नीरज सिसौदिया, बरेली
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टोलरेंस की नीति क्या अपनाई भाजपा के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों ने भ्रष्टाचार का नया तरीका इजाद कर लिया है। इसका जीता-जागता उदाहरण बरेली नगर निगम में देखने को मिल रहा है। यहां बड़ी ही सफाई से टेंडर का खेल खेला जा रहा है। बताया जाता है कि टेंडर के इस खेल ने नगर निगम के अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के बीच की दूरियां बढ़ा दी हैं। साथ ही मेयर उमेश गौतम और नगर आयुक्त संजीव कुमार मौर्य के बीच एक शीतयुद्ध शुरू हो गया है। बताया जाता है कि यह खेल 12 प्रतिशत कमीशनखोरी का है जिसे अब 15 प्रतिशत करने की तैयारी की जा रही है। वहीं, 12 प्रतिशत के खेल से सरकार को करोड़ों रुपए की चपत लगाई जा रही है। बताया जाता है कि ठेकेदार विपिन अग्रवाल और गौरव चौहान नाम के दो शख्स इस खेल में अहम भूमिका निभा रहे हैं। हालांकि, इसकी आधिकारिक तौर पर पुष्टि नहीं की गई है लेकिन नगर निगम के कुछ पार्षद और अधिकारी नाम न छापने की शर्त पर इसकी पुष्टि करते हैं। अब जानते हैं कि इस पूरे खेल को कैसे अंजाम दिया जाता है।
टेंडर निकलने से पहले ही हो जाती है डील
नगर निगम में ऑनलाइन टेंडर डाले जाते हैं। जब भी टेंडर निकलने वाले होते हैं तो एक बड़े निर्वाचित जनप्रतिनिधि के चहेते ठेकेदारों की एक सूची तैयार की जाती है। इसके बाद उन ठेकेदारों के साथ बैठक कर उनके बीच काम का बंटवारा कर दिया जाता है और कमीशन तय कर लिया जाता है। इसके बाद वही ठेकेदार टेंडर डालते हैं और जिसके साथ पहले से डील होती है उसे टेंडर दे दिया जाता है। बताया जाता है कि जनप्रतिनिधि के करीबी एक-एक ठेकेदार ने कई अलग-अलग कंपनियां बनाई हुई हैं। इन कंपनियों का इस्तेमाल टेंडर आवंटन के लिए निर्धारित कोरम पूरा करने के लिए किया जाता है। इस तरह से इस टेंडर के खेल में सारा कमीशन एक ही जनप्रतिनिधि डकार जाता है।
ठेकेदारों को फायदा, सरकार को चपत
12 प्रतिशत कमीशन के इस खेल से ठेकेदारों को तो काफी फायदा होता है लेकिन सरकार को करोड़ों रुपए की चपत लग रही। अब सवाल उठता है कि सरकार को चपत कैसे लग रही है? इसके लिए फ्लैश बैक में जाना होगा। दरअसल, जब भी कोई टेंडर निकाला जाता है तो उसके लिए एक दर तय की जाती है। जब सुप्रिया ऐरन या डॉक्टर आईएस तोमर बरेली नगर निगम के महापौर थे तो उस वक्त जब भी कोई टेंडर आवंटित किया जाता था तो वह तय मूल्य से लगभग 20 से 25 प्रतिशत कम मूल्य पर आवंटित किया जाता था। लेकिन जब से नगर निगम में 12 प्रतिशत कमीशन का खेल किया जा रहा है तब से टेंडर तय मूल्य से 2 से 5 प्रतिशत ही कम मूल्य पर आवंटित कर दिया जाता है। नगर निगम में इसका पूरा रिकॉर्ड उपलब्ध है। जब टेंडर 2 से 5 प्रतिशत ही कम मूल्य पर आवंटित किया जाता है तो 12 प्रतिशत कमीशन चुकाने के बाद भी ठेकेदारों को 5 से 7 प्रतिशत तक का फायदा हो जाता है जबकि सरकार को 20 से 25 कम दर में मिलने वाले ठेकेदार अब महज 2 से 5 प्रतिशत ही कम दर में मिल रहे हैं जिससे सरकार को कम से कम 20 प्रतिशत राशि का सीधा नुकसान हो रहा है।
अन्य ठेकेदारों को दिखाया जाता है ब्लैक लिस्ट करने का डर
अब सवाल यह उठता है कि टेंडर के लिए तो कोई भी योग्य ठेकेदार आवेदन कर सकता है। जिसका रेट कम होगा उसे ही टेंडर मिलेगा। फिर 12 प्रतिशत का खेल कैसे संभव है। तो सूत्र बताते हैं कि इसका तोड़ भी जनप्रतिनिधियों ने निकाल लिया है। इस खेल में कुछ पार्षदाें का इस्तेमाल किया जाता है। इन पार्षदों के माध्यम से उन ठेकेदारों के खिलाफ नगर निगम बोर्ड की बैठकों में प्रस्ताव लाया जाता है। इस प्रस्ताव में ऐसे ठेकेदारों को ब्लैक लिस्ट करने की मांग की जाती है जो 12 प्रतिशत कमीशन न देकर कम रेट पर सीधे टेंडर डालते हैं। फिरउस प्रस्ताव को बोर्ड की बैठक में पास कर दिया जाता है और प्रस्ताव में जिस भी ठेकेदार का नाम होता है उसे ब्लैक लिस्ट करना नगर निगम के अधिकारियों की मजबूरी बन जाता है। जो ठेकेदार एक बार नगर निगम में ब्लैक लिस्ट हो जाता है उसे दो साल के लिए पूरे प्रदेश में कोई भी सरकारी काम नहीं दिया जा सकता है। विगत 25 अगस्त को हुई नगर निगम बोर्ड की बैठक में भी दो ठेकेदारों को ब्लैक लिस्ट करने का प्रस्ताव लाया गया था। इस प्रस्ताव को भी इसी खेल से संबंधित बताया जा रहा है। अब दो साल के लिए बेरोजगार होने से बेहतर है कि या तो 12 प्रतिशत कमीशन के खेल में शामिल हो जाया जाए या फिर टेंडर की प्रक्रिया से ही दूर रहा जाए। इसके चलते चहेते ठेकेदारों की चांदी हो रही है।
नगर आयुक्त ने टेढ़ी की नजर, नहीं कर रहे पूरा भुगतान, ठेकेदार परेशान
नगर निगम में 12 प्रतिशत कमीशन के इस खेल को नगर आयुक्त संजीव कुमार मौर्य अच्छी तरह समझ चुके हैं। यही वजह है कि अब नगर निगम के ठेकेदारों को पूरा भुगतान नहीं किया जा रहा है। उन्हें सिर्फ 70 प्रतिशत ही भुगतान किया जा रहा है। 30 प्रतिशत भुगतान रोक दिया गया है। इससे ठेकेदार परेशान हैं। बताया जाता है कि मेयर और नगर आयुक्त के बीच शीतयुद्ध की मुख्य वजह भी यही रुका हुआ भुगतान है। हालांकि, दोनों की यह खींचतान खुलकर सामने नहीं आई है। न ही किसी ने आधिकारिक तौर पर इस खींचतान की पुष्टि की है लेकिन नगर निगम की अफसरशाही के विश्वसनीय सूत्र इसकी पुष्टि करते हैं।
ईडी या सीबीआई करे जांच तो खुल सकती हैं भ्रष्टाचार की कई परतें
कुछ पार्षदों और नगर निगम के अधिकारियों का कहना है कि अगर प्रवर्तन निदेशालय (सीबीआई) या केंद्रीय अन्वेषण ब्यूराे (सीबीआई) इस मामले की जांच करे तो भ्रष्टाचार की कई परतें खुल सकती हैं। उन्होंने बताया कि भ्रष्टाचार के इस पैसे का इस्तेमाल पार्टी के कुछ आला नेताओं को खुश करने के लिए भी किया जा रहा है। बाकी का पैसा जमीनों में लगाया गया है। अगर ईडी और सीबीआई मामले की जांच करें तो बड़ा भ्रष्टाचार उजागर हो सकता है।





