नीरज सिसौदिया, बरेली
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारियों में अभी भले ही समय हो, लेकिन समाजवादी पार्टी ने बरेली जिले में अपनी राजनीतिक बिसात बिछानी शुरू कर दी है। पार्टी के जिलाध्यक्ष शुभलेश यादव ने एक ऐसी पहल शुरू की है, जिसे आगामी चुनावी रणनीति का सबसे अहम आधार माना जा रहा है। यह पहल है—बूथ स्तर पर जातिगत गणना की।
16 जून से शुरू हुई यह प्रक्रिया 10 जुलाई तक पूरी करने का लक्ष्य रखा गया है। खास बात यह है कि यह गणना पूरे परिवारों की नहीं, बल्कि केवल मतदाताओं की की जा रही है ताकि चुनावी दृष्टि से सटीक और उपयोगी आंकड़े सामने आ सकें। बरेली जिले की सभी नौ विधानसभा सीटों पर किस जाति के कितने वोटर हैं, इसका स्पष्ट और प्रमाणिक ब्यौरा तैयार किया जा रहा है।
वोटर लिस्ट पर ही दर्ज हो रही है जाति, गड़बड़ी की नहीं कोई गुंजाइश
इस अभियान की सबसे बड़ी विशेषता इसका तरीका है। आम तौर पर जातीय गणना के नाम पर अनुमान या मौखिक सूचनाओं के आधार पर आंकड़े तैयार कर लिए जाते थे, जिनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठते रहे हैं। लेकिन इस बार समाजवादी पार्टी ने ऐसा मॉडल अपनाया है जिसमें किसी भी तरह की गड़बड़ी या मनमानी की संभावना लगभग समाप्त हो जाती है।

प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में 20 से 25 प्रमुख नेताओं और जिम्मेदार कार्यकर्ताओं को यह दायित्व सौंपा गया है। उन्हें अधिकृत मतदाता सूची में प्रत्येक वोटर के नाम के सामने उसकी जाति पेन से अंकित करनी है। इसके बाद यह सूची पार्टी कार्यालय में जमा कराई जाएगी, जहां विस्तृत गणना कर यह तय किया जाएगा कि किस विधानसभा क्षेत्र में किस जाति के कितने मतदाता मौजूद हैं।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस तरह तैयार होने वाला डेटा न केवल चुनावी रणनीति तय करने में मदद करेगा, बल्कि उम्मीदवार चयन और संगठनात्मक विस्तार के लिए भी महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
‘जिसकी जितनी आबादी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’ को जमीन पर उतारने की कोशिश
समाजवादी पार्टी लंबे समय से जातिगत जनगणना की मांग उठाती रही है। पार्टी का मानना रहा है कि समाज के विभिन्न वर्गों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व और अधिकार मिलने चाहिए।
जिलाध्यक्ष शुभलेश यादव का कहना है कि पार्टी का सबसे प्रमुख मुद्दा जातिगत गणना रहा है और इसे लेकर लगातार सरकार के समक्ष आवाज उठाई जाती रही है। उनका कहना है कि जब तक वास्तविक आंकड़े सामने नहीं आएंगे, तब तक सामाजिक न्याय और समान भागीदारी का सपना अधूरा रहेगा।
उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी जिस पीडीए—पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक—की अवधारणा को लेकर आगे बढ़ रही है, उसकी वास्तविक ताकत का पता भी इसी गणना से चलेगा। बरेली जिले में यह अभियान पीडीए की राजनीतिक और सामाजिक शक्ति को व्यवस्थित रूप से समझने का एक बड़ा माध्यम बनेगा।
टिकट वितरण में भी पड़ सकता है असर
पार्टी सूत्रों की मानें तो इस गणना के आंकड़े आगामी विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण को भी प्रभावित कर सकते हैं। जिस विधानसभा क्षेत्र में जिस सामाजिक वर्ग की संख्या अधिक होगी, वहां उसी आधार पर उम्मीदवार चयन की रणनीति बनाई जा सकती है।
यह कदम स्थानीय स्तर पर सामाजिक समीकरणों को समझने और मतदाताओं के अनुरूप नेतृत्व तैयार करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे पार्टी उन क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत कर सकती है, जहां अब तक वह अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर पाई है।
इस अभियान का दायरा केवल जातीय आंकड़ों तक सीमित नहीं है। पार्टी कार्यकर्ता 11 अन्य महत्वपूर्ण बिंदुओं पर भी जानकारी एकत्र कर रहे हैं।
इससे पार्टी को प्रत्येक बूथ का एक विस्तृत सामाजिक और राजनीतिक प्रोफाइल तैयार करने में मदद मिलेगी, जो चुनावी अभियान को और अधिक प्रभावी बना सकता है।
ईमानदारी से काम करने वालों को मिलेगा सम्मान
संगठन ने स्पष्ट कर दिया है कि जो कार्यकर्ता और नेता इस अभियान में पूरी निष्ठा और ईमानदारी से कार्य करेंगे, उन्हें संगठन की ओर से सम्मानित और प्रोत्साहित किया जाएगा। इससे कार्यकर्ताओं में उत्साह और प्रतिस्पर्धा दोनों का माहौल देखने को मिल रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि किसी भी बड़े चुनाव से पहले संगठन को सक्रिय और ऊर्जावान बनाए रखना जीत की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होता है और समाजवादी पार्टी इस दिशा में गंभीरता से काम करती दिखाई दे रही है।
जातिगत गणना से समाज को क्या लाभ?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जातिगत आंकड़े पारदर्शी और प्रमाणिक हों तो इसके अनेक सामाजिक और प्रशासनिक लाभ हो सकते हैं।
सबसे पहला लाभ यह है कि समाज के वंचित और पिछड़े वर्गों की वास्तविक स्थिति सामने आती है। इससे नीतियों और योजनाओं को अधिक प्रभावी ढंग से तैयार किया जा सकता है।
दूसरा, राजनीतिक प्रतिनिधित्व को अधिक संतुलित और न्यायपूर्ण बनाया जा सकता है। जिस वर्ग की जितनी आबादी हो, उसे उसी अनुपात में अवसर और भागीदारी देने की दिशा में कदम बढ़ाए जा सकते हैं।
तीसरा, सामाजिक असमानताओं की पहचान कर उन्हें दूर करने के लिए विशेष कार्यक्रम तैयार किए जा सकते हैं। शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और आर्थिक सहायता जैसी योजनाओं का लाभ वास्तविक जरूरतमंदों तक पहुंचाने में मदद मिलती है।
चौथा, चुनावी राजनीति में अनुमान और अफवाहों की जगह प्रमाणिक आंकड़े ले सकते हैं, जिससे राजनीतिक दलों की रणनीति अधिक यथार्थवादी बनती है।
बरेली में समाजवादी पार्टी द्वारा अपनाया गया यह मॉडल राजनीतिक दृष्टि से एक नया प्रयोग माना जा रहा है। वोटर लिस्ट के आधार पर बूथवार जातिगत गणना कराना न केवल संगठनात्मक मजबूती का संकेत है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि पार्टी आगामी चुनाव को लेकर कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती।
आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस गणना से निकलने वाले आंकड़े बरेली की नौ विधानसभा सीटों के राजनीतिक समीकरणों को किस प्रकार प्रभावित करते हैं। फिलहाल इतना तय है कि शुभलेश यादव के नेतृत्व में शुरू हुआ यह अभियान जिले की राजनीति में नई चर्चा और नई संभावनाओं को जन्म दे रहा है।




