नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली की राजनीति हमेशा से बड़े उतार-चढ़ाव और बदलते समीकरणों की गवाह रही है। यहां ऐसे नेताओं की लंबी फेहरिस्त रही है जिन्होंने फर्श से अर्श तक का सफर तय किया। यहां के स्वर्गीय राम सिंह खन्ना, स्वर्गीय पंडित धर्मदत्त शर्मा वैद्य, संतोष गंगवार और स्वर्गीय दिनेश जौहरी जैसे सियासतदान प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर अपना लोहा मनवाते दिखे हैं। लेकिन कुछ ऐसे सियासतदान भी रहे जिनकी गिनती कभी दिग्गजों में हुआ करती थी और वर्तमान में वो हाशिये पर आ चुके हैं। इनमें पहला नाम ऐरन दंपति का आता है। एक दौर था जब बरेली की सियासत में प्रवीण सिंह ऐरन का दबदबा माना जाने लगा था। वह संतोष गंगवार को हराकर सांसद बने, वह विधायक भी बने और प्रदेश सरकार में मंत्री भी बनाए गए और उनकी पत्नी सुप्रिया ऐरन बरेली नगर निगम के महापौर पद पर सुशोभित भी हुईं। लेकिन वर्ष 2009 के बाद से ऐरन दंपति की चुनावी राजनीति का पतन शुरू हो गया। वर्ष 2009 में प्रवीण सिंह ऐरन बरेली लोकसभा सीट से सांसद चुने गए। उसके बाद 2012 में यूपी विधानसभा चुनाव हुए। इस चुनाव में प्रवीण सिंह ऐरन ने अपनी पत्नी सुप्रिया ऐरन को बरेली कैंट विधानसभा सीट से कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतारा लेकिन कोई करिश्मा दिखाने की जगह सुप्रिया औंधे मुंह गिर गईं। चुनाव में जीतना तो दूर सुप्रिया अपनी जमानत तक जब्त करा बैठीं जबकि प्रवीण सिंह ऐरन उस वक्त मौजूदा सांसद थे। इस चुनाव में भाजपा के राजेश अग्रवाल 51,893 वोट हासिल कर पहले नंबर पर रहे। दूसरे स्थान पर समाजवादी पार्टी के फहीम साबिर ने जगह बनाई जिन्हें 32944 वोट मिले थे। तीसरे पायदान पर आईएमसी समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार इंजीनियर अनीस अहमद खां ने कब्जा किया। उन्हें 24353 वोट मिले थे। वहीं, कांग्रेस उम्मीदवार सुप्रिया ऐरन महज 16,310 वोटों के साथ चौथे नंबर पर रहीं। यह तो ऐरन दंपति के राजनीतिक पतन की शुरुआत थी। इसके बाद तो जैसे ऐरन परिवार की चुनावी राजनीति को ग्रहण ही लग गया। दो साल बाद वर्ष 2014 में लोकसभा चुनाव हुए। 2012 के विधानसभा चुनाव में जहां सुप्रिया ऐरन ने चौथे स्थान पर जगह बनाई तो वहीं लोकसभा चुनाव में प्रवीण सिंह ऐरन ने भी चौथा स्थान हासिल किया। इस चुनाव में भाजपा के संतोष गंगवार ने 518,258 वोट हासिल कर विजय पताका फहराई तो दूसरे स्थान पर समाजवादी पार्टी के आयशा इस्लाम ने जगह बनाई। उन्हें 2,77,573 वोट प्राप्त हुए। तीसरे पायदान पर बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार उमेश गौतम रहे जिन्हें 1,06,049 वोट मिले और चौथा नंबर प्रवीण सिंह ऐरन के हिस्से में आए जो महज 84,213 वोट ही हासिल कर सके थे।

लगातार दो करारी हार के बाद कांग्रेस ने ऐरन दंपति से दूरी बनानी शुरू कर दी। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में जब समाजवादी पार्टी के साथ कांग्रेस का गठबंधन हुआ तो कांग्रेस ने सुप्रिया ऐरन की जगह वरिष्ठ नेता नवाब मुजाहिद हसन खां को मैदान में उतारा। इसका असर यह हुआ कि कांग्रेस का प्रदर्शन बेहतर हुआ। जहां 2012 में पार्टी चौथे स्थान पर थी, वहीं 2017 में दूसरे स्थान पर पहुंच गई। यानी ऐरन दंपति की अनुपस्थिति में कांग्रेस ने अपनी स्थिति सुधारी।
इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव हुए। इस चुनाव में एक बार फिर प्रवीण सिंह ऐरन किस्मत आजमाने उतरे लेकिन इस बार भी वह कोई करिश्मा नहीं कर सके। एक बार फिर भाजपा के संतोष गंगवार विजयी हुए। उन्हें 565,270 वोट मिले। दूसरे स्थान पर समाजवादी पार्टी के भगवत सरन गंगवार रहे। भगवत सरन गंगवार को 3,97,988 वोट हासिल हुए। इस बार प्रवीण सिंह ऐरन की रैंकिंग में थोड़ा सुधार हुआ और 2014 के चौथे नंबर के मुकाबले इस बार वह एक अंक की छलांग लगाकर तीसरे नंबर पर जगह बनाने में कामयाब रहे। लेकिन यह छलांग भी महज एक छलावा ही था क्योंकि इस बार वह तीसरे पायदान पर रहने के बावजूद उतने वोट भी हासिल नहीं कर सके जितने वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में चौथे स्थान पर रहने के बावजूद लाए थे। वर्ष 2014 के चुनाव में प्रवीण सिंह ऐरन को 84,213 वोट मिले थे जबकि 2019 में उन्हें मिले वोटों की संख्या में 10 हजार की गिरावट दर्ज की गई और उन्हें महज 74,206 वोट ही मिल सके।
इसके बाद वर्ष 2022 का विधानसभा चुनाव आया। अबकी बार सुप्रिया ऐरन ने कांग्रेस को करारा झटका दिया। कांग्रेस ने उन्हें बरेली कैंट विधानसभा सीट से पार्टी उम्मीदवार घोषित भी कर दिया। सुप्रिया ऐरन ने पूरे शहर में अपने पोस्टर भी लगा डाले लेकिन शायद उन्हें यह आभास हो गया था कांग्रेस में रहकर इस बार वह 2012 के चौथे पायदान का प्रदर्शन भी नहीं दोहरा पाएंगी। ऐन वक्त पर सुप्रिया ऐरन ने कांग्रेस को अलविदा कहकर समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया। सपा ने भी उन्हें उम्मीदवार घोषित कर दिया लेकिन सपा हाईकमान को ऐरन दंपति की जमीनी हकीकत का तनिक भी एहसास नहीं था। अगर होता तो शायद सुप्रिया ऐरन को अखिलेश यादव कभी भी टिकट नहीं देते। बहरहाल, टिकट के जुगाड़ में महारथी माने जाने वाले ऐरन दंपति ने यहां भी बाजी मार ली लेकिन सपा की यह गलती उसे भारी पड़ गई। जिस कैंट सीट पर भाजपा नेता राजेश अग्रवाल का टिकट कटने और संजीव अग्रवाल के मैदान में उतरने से सपा के लिए एक उम्मीद बंधी थी उस सीट पर सुप्रिया ऐरन की उम्मीदवारी ने पार्टी को एक बार फिर गर्त में धकेल दिया। जमीनी स्तर पर तैयारी में जुटे अनीस बेग और इंजीनियर अनीस अहमद खां जैसे नेता इससे मायूस हो गए। मुस्लिम इलाकों में भी मतदान प्रतिशत उम्मीद के अनुरूप नहीं बढ़ सका और नतीजा फिर वही ढाक के तीन पांत वाला ही रहा।
इसके बाद वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव आए। इस बार भाजपा ने दिग्गज नेता और आठ बार के सांसद संतोष गंगवार का टिकट काटकर 2022 के विधानसभा चुनाव में बहेड़ी विधानसभा सीट से शिकस्त झेलने वाले छत्रपाल गंगवार को लोकसभा का उम्मीदवार घोषित कर दिया। इससे संतोष गंगवार के समर्थक नाराज हो गए। समाजवादी पार्टी के लिए यह एक सुनहरा मौका था लोकसभा जीतने का। प्रदेश में सपा-कांग्रेस गठबंधन ने शानदार प्रदर्शन किया लेकिन अखिलेश यादव के ऐरन प्रेम ने इस बार भी सपा की लुटिया डुबो दी। प्रवीण सिंह ऐरन उस उम्मीदवार से चुनाव हार गए जो अपनी विधानसभा सीट तक नहीं जीत पाया था। इस तरह ऐरन दंपति पिछले पांच बड़े चुनाव हार गए। इनमें तीन लोकसभा और दो विधानसभा चुनाव शामिल हैं। अबकी बार प्रवीण सिंह ऐरन ने एक बैठक में यह घोषणा की थी कि वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव में न तो वह खुद चुनाव लड़ेंगे और न ही उनकी पत्नी।लेकिन सोशल मीडिया पर कुछ पोस्टर डाले जा रहे हैं जिनमें लिखा जा रहा है कि सुप्रिया भाभी बरेली कैंट विधानसभा सीट से 2027 का विधानसभा चुनाव जीतेंगी।
ऐरन के बाद सबसे अधिक बड़े चुनाव हारने वाले अपने दौर के दिग्गज माने जाने वाले नेताओं में एक नाम भगवत सरन गंगवार का भी है। भगवत सरन गंगवार वर्ष 2017 का विधानसभा चुनाव भाजपा के केसर सिंह गंगवार से हार गए थे। उसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में संतोष गंगवार से हार गए। फिर 2022 के विधानसभा चुनाव में उन्हें भाजपा उम्मीदवार डॉक्टर एमपी आर्या ने शिकस्त दी। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने उन्हें पीलीभीत लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाया लेकिन भगवत सरन गंगवार को वहां भी हार का सामना करना पड़ा। इस तरह भगवत सरन गंगवार लगातार चार बड़े चुनाव हार चुके हैं। हालांकि, भगवत सरन गंगवार को इस दौरान व्यक्तिगत तौर पर बड़े झटके झेलने को मिले। उनके दो पुत्रों का निधन हो गया। ऐसे में पिता के लिए इन सदमों से उबरना आसान नहीं होता। जनता के बीच वह अब भी लोकप्रिय बताए जाते हैं।
बहरहाल, बरेली की राजनीति की यह कहानी साफ बताती है कि अब केवल पुराना नाम या पहचान चुनाव जिताने के लिए काफी नहीं है। आज का मतदाता ज्यादा जागरूक है और वह जमीनी काम, सक्रियता और भरोसे को प्राथमिकता देता है। यही कारण है कि जो नेता समय के साथ खुद को नहीं बदल पाए, उनकी राजनीतिक पकड़ कमजोर होती चली गई।




