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विरोधियों के अजीबो-गरीब तर्क, सुल्‍तान बेग के भाई हैं डा. अनीस बेग इसलिए नहीं मिलना चाहिए टिकट, क्‍या सुल्‍तान बेग का भाई होना अपराध है? पढ़ें क्‍या है पूरा मामला?

नीरज सिसौदिया, बरेली
विधानसभा चुनाव में टिकट के दावेदार अजीबोगरीब तर्क देते नजर आ रहे हैं। कभी कहते हैं कि दाढ़ी रखने वाले मुस्लिम नेता को टिकट नहीं मिलना चाहिए तो कभी कहते हैं कि दो भाईयों को टिकट नहीं मिलना चाहिए। संगठन के प्रति समर्पण, जनता के बीच लोकप्रियता और कार्यकर्ताओं के बीच स्‍वीकार्यता जैसी योग्‍यताएं इनके लिए कोई मायने नहीं रखतीं और न ही ये नेता खुद की जमीनी हकीकत का आकलन करते हैं। पिछले दिनों जहां कैंट विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के टिकट के प्रबल दावेदार इंजीनियर अनीस अहमद खां की दाढ़ी को विरोधी मुस्लिम नेताओं ने मुद्दा बना लिया था लेकिन जब काम के दम पर इंजीनियर अनीस अहमद खां ने सबको पीछे छोड़ दिया तो ये मुस्लिम दावेदार भूमिगत हो गए। कुछ ऐसा ही इन दिनों 124 बरेली शहर विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के टिकट के प्रबल दावेदार डा. अनीस बेग के साथ हो रहा है। कुछ महीने पहले तक गुपचुप तरीके से तैयारी कर रहे डा. अनीस बेग जब खुलकर मैदान में आए तो विरोधी दावेदारों के होश फाख्‍ता हो गए। डा. अनीस बेग की यह धमाकेदार एंट्री विरोधी दावेदारों के लिए जी का जंजाल बन गई। इसकी कई वजहें भी हैं। पहली और सबसे बड़ी वजह यह है कि शह विधानसभा सीट पर कोई भी ऐसा दावेदार सपा के पास नहीं था जिसने कभी विधानसभा चुनाव लड़ा हो। एकमात्र डा. अनीस बेग ही ऐसे दावेदार हैं जो वर्ष 2012 में बसपा के टिकट पर चुनाव लड़े थे और सम्‍मानजनक वोट भी हासिल किए थे। चूंकि उस वक्‍त दंगों की वजह से आईएमसी का ग्राफ तेजी से चढ़ा था इसलिए मुस्लिम वोटों का बंटवारा हो गया था। इतना ही नहीं उस वक्‍त कांग्रेस से नवाब मुजाहिद हसन खां मैदान में थे। कुल मिलाकर उस वक्‍त करीब आधा दर्जन से भी अधिक मुस्लिम प्रत्‍याशी मैदान में थे जिसकी वजह से डा. अनीस बेग को हार का सामना करना पड़ा था। साथ ही सपा की लहर थी और बसपा सरकार के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी का असर भी डा. अनीस बेग के वोटों पर पड़ा थ। अगर उस वक्‍त स्थिति वर्तमान की तरह होती तो शायद नतीजे कुछ और ही होते।
दूसरी वजह यह है कि डा. अनीस बेग ने जिस तरह से विभिन्‍न समाज के लोगों को पार्टी से जोड़ने का काम किया है उसने भी विरोधी दावेदारों को परेशान करके रख दिया है। पार्टी के हित में संगठन के लिए कार्यकर्ता सम्‍मेलन से लेकर वोट बनवाने तक में जिस तत्‍परता से डा. अनीस बेग ने काम किया है उससे भी विरोधी दंग रह गए हैं। डा. अनीस बेग यह जानते हैं कि पार्टी का टिकट किसी को भी मिल सकता है, इसके बावजूद वह संगठन की मजबूती के लिए लाखों रुपये खर्च कर रहे हैं जबकि विरोधी दावेदार टिकट मिलने के इंतजार में बैठे हैं। ऐसे में सिर्फ इसलिए डा. अनीस बेग को टिकट नहीं मिलना चाहिए क्‍योंकि वह मीरगंज के पूर्व विधायक सुल्‍तान बेग के भाई हैं, यह तर्क बेहद अजीब प्रतीत होता है। खास तौर पर समाजवादी पार्टी सिर्फ इस तर्क पर किसी मजबूत दावेदार को दरकिनार करेगी, ऐसा मुमकिन नहीं लगता। क्‍योंकि समाजवादी पार्टी का जोर इस बार जिताऊ उम्‍मीदवार पर है।
अगर समाजवादी पार्टी के इतिहास पर नजर डालें तो पार्टी सुप्रीमो रहे मुलायम सिंह यादव ने अपने भाई शिवपाल यादव, प्रोफेसर रामगोपाल यादव, पुत्रवधु डिंपल यादव, बेटे अखिलेश यादव सहित परिवार के कई सदस्‍यों को चुनावी मैदान में उतारा। इन सभी को चुनावी मैदान में इसलिए उतारा गया क्‍योंकि वे सभी जिताऊ उम्‍मीदवार थे। अगर उस वक्‍त मुलायम सिंह ने यह सोचकर अपने परिवारीजनों का टिकट काट दिया होता कि उन पर परिवारवाद को बढ़ावा देने के आरोप लगेंगे तो शायद सपा के खाते में ये सीटें नहीं आ पातीं।
दूसरी तरफ सवाल यह भी उठता है कि क्‍या सुल्‍तान बेग का भाई होना गुनाह है? डा. अनीस बेग अगर पिछले कई वर्षों से पार्टी के लिए और जनता के लिए समर्पित भाव से काम कर रहे हैं तो निश्चित तौर पर उनकी राजनीतिक महत्‍वाकांक्षाएं भी होंगी। अगर सिर्फ इस आधार पर उन्‍हें टिकट की दौड़ से बाहर कर दिया जाता है कि वह पूर्व विधायक सुल्‍तान बेग के भाई हैं तो वह कभी भी पार्टी के लिए उस सेवा भाव और समर्पण से काम नहीं कर सकेंगे जैसे अब कर रहे हैं। बात सिर्फ अनीस बेग की ही नहीं है। समाजवादी पार्टी में कई ऐसे परिवार हैं जहां परिवार का हर सदस्‍य अपना अलग वजूद रखता है। बहरहाल, पार्टी अध्‍यक्ष अखिलेश यादव इस बार टिकट का बंटवारा किसी भी प्रकार के आवेश या दबाव में आकर नहीं करने वाले। टिकट उसी को मिलेगा जो जमीनी स्‍तर पर खुद को सबसे मजबूत साबित करेगा।

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