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इनसे सीखें : विरासत में नहीं मिली थी सियासत, अपने दम पर पहचान बनाई, एक सपाई तो दूसरा भाजपाई, राजनीति में कदम रखने वालों के लिए प्रेरक हैं अतुल कपूर और शमीम अहमद

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नीरज सिसौदिया, बरेली
कहते हैं सियासत की राहें आसां नहीं नहीं होतीं, यहां कदम-कदम पर कांटे बिछे होते हैं। कब कौन सा कांटा पैरों को छलनी कर जाएगा यह कोई नहीं जानता? कई बार तो अपने ही सबसे बड़े मुखालिफ हो जाते हैं। लेकिन इन तमाम मुश्किलों के बाद जो मंजिल को पाते हैं, वही सही मायनों में नेता कहे जाते हैं। आज बात बरेली के दो ऐसे ही नेताओं की। ये न तो विधायक हैं, न सांसद, न प्रदेश स्तर के पदाधिकारी हैं और न ही राष्ट्रीय स्तर के। ये तो हमारी और आपकी तरह ही एक आम आदमी हैं। एक सामान्य से मिडिल क्लास परिवार से आने वाले आम आदमी लेकिन इनकी पार्टी आम आदमी पार्टी नहीं है। इनमें एक भाजपाई है तो दूसरा सपाई। इन दोनों का राजनीति में आना महज इत्तेफाक था लेकिन आज इनके सियासी सफर का एक खास मकसद है। जी हां, हम बात कर रहे हैं समाजवादी पार्टी के युवा नेता और बानखाना के पार्षद शमीम अहमद और पूर्व उपसभापति अतुल कपूर की।
सबसे पहले बात शमीम अहमद की। एक सामान्य मध्यम वर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाले शमीम अहमद अक्सर मोहल्ले के लोगों के काम आ जाया करके थे। हालांकि, उन्होंने कभी सोचा नहीं था कि वो लोगों के जो छोटे-मोटे काम करा रहे हैं, वो काम एक दिन उनके सियासी सफर की राह खोल देंगे। दरगाह में सेवा का उन्हें छोटी उम्र से ही शौक था। धीरे-धीरे शमीम अहमद अपने वार्ड का एक चेहरा बन गए। उनके इसी नि:स्वार्थ समर्पण को देखते हुए पहले उन्हें मनोनीत पार्षद बनाया गया। फिर जब शमीम अहमद चुनावी मैदान में कूदे तो आज तक पीछे मुड़कर नहीं देखा। वह दो बार से लगातार बानखाना से पार्षद चुनते आ रहे हैं। आपको बता दें कि ये वही वार्ड है जहां झारखंड के राज्यपाल और बरेली के सबसे बड़े भाजपा नेता संतोष गंगवार का पुश्तैनी घर हुआ करता था। इसके बावजूद शमीम अहमद यहां से हमेशा भाजपा उम्मीदवार को पटखनी देते आ रहे हैं। शमीम अहमद विश्व प्रसिद्ध दरगाह आला हजरत की कोर कमेटी के सदस्य भी हैं। इनकी सादगी ही इनकी सबसे बड़ी खासियत है।

सबसे सराहनीय बात यह है कि शमीम अहमद किसी गुट का हिस्सा नहीं हैं। उनके पूर्व मंत्री अता उर रहमान से भी वैसे ही रिश्ते हैं जैसे कि पूर्व मंत्री शहजिल इस्लाम से। अपने विरोधियों को साधने का हुनर भी वो बाखूबी जानते हैं। यही वजह है कि कल तक जो शमीम अहमद के धुर विरोधी हुआ करते थे, आज वो उनके सबसे करीबी बन चुके हैं। शमीम अहमद को कुछ भी विरासत में नहीं मिला था। उन्होंने जो कुछ भी हासिल किया वो सब अपने दम पर हासिल किया। शमीम अहमद की सफलता यह साबित करती है कि अगर आप वाकई सियासत में अपने लिए रास्ता बनाना चाहते हैं तो बिना किसी राजनीतिक पृष्ठभूमि के भी बना सकते हैं।
अब बात करते हैं पूर्व उपसभापति और युवा भाजपा नेता अतुल कपूर की। शमीम अहमद की तरह ही अतुल कपूर का भी राजनीति में आना महज एक इत्तेफाक है। अतुल कपूर भी एक मध्यम वर्गीय परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनके पिता यूपी रोडवेज के तीसरे दर्जे के कर्मचारी थी। लगभग 6-7 साल पहले उनके कुछ दोस्तों ने मजाक-मजाक में अतुल कपूर से पार्षद का चुनाव लड़ने के लिए कहा। उस समय बिहारीपुर इलाके में प्रह्लाद मल्होत्रा को अजेय माना जाता था। अतुल कपूर मैदान में उतरे तो प्रह्लाद मल्होत्रा चुनाव हार गए। पहली ही बार में चुनाव जीतकर नगर निगम पहुंचे अतुल कपूर को मेयर उमेश गौतम का साथ मिला और पहली ही बार में उन्हें उपसभापति बना दिया गया।

Atul kapoor

अतुल कपूर का बढ़ता कद देखकर उनके वही दोस्त हैरान परेशान हो गए जो अतुल कपूर को राजनीति में लेकर आए थे। अतुल कपूर के पार्षद पद का कार्यकाल पूरा होते-होते उनके दोस्त उनके सबसे बड़े दुश्मन बन चुके थे। फिर अतुल कपूर का वार्ड आरक्षित हो गया तो अतुल कपूर को वार्ड बदलना पड़ा। अब अतुल कपूर ने उस वार्ड से लड़ने का मन बनाया जिस वार्ड में उनका मौजूदा घर पड़ता है। लेकिन यह वार्ड भी महिला आरक्षित हो गया। इस पर अतुल कपूर ने अपनी पत्नी सोनिया अतुल कपूर को मैदान में उतारा। अतुल कपूर की अपनी ही पार्टी के कुछ लोगों को यह रास नहीं आया। अब शुरू हुआ सोनिया अतुल कपूर के विरोध का सिलसिला। पूर्व पार्षद से लेकर निर्दलीय तक मैदान में उतारे गए और अतुल कपूर के पुराने दोस्त जो अब दुश्मन बन चुके थे, वो विरोधियों के साथ खड़े नजर आए। कुछ पार्टी नेता अपने लोगों को फोन करके निर्दलीय उम्मीदवारों को वोट देने की अपील करते रहे। लेकिन जब चुनाव परिणाम आए तो सारे विरोधी चारों खाने चित हो गए और सोनिया अतुल कपूर पार्षद बन गईं। ये जीत असल मायनों में सोनिया अतुल कपूर की नहीं बल्कि अतुल कपूर की थी जो उन्होंने अपने दम पर हासिल की थी। अतुल कपूर की पत्नी की इस जीत ने अतुल कपूर के उन पुराने दोस्तों का भी भ्रम तोड़ दिया जो अब उनके दुश्मन बन चुके हैं। अतुल कपूर आज अपने दम पर सियासत में एक मुकाम हासिल कर चुके हैं।


ये दोनों बहुत ही आम नेता हैं जिन्होंने अपनी मेहनत और संघर्ष से यह साबित कर दिखाया है कि अगर आप शिद्दत से सही इरादे के साथ जनता के हित के लिए सियासत में आते हैं तो जनता भी आपको सिर आंखों पर बिठाती है।
बहरहाल, ये दोनों ही शख्सियतें हर उस आम युवा के लिए एक प्रेरणा हैं जो सियासत में आना तो चाहते हैं लेकिन गैर राजनीतिक पृष्ठभूमि के चलते आने की हिम्मत नहीं जुटा पाते।

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