नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली की राजनीति में इन दिनों सबसे ज्यादा चर्चा यदि किसी चेहरे की हो रही है तो वह हैं शुभलेश यादव। 23 अप्रैल को पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने उन्हें समाजवादी पार्टी का बरेली जिला अध्यक्ष बनाया तो राजनीतिक गलियारों में कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गई थीं। एक तरफ उनके समर्थकों में उत्साह था तो दूसरी तरफ पार्टी के कुछ नेताओं और कार्यकर्ताओं में नाराजगी और निराशा भी दिखाई दे रही थी। संगठन के भीतर यह चर्चा भी थी कि जिला अध्यक्ष बनने के बाद शुभलेश यादव के सामने सबसे बड़ी चुनौती पार्टी के रूठे नेताओं को मनाने और बिखरते संगठन को दोबारा खड़ा करने की होगी।
लेकिन जिला अध्यक्ष की कुर्सी संभालते ही शुभलेश यादव ने जिस तरह की राजनीतिक सक्रियता दिखाई, उसने विरोधियों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने शुरुआत किसी बड़े शक्ति प्रदर्शन या नारेबाजी से नहीं की, बल्कि संगठन के भीतर टूटे संवाद को जोड़ने से की। यही वजह है कि अब समाजवादी पार्टी के भीतर धीरे-धीरे एक नई हलचल महसूस की जा रही है।

शुभलेश यादव पहले भी जिला अध्यक्ष रह चुके हैं। इसलिए उन्हें संगठन की ताकत और कमजोरियों दोनों का अनुभव है। यही कारण है कि इस बार उन्होंने शुरुआत से ही दो मोर्चों पर एक साथ काम करना शुरू किया। पहला, संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत करना और दूसरा, उन नेताओं को फिर से साथ जोड़ना जो पिछले कुछ समय से खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे थे।

जिला अध्यक्ष बनने के तुरंत बाद उनसे यह उम्मीद की जा रही थी कि वह विधानसभा क्षेत्रों का दौरा शुरू करेंगे और कार्यकर्ताओं के बीच अपनी ताकत दिखाएंगे। लेकिन उन्होंने इसके बजाय पहले निवर्तमान पदाधिकारियों की बैठक बुलाई। इस बैठक में उन्होंने एसआईआर, बीएलए और बूथ कमेटियों से जुड़े अधूरे कामों की समीक्षा की और सभी को एक महीने का समय दिया। उनका साफ संदेश था कि संगठन केवल नारों से नहीं, बल्कि बूथ स्तर की मजबूती से खड़ा होता है।
शुभलेश यादव ने शुरुआत में ही यह समझ लिया था कि केवल भाषणों और बैठकों से चुनावी लड़ाई नहीं जीती जा सकती। बूथ कमेटियां और जमीनी नेटवर्क ही किसी भी दल की असली ताकत होते हैं। यही वजह है कि उन्होंने सबसे पहले संगठन की बुनियाद मजबूत करने पर जोर दिया।
दूसरी तरफ उन्होंने पार्टी के भीतर चल रही नाराजगी को भी गंभीरता से लिया। समाजवादी पार्टी पिछले कुछ समय से बरेली में अंदरूनी खींचतान और गुटबाजी से जूझ रही थी। कई पुराने नेता खुद को अलग-थलग महसूस कर रहे थे। ऐसे माहौल में शुभलेश यादव ने नेताओं के घर जाकर उनसे मुलाकात करने का फैसला किया। राजनीति में अक्सर नेता पद मिलने के बाद दूरी बना लेते हैं, लेकिन शुभलेश यादव ने उल्टा रास्ता चुना।

सबसे ज्यादा चर्चा उनकी उन यादव नेताओं से मुलाकात की रही जिन्हें कभी उनका प्रतिस्पर्धी माना जाता था। उन्होंने पूर्व राज्यसभा सांसद और करीब ढाई दशक तक समाजवादी पार्टी के जिला अध्यक्ष रहे वीरपाल सिंह यादव के घर जाकर उनका आशीर्वाद लिया। इसके अलावा पूर्व विधायक महिपाल सिंह यादव, प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य अरविंद सिंह यादव, निवर्तमान जिला महासचिव संजीव यादव और सूरज यादव जैसे नेताओं से भी उनके घर जाकर उन्होंने मुलाकात की।

राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा इसलिए भी ज्यादा रही क्योंकि इन नेताओं में से कुछ को शुभलेश यादव का राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी माना जाता था। लेकिन शुभलेश यादव ने विरोध की राजनीति के बजाय संवाद की राजनीति को प्राथमिकता दी। उन्होंने साफ संकेत दिया कि यदि संगठन को मजबूत करना है तो व्यक्तिगत मतभेदों को पीछे छोड़ना होगा।
यही नहीं, उन्होंने केवल यादव नेताओं तक खुद को सीमित नहीं रखा। वह पूर्व मंत्री भगवत सरन गंगवार, अता उर रहमान और शहजिल इस्लाम जैसे नेताओं के घर भी पहुंचे। इससे यह संदेश गया कि वह संगठन को किसी एक खांचे में नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक और राजनीतिक संतुलन के साथ आगे बढ़ाना चाहते हैं।

उनकी इस शैली का असर भी देखने को मिला। जिन नेताओं के बारे में माना जा रहा था कि वे नाराज हैं, उन्होंने शुभलेश यादव का स्वागत किया और उन्हें मिठाई खिलाकर बधाई दी। समाजवादी पार्टी के पार्षद शमीम अहमद ने भी इसे सकारात्मक कदम बताया। बताया जाता है कि एक महत्वपूर्ण बैठक का आयोजन उनके आवास पर भी हुआ, जहां कुछ नाराज नेताओं के साथ बातचीत की गई।
दरअसल, बरेली में समाजवादी पार्टी पिछले कुछ वर्षों से उस मजबूती के साथ दिखाई नहीं दे रही थी, जिसके लिए वह जानी जाती रही है। पार्टी के भीतर गुटबाजी बढ़ी थी और कई कार्यकर्ता निष्क्रिय हो गए थे। ऐसे में शुभलेश यादव के सामने केवल संगठन चलाने की जिम्मेदारी नहीं थी, बल्कि उसमें नई जान फूंकने की चुनौती भी थी।

शुभलेश यादव ने यह समझ लिया है कि आने वाले चुनावों में भाजपा जैसी मजबूत संगठन वाली पार्टी से मुकाबला केवल भावनाओं से नहीं किया जा सकता। इसके लिए बूथ स्तर तक मजबूत नेटवर्क और सक्रिय कार्यकर्ताओं की जरूरत होगी। यही वजह है कि उन्होंने अब जोन स्तर पर बैठकों की नई रणनीति बनाई है।
शुभलेश यादव ने बताया कि 24 मई को वह समयसीमा समाप्त हो जाएगी जो उन्होंने निवर्तमान पदाधिकारियों को दी थी। इसके बाद 27 मई के बाद एक बड़ी बैठक बुलाई जाएगी। इसी बैठक के बाद पूरे जिले में संगठनात्मक बैठकों का सिलसिला शुरू होगा। दिलचस्प बात यह है कि इस बार बैठकों को केवल विधानसभा स्तर तक सीमित नहीं रखा जाएगा। शुभलेश यादव ने बताया कि प्रत्येक विधानसभा को छह से सात जोनों में बांटा गया है और वह खुद हर जोन में जाकर कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों के साथ बैठक करेंगे। राजनीतिक तौर पर इसे काफी महत्वपूर्ण रणनीति माना जा रहा है क्योंकि इससे संगठन की सीधी पकड़ बूथ स्तर तक मजबूत होगी।

सूत्रों की मानें तो नई जिला कार्यकारिणी के गठन पर भी तेजी से काम चल रहा है। इस बार कोशिश यह है कि संगठन में पुराने और अनुभवी नेताओं के साथ युवा चेहरों को भी जगह दी जाए। साथ ही जातीय और सामाजिक संतुलन का भी विशेष ध्यान रखा जाएगा।
महानगर अध्यक्ष शमीम खां सुल्तानी के साथ शुभलेश यादव की जुगलबंदी भी इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई है। बताया जा रहा है कि दोनों नेताओं के बीच बेहतर तालमेल का असर महानगर की दोनों विधानसभा सीटों पर भी दिखाई दे रहा है। जिसका अभाव शिवचरण कश्यप के कार्यकाल में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा था। पार्टी कार्यकर्ताओं का कहना है कि लंबे समय बाद संगठन में समन्वय और संवाद का माहौल बनता दिखाई दे रहा है।
बरेली की राजनीति को करीब से देखने वाले लोग मानते हैं कि शुभलेश यादव इस समय केवल जिला अध्यक्ष की भूमिका नहीं निभा रहे, बल्कि वह संगठन को दोबारा खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी राजनीति का तरीका फिलहाल टकराव के बजाय संवाद और समन्वय पर आधारित दिखाई दे रहा है।

हालांकि चुनौतियां अभी भी कम नहीं हैं। समाजवादी पार्टी के भीतर कई स्तरों पर असंतोष मौजूद है। टिकट की राजनीति, गुटबाजी और पुराने विवाद अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। लेकिन शुभलेश यादव जिस तरह लगातार नेताओं से मुलाकात कर रहे हैं और संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करने में जुटे हैं, उससे यह जरूर संकेत मिल रहा है कि वह लंबी राजनीतिक तैयारी के साथ मैदान में उतरे हैं।

बरेली में आने वाले समय में समाजवादी पार्टी किस स्थिति में होगी, यह तो भविष्य तय करेगा, लेकिन इतना जरूर है कि शुभलेश यादव ने अपनी सियासी चाल चल दी है। अब उनकी कोशिश यह है कि नाराजगी को समर्थन में बदला जाए, निष्क्रिय कार्यकर्ताओं को सक्रिय किया जाए और बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत कर एक नई राजनीतिक जमीन तैयार की जाए। फिलहाल बरेली की राजनीति में यही चर्चा सबसे ज्यादा है कि क्या शुभलेश यादव समाजवादी पार्टी को फिर से पुराने अंदाज में खड़ा कर पाएंगे।




