यूपी

सुप्रिया एरन के भाजपा में आने से कांग्रेस को नुकसान हो या न हो पर सपा को फायदा जरूर होगा, जानिए कैसे?

नीरज सिसौदिया, बरेली
भाजपा के मंच पर पूर्व मेयर और कांग्रेस नेत्री सुप्रिया एरन की मौजूदगी से सियासी हलचल तेज हो गई है. सुप्रिया एरन के यह स्पष्ट करने के बावजूद कि वह कांग्रेस में ही रहेंगी, चर्चाओं का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा. सियासतदानों से लेकर आम जनता तक कयास लगाने में लगे हैं. फिलहाल सबसे अहम चर्चा जो बाजार में हो रही है वह यह कि सुप्रिया एरन के भाजपा में आने से किसे फायदा होगा और किसे नुकसान? फायदे और नुकसान के इस गणित को समझने के लिए पहले कैंट विधानसभा सीट की सामाजिक संरचना को समझना होगा. तो आइये जानते हैं कि इस सीट की सामाजिक संरचना क्या है? कैंट विधानसभा सीट मुस्लिम और वैश्य बाहुल्य सीट है. यही वजह है कि भाजपा हमेशा यहां से वैश्य प्रत्याशी उतारती रही है और समाजवादी पार्टी मुस्लिम प्रत्याशी. मुस्लिम और वैश्य के अलावा यहां ब्राह्मण, क्षत्रिय, दलित और पिछड़ों की मिलीजुली आबादी है.
मुस्लिम वोटर पिछले काफी समय से भाजपा से नाराज चल रहे हैं लेकिन एकमुश्त वोट किसी एक पार्टी के खाते में नहीं जाता. यह कांग्रेस और समाजवादी पार्टी में बंटता रहा है. रही-सही कसर आईएमसी का उम्मीदवार पूरी कर देता है. कांग्रेस के खाते में मुस्लिम वोट जाने की एक बड़ी वजह पूर्व सांसद प्रवीण सिंह एरन भी हैं. प्रवीण सिंह एरन कैंट के मुस्लिम समाज में भी गहरी पैठ रखते हैं. एक बड़ी मुस्लिम आबादी एरन परिवार से दशकों से जुड़ी हुई है. ये वे लोग हैं जो जानते हैं कि एरन विधानसभा चुनाव नहीं जीत सकते लेकिन फिर भी उन्हें वोट डालते हैं. परिस्थितियां चाहे कैसी भी रही हों इस वर्ग ने एरन का पूरा साथ दिया है. सियासी जानकारों का मानना है कि अगर सुप्रिया एरन अब भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो जाती हैं तो यह मुस्लिम वोट कांग्रेस से तो जरूर टूट जाएगा लेकिन भाजपा के खाते में नहीं जाएगा. दलितों की राजनीति करने वाली बहुजन समाज पार्टी क्योंकि अपना सियासी वजूद खोती जा रही है इसलिए उसके पाले में भी यह वोट गिरना मुश्किल है. उधर, कांग्रेस से टिकट की दावेदारी कर हाजी इस्लाम बब्बू भी अब कैंट सीट को लेकर उतने उत्साहित नहीं हैं. सियासी सूत्र बताते हैं कि बब्बू ने भले ही प्रचार प्रसार कैंट विधानसभा क्षेत्र में किया हो पर अब वह नवाबगंज में सियासी जमीन तलाश रहे हैं. ऐसे में समाजवादी पार्टी ही एकमात्र ऐसी पार्टी बचती है जो प्रवीण सिंह एरन के मुस्लिम समर्थकों का ठिकाना हो सकती है. अगर एरन के मुस्लिम समर्थक सपा में शामिल हुए तो समाजवादी पार्टी को इसका चुनाव में लाभ मिलेगा और वोटों का बिखराव नहीं होगा. एकमुश्त मुस्लिम वोट अगर समाजवादी पार्टी के खाते में गिरा और अगर यादव, ब्राह्मण और छोटी जातियों के कुछ वोट समाजवादी पार्टी ने अपने खाते में कर लिए तो भाजपा को यह सीट गंवानी भी पड़ सकती है.
कुल मिलाकर अगर सुप्रिया एरन भाजपा का दामन थामती हैं तो कांग्रेस का कोई नुकसान नहीं होने वाला क्योंकि कांग्रेस के पास खोने के लिए कुछ नहीं है लेकिन समाजवादी पार्टी को इसका भरपूर लाभ मिलेगा.

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