नीरज सिसौदिया, नई दिल्ली
उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुस्लिम नेतृत्व का सवाल एक बार फिर से उठ खड़ा हुआ है। समाजवादी पार्टी में यह सवाल इसलिए और महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि लंबे समय तक पार्टी की मुस्लिम राजनीति के केंद्र में रहे आज़म खान अब लगभग राजनीतिक हाशिये पर हैं। जेल, मुकदमे और स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानियों ने उन्हें सक्रिय राजनीति से दूर कर दिया है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि अब पार्टी में अगला बड़ा मुस्लिम चेहरा कौन होगा?
प्रदेश में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या लगभग 4.8 करोड़ है, जो कुल आबादी का करीब 19.3 फीसदी है। यह वर्ग प्रदेश की करीब 140 विधानसभा सीटों पर असर डालता है, जिनमें से लगभग 70 सीटों पर तो मुस्लिम आबादी 30 फीसदी से ज्यादा है। कई सीटों पर यह संख्या 45 से 60 प्रतिशत के बीच तक जाती है। ये क्षेत्र मुख्य रूप से पश्चिमी उत्तर प्रदेश, रूहेलखंड, अवध और पूर्वांचल में फैले हुए हैं। मुरादाबाद, अमरोहा, सहारनपुर, मेरठ, बरेली, रामपुर, शाहजहांपुर, आज़मगढ़, मऊ, जौनपुर और गाजीपुर जैसे जिले इस वर्ग की चुनावी ताकत को रेखांकित करते हैं। जाहिर है, यह मतदाता वर्ग किसी भी दल के लिए नजरअंदाज करने लायक नहीं है, खासकर समाजवादी पार्टी के लिए, जिसका परंपरागत आधार मुस्लिम-यादव समीकरण रहा है और वर्तमान में वह पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों (पीडीए) की राजनीति कर रही है। ऐसे में सपा को ऐसे मुस्लिम नेतृत्व की जरूरत होगी जो न सिर्फ मुस्लिम बल्कि दलितों और पिछड़ों में भी स्वीकार्य हो।
समाजवादी पार्टी की राजनीति में लंबे समय तक मुस्लिम नेतृत्व का प्रतिनिधित्व करने वाले आजम खान की अनुपस्थिति अब एक खालीपन पैदा कर रही है। मुख्तार अंसारी और अतीक अहमद जैसे नाम जो कभी क्षेत्रीय मुस्लिम नेतृत्व के प्रतीक थे, अब या तो राजनीति से बाहर हो चुके हैं या जीवन से। ऐसे में सपा के सामने एक विश्वसनीय और प्रभावी मुस्लिम नेतृत्व को सामने लाने की चुनौती है।
यह कहना गलत नहीं होगा कि समाजवादी पार्टी के पास अब भी अनुभवी मुस्लिम नेता हैं। सम्भल के विधायक इकबाल महमूद, अमरोहा से विधायक महबूब अली, पूर्व सांसद सलीम इकबाल शेरवानी और गाजीपुर के अफजाल अंसारी जैसे नेताओं ने पार्टी को वर्षों तक मजबूती दी है। लेकिन इन सभी नेताओं की उम्र अब 70 पार कर चुकी है, जिससे उनकी सक्रियता, ऊर्जा और सांगठनिक विस्तार की संभावना सीमित हो गई है। इकबाल महमूद 75 वर्ष के हैं, सलीम शेरवानी और महबूब अली 72 वर्ष के हैं, जबकि अफजाल अंसारी 71 वर्ष पार कर चुके हैं। इनका राजनीतिक अनुभव निर्विवाद है, लेकिन आज की सियासी जरूरत युवा और गतिशील नेतृत्व की है जो सामाजिक समन्वय, भाषण कौशल और संगठनात्मक क्षमता के साथ उभर सके।
ऐसे में दो नाम जो लगातार चर्चा में आ रहे हैं, वे हैं बरेली जिले की बहेड़ी विधानसभा सीट से विधायक अता उर रहमान और मुरादाबाद जिले की कांठ विधानसभा सीट से विधायक कमाल अख्तर। अता उर रहमान की उम्र 56 वर्ष है और वे तीन बार विधानसभा पहुंच चुके हैं। वे अखिलेश यादव सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं और वर्तमान में पार्टी के प्रदेश महासचिव हैं। जब अता उर रहमान को प्रदेश महासचिव की जिम्मेदारी दी गई थी तो वह पहला मौका था जब पश्चिम उत्तर प्रदेश से संभवतया किसी सपा नेता को प्रदेश महासचिव की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। अता उर रहमान संगठन में 2009 में प्रदेश सचिव बने थे और फिर सपा अल्पसंख्यक सभा के प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए। 2010 में राष्ट्रीय सचिव के पद पर रहे। इस दौरान पार्टी ने उन्हें राष्ट्रीय प्रवक्ता की जिम्मेदारी भी सौंपी। अल्पसंख्यक सभा के प्रदेश अध्यक्ष रहने के दौरान उन्होंने पूरे प्रदेश में मुस्लिमों को एकजुट करने का काम किया। यही वजह है कि वह पूरे प्रदेश के मुस्लिमों के बीच स्वीकार्य हैं। जब अखिलेश यादव वर्ष 2024 में लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए और करहल विधानसभा सीट रिक्त हुई, तब अता उर रहमान को वहां उपचुनाव में कार्यालय प्रभारी की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। अखिलेश यादव के मंचों पर अक्सर अता उर रहमान की उपस्थिति इस बात की पुष्टि करती है कि वे नेतृत्व के निकटतम लोगों में शामिल हैं।
अता उर रहमान की पकड़ सिर्फ मुस्लिम समाज तक सीमित नहीं है। उन्होंने अपने क्षेत्र में दलितों और पिछड़ी जातियों के साथ भी मजबूत संवाद स्थापित किया है। बहेड़ी विधानसभा सीट पर उनकी पकड़ पिछले दो चुनावों में स्पष्ट रूप से देखने को मिली है। इतना ही नहीं, 2024 लोकसभा चुनाव में भी उनके प्रभाव वाले क्षेत्र में समाजवादी पार्टी को अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन मिला। उनके प्रभाव से भोजीपुरा और नवाबगंज जैसी सीटों पर भाजपा को हार का सामना करना पड़ा। वे एक ज़मीनी नेता हैं, जिन्हें कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों के बीच सक्रिय देखा जाता है।
कमाल अख्तर की राजनीति अलग ढंग की है। वे मुलायम सिंह यादव के विश्वासपात्र रहे हैं। 2004 में उन्हें राज्यसभा भेजा गया और इसके बाद वे अखिलेश सरकार में मंत्री बने। आज वे विधानसभा में समाजवादी पार्टी के मुख्य सचेतक हैं। उनकी उम्र 53 वर्ष है, यानी राजनीति के लिहाज से वे परिपक्वता और ऊर्जावान नेतृत्व के उस मुकाम पर हैं जहां से कोई नेता प्रदेशव्यापी प्रभाव खड़ा कर सकता है। कमाल अख्तर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में विशेषकर मुरादाबाद, अमरोहा, मेरठ, शामली और सहारनपुर जिलों में अच्छी पकड़ रखते हैं। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में न केवल मुस्लिम समुदाय के साथ, बल्कि गैर-मुस्लिम पिछड़ी जातियों, विशेष रूप से गुर्जर, सैनी, कश्यप और जाटव समाज के साथ भी संवाद बनाए रखा है।
कमाल अख्तर का राजनीतिक आचरण संतुलित और संयमित माना जाता है। वे मंच पर कम बोलने वाले लेकिन कार्यकर्ताओं के बीच लोकप्रिय और संगठन में विश्वसनीय व्यक्ति हैं। पार्टी के दोनों प्रमुख नेताओं (मुलायम सिंह और अखिलेश यादव) से उनका संबंध गहरा और स्थिर रहा है। यही कारण है कि वे संगठन के भीतरी ढांचे में आज भी एक मजबूत स्तंभ माने जाते हैं।
आज जब समाजवादी पार्टी को एक ऐसे मुस्लिम चेहरे की आवश्यकता है जो न केवल जनता के बीच विश्वसनीय हो, बल्कि संगठन की रीढ़ बनने की भी क्षमता रखता हो, तो कमाल अख्तर और अता उर रहमान दोनों ही उस कसौटी पर खरे उतरते नजर आते हैं। ये सामाजिक रूप से स्वीकार्य हैं, जनाधार रखते हैं, भाषण और संवाद में सक्षम हैं और नेतृत्व के साथ सीधा जुड़ाव रखते हैं। एक ओर अता उर रहमान रूहेलखंड के ग्रामीण मुस्लिम और पिछड़े वर्गों को जोड़ने में सक्षम हैं, वहीं कमाल अख्तर शहरी मुस्लिम समाज और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के समरस नेतृत्व के प्रतीक बन सकते हैं।
यदि समाजवादी पार्टी को आने वाले चुनावों में अपने पारंपरिक मुस्लिम वोटबैंक को न सिर्फ बनाए रखना है बल्कि उसे उत्साह और विश्वास के साथ लामबंद करना है, तो ऐसे नेताओं को आगे लाकर पार्टी स्पष्ट संदेश दे सकती है कि वह नेतृत्व की अगली कतार भी मजबूत और सशक्त बना रही है।





