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इज्जतनगर इंस्पेक्टर रहे केके वर्मा और एसआई पर एफआईआर कराने कोर्ट पहुंची डा. अनुपमा

नीरज सिसौदिया, बरेली
दस लाख रुपये रिश्वत न मिलने पर झूठी रिपोर्ट दर्ज करने और न्यायालय में गलत आरोप पत्र दाखिल कर हिस्ट्रीशीटर की पत्नी को लाभ पहुंचाने के आरोप में इज्जतनगर इंस्पेक्टर रहे  केके वर्मा और सब इंस्पेक्टर मोहित चौधरी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने के लिए डा. अनुपमा राघव ने विशेष न्यायाधीश भ्रष्टाचार निवारण बरेली प्रथम की अदालत में गुहार लगाई है.
अदालत में दिए गए प्रार्थना पत्र में डा. अनुपमा राघव ने एक मामले के विवेचना अधिकारी सब इंस्पेक्टर मोहित चौधरी (अपराध संख्या 805 बटा 2019 थाना इज्जत नगर हाल तैनाती चौकी प्रभारी फरीदपुर थाना बहेड़ी, जनपद बरेली) व इज्जत नगर रहे इंस्पेक्टर केके वर्मा को प्रतिवादी बनाया है. डा. अनुपमा ने सीआरपीसी की धारा 156(3) के अंतर्गत न्यायालय अपर सत्र न्यायाधीश/विशेष न्यायाधीश भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम प्रथम बरेली की अदालत में दिए गए प्रार्थना पत्र में कहा है कि थाना इज्जत नगर में वर्ष 2017 में एनसीआर संख्या 237/2017 बनाम अज्ञात लज्जावती पत्नी उमाशंकर सिंह निवासी सैदपुर हॉकिंस थाना इज्जत नगर द्वारा दर्ज कराई गई थी. वादिनी का पति उमाशंकर सिंह चिन्हित भूमाफिया है. वह हिस्ट्री शीट संख्या 10b अपराध संख्या 256/17 के तहत गुंडा एक्ट का चालानी व उत्तर प्रदेश संगठित गिरोह बंदी निवारण अधिनियम के आरोपी के गिरोह का सदस्य है. इस मामले में पुलिस द्वारा उमाशंकर की संपत्ति भी गिरोह बंदी निवारण अधिनियम की धारा 14(1) के तहत जब्त की जा चुकी है. उन्होंने कहा कि उपरोक्त एनसीआर दर्ज कराने से पूर्व वादी मुकदमा के परिजनों व उसके गिरोह के सदस्यों के द्वारा कई झूठी प्रथम सूचनाएं वर्ष 2014, 2015, 2016, 2017 में प्रार्थिनी व उसके परिजनों के विरुद्ध नामजद दर्ज कराई जा चुकी थीं. जिन्हें पुलिस द्वारा एक्सपंज/एफआर के जरिए झूठा पाकर समाप्त किया गया था. उन्होंने कहा कि प्रभारी निरीक्षक थाना इज्जत नगर रहे केके वर्मा ने उनसे दस लाख रुपये की रिश्वत मांगी थी. रिश्वत न देने पर केके वर्मा की मिलीभगत के चलते अज्ञात एनसीआर को कूट, कपट का सहारा लेकर अपराध संख्या 805/2019 (धारा 324 323 504) को विधि द्वारा वर्णित प्रक्रिया के विपरीत दर्ज करवाया गया तथा विवेचना अपने अधीनस्थ तैनात उपनिरीक्षक मोहित चौधरी द्वारा कराई गई. विवेचना अधिकारी मोहित चौधरी द्वारा विवेचना ग्रहण करते ही प्रार्थिनी के बहनोई महेश पांडेय का बयान व मुकदमे को एफआईआर के जरिए खत्म करने के लिए दिनांक 25 मार्च 2020 को दो लाख रुपये नगद व प्रार्थिनी के कर्मचारी नगर स्थित प्लॉट में से 200 गज भूमि देने की मांग की गई. मना करने पर केके वर्मा और मोहित चौधरी द्वारा प्रार्थिनी द्वारा भेजे गए साक्ष्यों को नजरअंदाज करते हुए व पुलिस रेगुलेशन एक्ट 1801/13 संख्या 104 से 107 में दिए गए प्रावधानों को अनदेखा कर तथा दंड प्रक्रिया संहिता में दिए गए प्रावधानों को दरकिनार करते हुए झूठा आरोप पत्र माननीय न्यायालय को प्रेषित कर दिया गया. जोकि लोक सेवक द्वारा अपने पद एवं अधिकारों का सरासर दुरुपयोग है. साथ ही भारतीय दंड विधान की सुसंगत धाराओं अपराधिक षड्यंत्र, तथ्यों को छिपाना अथवा तोड़ मरोड़ कर अमुक व्यक्ति को लाभ पहुंचाना व अमुक व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने की नीयत से फर्जी साक्ष्य पेश करते हुए धोखाधड़ी का अपराध किया गया है. उस समय मौके पर परमानंद पुत्र जगदीश व अमर पुत्र केसरी निवासी गण किला छावनी थाना किला, जिला बरेली भी मौजूद थे. अनुपमा राघव ने कहा है कि वह एक प्रतिष्ठित परिवार की सम्मानित महिला हैं. समाज में उनकी अच्छी छवि है. प्रतिवादी गण के उक्त कृत्यों से उन्हें आर्थिक, शारीरिक एवं मानसिक क्षति हुई है तथा समाज में उनकी प्रतिष्ठा पर भी बुरा असर पड़ा है. इसलिए इंस्पेक्टर केके वर्मा और एसआई मोहित चौधरी के विरुद्ध उचित धाराओं में रिपोर्ट दर्ज कर कानूनी कार्रवाई करना न्याय हित में अत्यंत आवश्यक है.
डॉ. अनुपमा राघव ने अदालत में दिए गए प्रार्थना पत्र में यह भी कहा है कि उन्होंने इस घटना की शिकायत पुलिस के उच्च अधिकारियों से भी की थी लेकिन उन्होंने भी कोई कार्रवाई नहीं की. इसलिए उन्हें न्यायालय की शरण लेनी पड़ी. डॉ. अनुपमा ने प्रस्तुत तथ्यों के आधार पर दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 156(3) के अंतर्गत प्रतिवादीगण के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की सुसंगत धाराओं में एफआईआर पंजीकृत करा कर विवेचना कराने उपरांत उन्हें दंडित करने की मांग की है. इसमें वरिष्ठ अधिवक्ता त्रिलोकी सिंह कनौजिया, फौजदारी के नामचीन अधिवक्ता लवलेश पाठक और एडवोकेट अनंत मित्तल की अहम भूमिका रही.
क्या है धारा 156(3)
एडवोकेट अनंत मित्तल बताते हैं कि कई बार ऐसा होता है जब पुलिस शिकायतकर्ता की शिकायत पर एफआईआर दर्ज नहीं करती है. इन परिस्थितियों में पीड़ित पक्ष को यह अधिकार है कि वह सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत अदालत में गुहार लगा सकता है.

एडवोकेट अनंत मित्तल

अगर न्यायालय को यह लगता है कि मामले में कोई आपराधिक कृत्य हुआ है तो वह संबंधित थाना को एफआईआर दर्ज करने के लिए निर्देशित कर सकता है.

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