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पटेल चौक के धरने में खुलकर सामने आई सपा की खेमेबंदी, यादव नेताओं की एकजुटता ने दिए बड़े राजनीतिक संकेत, शुभलेश यादव के नेतृत्व पर उठे मौन सवाल, जानिये क्या हुआ धरने के दौरान?

नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली में गन्ना किसानों के बकाया भुगतान समेत विभिन्न मुद्दों को लेकर समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री भगवत सरन गंगवार की ओर से आयोजित धरना प्रदर्शन अब केवल किसानों के मुद्दों तक सीमित नहीं रह गया है। पटेल चौक पर आयोजित इस धरने ने जिले की समाजवादी राजनीति के भीतर चल रही खींचतान को खुलकर सामने ला दिया।
धरने की सबसे बड़ी राजनीतिक तस्वीर यह रही कि सपा के नवनियुक्त जिलाध्यक्ष शुभलेश यादव के कार्यभार संभालने के बाद पहली बार जिले के कई प्रभावशाली यादव नेता एक मंच पर दिखाई दिए। राजनीतिक गलियारों में इस सामूहिक मौजूदगी को एक बड़े शक्ति प्रदर्शन के तौर पर देखा जा रहा है। खास बात यह रही कि इनमें वे नेता भी शामिल थे जिन्होंने कुछ समय पहले सपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी के स्वागत कार्यक्रम से दूरी बना ली थी।


पटेल चौक पर आयोजित धरने में पूर्व विधायक महिपाल सिंह यादव, प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य अरविंद सिंह यादव, निवर्तमान जिला महासचिव संजीव यादव, योगेश सिंह यादव, शिव प्रताप सिंह यादव, डॉ. जीराज सिंह यादव और पूर्व ब्लॉक प्रमुख आदेश सिंह यादव उर्फ गुड्डू समेत जिले के कई प्रभावशाली यादव नेता मौजूद रहे। इन नेताओं की एक साथ मौजूदगी ने यह साफ संकेत दे दिया कि जिले के यादव खेमे के भीतर आपसी तालमेल पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हुआ है।
हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा चर्चा जिस बात की रही, वह जिलाध्यक्ष शुभलेश यादव की भूमिका रही। दिलचस्प बात यह रही कि शुभलेश यादव धरने की शुरुआत में मौजूद नहीं थे और बाद में धरना स्थल पर पहुंचे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि धरने में यादव नेताओं की शुरुआती सामूहिक मौजूदगी और बाद में जिलाध्यक्ष का पहुंचना अपने आप में कई राजनीतिक संकेत छोड़ गया।
दरअसल, पिछले कुछ समय से बरेली समाजवादी पार्टी की राजनीति में अंदरूनी असंतोष की चर्चाएं लगातार तेज रही हैं। जिलाध्यक्ष पद पर शुभलेश यादव की नियुक्ति के बाद पार्टी के कई पुराने और प्रभावशाली नेताओं के बीच असहजता की चर्चा राजनीतिक गलियारों में होती रही है। हालांकि सार्वजनिक तौर पर किसी नेता ने खुलकर कुछ नहीं कहा, लेकिन कई मौकों पर यह असंतोष अप्रत्यक्ष रूप से दिखाई देता रहा।
नसीमुद्दीन सिद्दीकी के स्वागत कार्यक्रम से कुछ प्रमुख यादव नेताओं की दूरी को भी उसी नाराजगी से जोड़कर देखा गया था। अब भगवत सरन गंगवार के धरने में उन्हीं नेताओं की सामूहिक मौजूदगी ने इस चर्चा को और मजबूत कर दिया है कि जिले में यादव नेतृत्व एक अलग राजनीतिक संदेश देना चाहता है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यह धरना केवल किसानों के मुद्दों पर सरकार को घेरने का कार्यक्रम नहीं था, बल्कि इसके जरिए पार्टी के भीतर शक्ति संतुलन का प्रदर्शन भी किया गया। भगवत सरन गंगवार लंबे समय से जिले में संगठन और कुर्मियों की राजनीति का मजबूत चेहरा माने जाते हैं। ऐसे में उनके नेतृत्व वाले कार्यक्रम में यादव नेताओं की भारी मौजूदगी को आने वाले विधानसभा चुनावों से पहले शक्ति प्रदर्शन के तौर पर भी देखा जा रहा है।
धरने के दौरान गन्ना किसानों के भुगतान, बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी और कानून व्यवस्था जैसे मुद्दों को लेकर भाजपा सरकार पर तीखे हमले किए गए। वक्ताओं ने आरोप लगाया कि सरकार किसानों की समस्याओं को लेकर गंभीर नहीं है और गन्ना किसानों का बकाया भुगतान लंबे समय से अटका हुआ है। लेकिन धरने के राजनीतिक मायने किसानों के मुद्दों से कहीं ज्यादा गहरे माने जा रहे हैं। समाजवादी पार्टी के भीतर लंबे समय से चल रही खेमेबंदी अब सार्वजनिक आयोजनों में भी दिखाई देने लगी है। एक तरफ जिलाध्यक्ष शुभलेश यादव हैं, वहीं दूसरी तरफ जिले के कई पुराने और प्रभावशाली यादव नेता हैं, जो अपनी अलग ताकत का एहसास कराने में जुटे दिखाई दे रहे हैं।
धरने के जरिए यादव नेताओं ने दो स्पष्ट संदेश देने की कोशिश की है। पहला, जिले का यादव नेतृत्व अभी भी एकजुट है और उसकी राजनीतिक ताकत बरकरार है। दूसरा, संगठनात्मक स्तर पर लिए गए कुछ फैसलों को लेकर भीतर ही भीतर असंतोष कायम है।
आने वाले दिनों में बरेली की समाजवादी राजनीति किस दिशा में जाती है, यह काफी हद तक इसी शक्ति संतुलन पर निर्भर करेगा। लेकिन फिलहाल पटेल चौक का यह धरना सपा की अंदरूनी राजनीति में नए समीकरणों और बढ़ती हलचल का बड़ा संकेत जरूर दे गया है।

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