिए कुछ ऐसी व्यवस्था की जाए जिससे मेडिकल लाइन में करियर बनाने के इच्छुक छात्रों को मेडिकल की तैयारी के लिए बाहर न जाना पड़े. मुझे लगा कि अगर बरेली में ही अच्छी कोचिंग होगी तो यहां के छात्रों को दूसरे शहरों में नहीं जाना पड़ेगा. बस इसी सोच को लेकर वर्ष 2013 में मैंने ओमेगा क्लासेस की शुरुआत की.

कोचिंग में बच्चों को पढ़ाते मो. कलीमुद्दीन.
Omega classes में पढ़ते बच्चे.

सवाल : आप गरीब बच्चों को मुफ्त कोचिंग भी दे रहे हैं. इसकी प्रेरणा कहां से मिली, क्या बिहार के सुपर-30 कोचिंग से मिली?
जवाब : देखिये, सुपर-30 बहुत अच्छा काम कर रहा है लेकिन गरीबों एवं जरूरतमंद बच्चों को नि:शुल्क कोचिंग देने के लिए मुझे उन बच्चों के दर्द ने प्रेरित किया. ग्रामीण परिवेश से ताल्लुक रखने की वजह से मैंने उन गरीबों के दर्द को बेहद करीब से जाना और महसूस किया है. इसके अलावा जब मैं कानपुर में था तो वहां मेरी मुलाकात कई ऐसे बच्चों से हुई जो बेहद गरीब परिवार से थे लेकिन पढ़ने में बहुत अच्छे थे. उनकी सफलता की राह का सबसे बड़ा रोड़ा गरीबी थी. वे पैसों के अभाव में कोचिंग करने में असमर्थ थे जिस कारण उन्हें सही गाइडेंस नहीं मिल पा रहा था. वे दिन-रात मेहनत करते थे पर सफलता हमेशा उनसे दूर ही रहती थी. कुछ छात्र सफल होते भी थे तो उन्हें या तो बीएएमएस में जगह मिलती थी या फिर ऐसे प्राइवेट कॉलेज मिलते थे जिनकी फीस वे अपना सब कुछ बेचकर भी नहीं चुका पाते थे. मैंने उनकी मेहनत और उनके इस दर्द को बेहद करीब से देखा और महसूस किया था तो मुझे लगा कि ऐसे बच्चों के लिए मुझे कुछ करना चाहिए. जब मैंने कोचिंग की शुरुआत की तो उस वक्त सामर्थ्य के अनुसार मैंने पहले दो साल 10-15 ऐसे जरूरतमंद बच्चों को तलाश करके नि:शुल्क कोचिंग देना शुरू कर दिया. 2 साल तक मैंने कड़ी मेहनत की और कोचिंग के कई बच्चों का सिलेक्शन देश के प्रतिष्ठित सरकारी कॉलेजों में हो गया. कोचिंग के साथ है मेरी लोकप्रियता भी बढ़ने लगी. फिर पूरे शहर के लोग जान गए कि कलीम सर होनहार जरूरतमंद बच्चों को नि:शुल्क कोचिंग कराते हैं. मेरे कोचिंग में गरीब बच्चों की संख्या बढ़ने लगी तो वर्ष 2016 में मैंने फैसला किया कि मैं हर साल सौ होनहार जरूरतमंद बच्चों को नि:शुल्क कोचिंग कराऊंगा. तब से लेकर आज तक मैं हर साल सौ बच्चों को नि:शुल्क कोचिंग देता हूं. मुझे खुशी है कि मेरी मेहनत रंग ला रही है और अब तक लगभग 200-250 बच्चे एमबीबीएस मेें सिलेक्ट हो चुके हैं जिनमेें चार दर्जन से भी अधिक बच्चे नि:शुल्क कोचिंग पाने के बाद देश के विभिन्न प्रतिष्ठित सरकारी कॉलेजों में एमबीबीएस में की पढ़ाई कर रहे हैं.
सवाल : आज हर कोई खुद को जरूरतमंद बताता है और नि:शुल्क कोचिंग करना चाहता है. ऐसे में वास्तविक जरूरतमंद बच्चों को कैसे आइडेंटिफाई करते हैं?
जवाब : हम सबसे पहले बच्चे की मार्कशीट देखते हैं कि वह वाकई में उस लायक है या नहीं कि उसे मुफ्त कोचिंग दी जा सके और वह मेडिकल एंट्रेंस एग्जाम क्वालीफाई कर सकेगा या नहीं. बच्चे की मार्कशीट देखने के बाद हम उसके घर का, परिवार का सर्वे कराते हैं. सर्वे के दौरान अगर हमें यह कंफर्म होता है कि बच्चा वाकई जरूरतमंद है और उसकी मदद करनी चाहिए तो हम उसे नि:शुल्क कोचिंग देते हैं. हम यह नहीं देखते कि बच्चा हिन्दू है या मुस्लिम, बरेली का है या दूसरे शहर का या फिर दूसरे राज्य का. बस बच्चा होनहार और जरूरतमंद होना चाहिए. अगर बच्चा पढ़ना चाहता है लेकिन हॉस्टल का खर्च भी नहीं उठा सकता है तो हम उन बच्चों के हॉस्टल के पैसे भी अपने पास से देते हैं जिसमें उन्हें रहने के साथ ही खाने पीने की सुविधा भी मिलती है. क्योंकि अब पूरे शहर को यह पता है कि ओमेगा क्लासेस में गरीब बच्चों को मुफ्त कोचिंग की सुविधा उपलब्ध हो सकती है इसलिए बच्चे खुद ही हम से संपर्क कर लेते हैं.

एमबीबीएस में सिलेक्ट बच्चे के साथ मो. कलीमुद्दीन.

सवाल : कुछ सफल बच्चों का जिक्र करना चाहेंगे?
जवाब : जरूर, वैसे तो बरेली मंडल के साथ ही उत्तराखंड के भी कुछ बच्चे ओमेगा क्लासेस से नि:शुल्क कोचिंग लेने के बाद देशभर के प्रतिष्ठित सरकारी कॉलेजों से एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहे हैं. इनमें एक बच्ची फरहत जहां है जिसकी आर्थिक स्थिति काफी खराब थी पर वह बहुत मेहनती थी. उसने इसी साल क्वालीफाई किया और वर्तमान में वह गोरखपुर स्थित एम्स से एमबीबीएस की पढ़ाई कर रही है. नवाबगंज का एक छात्र गिरिजाशंकर सैफई (इटावा) मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस कर रहा है. नुसरत फातिमा राम मनोहर लोहिया मेडिकल कॉलेज, लखनऊ और सौरभ पटेल कन्नौज के सरकारी मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस कर रहा है.

एमबीबीएस में सिलेक्ट जरूरतमंद बच्ची के साथ ओमेगा क्लासेस के डायरेक्टर मो. कलीमुद्दीन.


सवाल : डॉक्टर्स को वैसे तो धरती का भगवान कहा जाता है लेकिन आजकल ज्यादातर डॉक्टर्स मरीजों से पैसे ऐंठने का काम ही कर रहे हैं. लोग तो उन्हें सफेदपोश लुटेरे तक कहने लगे हैं. ऐसे में आपको क्या लगता है कि आप जिन बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा दे रहे हैं क्या वे आगे जनता को लूटने का काम नहीं करेंगे?
जवाब : देखिए, हम सिर्फ उन्हें कोचिंग ही नहीं देते बल्कि समाज के प्रति एक डॉक्टर की जिम्मेदारी का एहसास भी कराते हैं. हम उन्हें इस बात के लिए हमेशा प्रेरित करते हैं कि डॉक्टर बनने के बाद वह डॉक्टर की उस गरिमा को बरकरार रखें जिसके लिए डॉक्टरों को धरती का भगवान कहा जाता है. मुझे पूरा भरोसा है कि मेरी कोचिंग से जो भी बच्चा पढ़कर डॉक्टर बनेगा वह अपनी सामाजिक जिम्मेदारी भी पूरी ईमानदारी के साथ निभाएगा.

एमबीबीएस में सिलेक्ट हुए कोचिंग के बच्चों के साथ डायरेक्टर मो. कलीमुद्दीन.

सवाल : आप छात्रों को तो समाजसेवा सेवा के लिए प्रेरित करते हैं लेकिन क्या खुद भी कभी समाजसेवा का कोई काम किया है?
जवाब : जी हां, मैं दूसरों को सलाह तभी देता हूं जब खुद उस सलाह पर अमल करता हूं. मैंने समाजसेवा से जुड़े कार्यों में हमेशा अहम जिम्मेदारी निभाई है. लगभग चार साल पहले मैंने ओमेगा वेलफेयर सोसाइटी के नाम से एक एनजीओ बनाया था. हमारा एनजीओ न तो सरकार से कोई मदद ले रहा है और न ही हम लोगों से कोई चंदा लेते हैं. हमारी सोसाइटी में जो वर्किंग कमेटी है वह अपनी आमदनी से ही समाजसेवा के कार्य करती है. पिछले साल जब लॉकडाउन लगा था तो ओमेगा के बैनर तले ही हमने लॉकडाउन के पहले दिन से ही जरूरतमंदों को भोजन, राशन और आवश्यक सामान बांटे थे. समय-समय पर कंबल वितरण आदि के कार्य भी करते रहते हैं. साथ ही जरूरतमंद बच्चों को प्रशिक्षित शिक्षकों से कोचिंग दिलवाना भी तो समाजसेवा का ही कार्य है.
सवाल : वर्तमान शिक्षा और चिकित्सा प्रणाली को आप किस नजरिये से देखते हैं, इसमें सुधार कैसे हो सकता है?
जवाब : देखिये, हमारे देश में जो दो सबसे अहम क्षेत्र हैं वे मेडिकल और एजुकेशन के हैं लेकिन दोनों का ही बुरा हाल है. दरअसल, समस्या यह है कि हमारी सरकारों को जहां पैसा लगाना चाहिए वहां नहीं लगाकर दूसरी जगह लगा दिया. मैं दूसरी जगह पैसा लगाने के खिलाफ नहीं हूं लेकिन हमारी जो सबसे बड़ी जरूरत है शिक्षा और स्वास्थ्य की, पहले उस पर ध्यान दिया जाना चाहिए था जो हम नहीं दे पाए. इसीलिए आज हमारा देश, हमारा प्रदेश और हमारा शहर परेशान है. दोनों ही क्षेत्रों में हम बहुत पीछे छूट गए हैं. हमारी शिक्षा प्रणाली रोजगारपरक नहीं है. हम बीएससी, एमएससी की डिग्रियां बांट रहे हैं लेकिन जब वह डिग्री वाला किसी प्राइवेट सेक्टर में नौकरी मांगने जाता है तो उसे रिजेक्ट करके दसवीं पास आईटीआई वाले को प्राथमिकता दी जाती है. तो फिर इन डिग्रियों की आवश्यकता क्यों? सरकार को डिग्री कोर्स भी रोजगारपरक तैयार करने चाहिए जिससे लोगों को रोजगार के लिए भटकना न पड़े. इसके लिए हमें जमीनी स्तर पर जरूरतों का एनालिसिस करना होगा. प्रोफेशनल एजुकेशन बहुत जरूरी है.

सवाल : अपनी सफलता का श्रेय आप किसे देते हैं?

जवाब : मेरी सफलता में सबसे अहम योगदान हमारी फैकल्टी का है. क्योंकि एक अच्छी फैकल्टी के बिना यह असंभव था. हमारी वेेेलक्वालीफाइड फैकल्टी ने दिन-रात मेहनत कर बच्चों को सही दिशा में गाइड किया जिसकी वजह से आज हमारे बच्चे सफलता के शिखर को हासिल कर पाए हैं. साथ ही मेरे परिवार का अमूल्य योगदान रहा जिन्होंने हर कदम पर मेरा साथ दिया. मेरे फैसले को स्वीकार किया.

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