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कोहाड़ा पीर से धर्म कांटे तक अतिक्रमण कार्रवाई पर भड़के राजेश अग्रवाल, बोले— “भेदभावपूर्ण ढंग से 60 दुकानदारों को किया बर्बाद”, नगर निगम बोर्ड की बैठक में गूंजेगा मुद्दा, पढ़ें सपा के पूर्व प्रत्याशी और वरिष्ठ पार्षद राजेश अग्रवाल से विशेष बातचीत

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नीरज सिसौदिया, बरेली

कोहाड़ा पीर क्षेत्र से धर्म कांटे तक नगर निगम द्वारा चलाए गए अतिक्रमण हटाओ अभियान को लेकर सियासत तेज हो गई है। इस कार्रवाई में करीब 60 दुकानदारों की दुकानें टूटने के बाद व्यापारियों में भारी नाराजगी है। समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता, शहर विधानसभा सीट से पूर्व प्रत्याशी और वरिष्ठ पार्षद राजेश अग्रवाल ने नगर निगम की कार्रवाई को पूरी तरह गलत, भेदभावपूर्ण और तानाशाहीपूर्ण बताया है। उन्होंने कहा कि वह अतिक्रमण हटाने के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन कार्रवाई बिना भेदभाव, स्पष्ट नोटिस और मानवीय तरीके से होनी चाहिए।

राजेश अग्रवाल ने बातचीत में कहा कि उनका सीधा सवाल यह है कि अगर किसी क्षेत्र में अतिक्रमण हटाना था तो दुकानदारों को कम से कम एक सप्ताह पहले स्पष्ट सूचना दी जानी चाहिए थी। उनका कहना है कि नगर निगम ने करीब छह महीने पहले निशान लगा दिए थे, लेकिन उसके बाद लंबे समय तक कोई कार्रवाई नहीं की गई। इससे दुकानदार यह मानकर निश्चिंत हो गए कि शायद मामला ठंडे बस्ते में चला गया है। इसी बीच कई लोग नेताओं और अधिकारियों के चक्कर लगाते रहे और उन्हें आश्वासन भी मिलता रहा कि दुकानें नहीं टूटेंगी।

उन्होंने कहा कि सबसे हैरानी की बात यह है कि अचानक सुबह बुलडोजर पहुंचा और दुकानों को तोड़ना शुरू कर दिया गया, जिससे दुकानदारों को अपना सामान तक हटाने का मौका नहीं मिला। कई दुकानों में रखा लाखों रुपये का सामान मलबे में दब गया और काफी नुकसान हुआ।

राजेश अग्रवाल ने आरोप लगाया कि अभियान में नियमों का पालन नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि कई दुकानदारों का सिर्फ एक या दो फुट हिस्सा सड़क की ओर निकला था, लेकिन कार्रवाई में पूरी दुकान के 10 से 15 फुट हिस्से तक को गिरा दिया गया। उनके मुताबिक यह सिर्फ अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई नहीं, बल्कि दुकानदारों की रोजी-रोटी पर सीधा हमला है।

उन्होंने सवाल उठाया कि जब नगर निगम ने दुकानों के साथ मौजूद बिजली घर को नहीं तोड़ा, जबकि वह भी उसी श्रेणी में आता है, तो फिर केवल दुकानदारों पर ही कार्रवाई क्यों की गई। उनके अनुसार इससे साफ जाहिर होता है कि अभियान में चयनात्मक रवैया अपनाया गया।

कार्रवाई को लेकर एक बड़ा दावा यह भी सामने आया है कि जिन दुकानों को तोड़ा गया, उनमें कई दुकानें आजादी से पहले की बनी हुई थीं। राजेश अग्रवाल ने बताया कि उन्होंने खुद एक दुकान की 1942 की ईंट अपने हाथ से उठाकर देखी। वहीं एक दुकानदार ने उन्हें बताया कि उसकी दुकान 1910 से बनी हुई है।

अगर यह दावा सही है, तो सवाल उठता है कि इतने पुराने निर्माणों पर कार्रवाई किस कानूनी आधार पर की गई। अग्रवाल ने कहा कि यह पूरी कार्रवाई “मनमर्जी” के तहत की गई लगती है और इसमें प्रशासनिक संवेदनशीलता बिल्कुल नहीं दिखाई गई।

राजेश अग्रवाल ने नगर निगम की कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि अगर ये दुकानें अवैध थीं तो फिर इनसे हाउस टैक्स और वॉटर टैक्स क्यों लिया गया?नगर निगम ने इन्हें एनओसी क्यों जारी की? और वर्षों तक इन दुकानों के सामने सड़क और नाले क्यों बनवाए गए?

उन्होंने बताया कि करीब दो से ढाई साल पहले इसी भाजपा सरकार के कार्यकाल में कोहाड़ा पीर से धर्म कांटे तक सड़क और नाला निर्माण कराया गया था। उस समय अगर दुकानें सड़क सीमा में थीं तो नगर निगम ने सड़क और नाले का निर्माण उसी हिसाब से क्यों किया?

उनका कहना है कि यह साफ तौर पर प्रशासनिक विरोधाभास है। एक तरफ नगर निगम टैक्स लेकर दुकानों को वैधता जैसा व्यवहार देता है, दूसरी ओर अचानक उन्हें अवैध बताकर गिरा देता है।

राजेश अग्रवाल ने इस कार्रवाई की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि इतने बड़े अभियान में तहसील प्रशासन की टीमों को शामिल किया जाना चाहिए था, ताकि जमीन की स्थिति, रिकॉर्ड और स्वामित्व का निष्पक्ष सत्यापन हो सके।

उन्होंने आरोप लगाया कि नगर निगम में इस समय कोई सक्षम **मानचित्र विशेषज्ञ या तकनीकी अधिकारी** नहीं है और एक आउटसोर्सिंग कर्मचारी के भरोसे इतनी बड़ी कार्रवाई कर दी गई। ऐसे में गलती की आशंका और बढ़ जाती है।

राजेश अग्रवाल ने कहा कि नगर निगम बोर्ड का स्पष्ट नियम है कि भारत सरकार या प्रदेश सरकार की किसी भी योजना पर पहले बोर्ड में चर्चा होनी चाहिए, लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं हुआ। पार्षदों को न तो पूरा प्रस्ताव दिखाया गया और न ही परियोजना की विस्तृत जानकारी दी गई।

उन्होंने कहा कि अगर बोर्ड में पहले चर्चा होती तो कई खामियों को सुधारा जा सकता था और व्यापारियों का नुकसान रोका जा सकता था। उनके अनुसार मुख्यमंत्री योजना के करोड़ों रुपये के कामों को भी बिना पर्याप्त चर्चा के आगे बढ़ाया जा रहा है, जिसकी वजह से ऐसे विवाद पैदा हो रहे हैं।

राजेश अग्रवाल ने प्रभावित दुकानदारों के लिए साफ मांग रखी है। उन्होंने कहा कि जिन व्यापारियों की दुकानें तोड़ी गई हैं, नगर निगम अपने खर्चे पर उनकी दुकानें दोबारा बनवाकर दे। साथ ही जिन अधिकारियों और कर्मचारियों ने इस कार्रवाई को अंजाम दिया, उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाए।

उन्होंने कहा कि अपने लंबे सार्वजनिक जीवन में उन्होंने पहली बार ऐसा अतिक्रमण अभियान देखा है, जिसमें **सुबह-सुबह अचानक बुलडोजर पहुंचा और लोगों को संभलने का मौका तक नहीं दिया गया।

नगर निगम से बातचीत के सवाल पर राजेश अग्रवाल ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि इस समय नगर निगम की आंखों पर तानाशाही का चश्मा चढ़ा हुआ है। जनता की बात सुनने के बजाय मनमाने फैसले लिए जा रहे हैं।

उन्होंने बताया कि आगामी 8 से 10 दिनों में नगर निगम बोर्ड की बैठक प्रस्तावित है, जिसमें वह इस पूरे मुद्दे को मजबूती से उठाएंगे। उनका कहना है कि व्यापारियों के साथ अन्याय किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और यदि जरूरत पड़ी तो इस मुद्दे को सड़क से सदन तक ले जाया जाएगा।

करीब 60 दुकानदारों के प्रभावित होने के बाद यह मामला अब सिर्फ अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई नहीं रह गया है, बल्कि **व्यापारियों की आजीविका, प्रशासनिक पारदर्शिता और राजनीतिक जवाबदेही का मुद्दा बन गया है। राजेश अग्रवाल के बयान के बाद साफ है कि आने वाले दिनों में नगर निगम बोर्ड की बैठक में यह मामला जोरदार तरीके से गूंजेगा।

शहर के व्यापारियों की निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि नगर निगम मुआवजा, पुनर्निर्माण और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई को लेकर क्या कदम उठाता है। फिलहाल कोहाड़ा पीर से धर्म कांटे तक टूटी दुकानों का मलबा प्रशासन की कार्यशैली पर बड़े सवाल छोड़ गया है।

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