नीरज सिसौदिया, बरेली
उत्तर प्रदेश की राजनीति में कई विधानसभा सीटों को लेकर अलग-अलग तरह की मान्यताएं और राजनीतिक चर्चाएं प्रचलित हैं। बरेली जिले की सुरक्षित फरीदपुर विधानसभा सीट भी ऐसी ही सीटों में शामिल है। चुनावी सभाओं में अक्सर यह दावा किया जाता है कि “फरीदपुर से जिस पार्टी का विधायक जीतता है, उत्तर प्रदेश में उसी पार्टी की सरकार बनती है।” समाजवादी पार्टी के बरेली जिलाध्यक्ष शुभलेश यादव भी कई राजनीतिक सभाओं और कार्यकर्ता सम्मेलनों में यह बात कहते रहे हैं। वह यह भी कहते रहे हैं कि जब-जब फरीदपुर से समाजवादी पार्टी का विधायक बना तब-तब प्रदेश में सपा की सरकार बनी, हाल ही में प्रदेश अध्यक्ष श्यामलाल पाल के आगमन पर आयोजित सम्मेलन में भी शुभलेश यादव कुछ इसी तरह का दावा करते नजर आए थे लेकिन यदि फरीदपुर विधानसभा के पिछले पांच दशक के चुनावी इतिहास पर नजर डाली जाए तो यह दावा पूरी तरह सही साबित नहीं होता।
दरअसल, फरीदपुर विधानसभा का चुनावी इतिहास बताता है कि इस सामान्य दावे के कई अपवाद मौजूद हैं। वर्ष 1980 में फरीदपुर सीट से भारतीय जनता पार्टी के नंदराम विधायक निर्वाचित हुए, जबकि उत्तर प्रदेश में सरकार कांग्रेस की बनी। इससे स्पष्ट हो जाता है कि “जिस पार्टी का विधायक, उसी पार्टी की सरकार” वाला दावा ऐतिहासिक तथ्यों से मेल नहीं खाता।
इसी तरह एक और उदाहरण वर्ष 1996 का है। उस चुनाव में नंदराम समाजवादी पार्टी के टिकट पर फरीदपुर से विधायक बने, लेकिन विधानसभा त्रिशंकु रही। तत्काल समाजवादी पार्टी की सरकार नहीं बनी। बाद के राजनीतिक घटनाक्रम और गठबंधनों के बाद भाजपा-बसपा के सहयोग से सरकार बनी। इसलिए यह कहना भी सही नहीं होगा कि जब-जब फरीदपुर से समाजवादी पार्टी जीती, तब-तब प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनी।
हालांकि फरीदपुर विधानसभा के इतिहास में एक अलग और बेहद दिलचस्प चुनावी संयोग जरूर दिखाई देता है और वह जुड़ा है पूर्व विधायक स्वर्गीय डॉ. सियाराम सागर से, जो पूर्व ब्लॉक प्रमुख एवं वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए समाजवादी पार्टी के टिकट के प्रबल दावेदार चंद्रसेन सागर के बड़े भाई थे।
डॉ. सियाराम सागर का राजनीतिक सफर वर्ष 1977 में शुरू हुआ, जब उन्होंने जनता पार्टी के टिकट पर फरीदपुर विधानसभा सीट से जीत हासिल की। उस समय समाजवादी पार्टी का गठन नहीं हुआ था और पूरे देश में आपातकाल के बाद जनता पार्टी की लहर थी। उत्तर प्रदेश में भी जनता पार्टी की सरकार बनी। यह उनकी पहली ऐतिहासिक जीत थी।
इसके बाद वर्ष 1989 में डॉ. सियाराम सागर ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीता। इसी विधानसभा कार्यकाल में जनता दल के नेतृत्व में सरकार बनी और मुलायम सिंह यादव पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने।
वर्ष 1993 में डॉ. सियाराम सागर समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव जीते। इस चुनाव के बाद समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन की सरकार बनी तथा मुलायम सिंह यादव दूसरी बार मुख्यमंत्री बने।
इसके बाद वर्ष 2002 में डॉ. सियाराम सागर ने एक बार फिर फरीदपुर सीट पर जीत दर्ज की। हालांकि चुनाव के तुरंत बाद समाजवादी पार्टी सरकार नहीं बना सकी, लेकिन वर्ष 2003 में बदले राजनीतिक समीकरणों के बाद मुलायम सिंह यादव तीसरी बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। इस तरह डॉ. सियाराम सागर की जीत वाले उसी विधानसभा कार्यकाल में समाजवादी नेतृत्व फिर सत्ता तक पहुंचा।
वर्ष 2012 में डॉ. सियाराम सागर ने फरीदपुर से लगातार अपनी राजनीतिक पकड़ साबित करते हुए जीत दर्ज की। इस चुनाव में समाजवादी पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला और अखिलेश यादव पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने।
यदि चुनावी इतिहास को क्रमवार देखा जाए तो 1977 में जनता पार्टी की सरकार, 1989 में मुलायम सिंह यादव की पहली सरकार, 1993 में मुलायम सिंह यादव की दूसरी सरकार, 2003 में तीसरी बार मुलायम सिंह यादव का मुख्यमंत्री बनना तथा 2012 में अखिलेश यादव का मुख्यमंत्री बनना—इन सभी विधानसभा कार्यकालों में एक समान तथ्य यह दिखाई देता है कि डॉ. सियाराम सागर फरीदपुर से विधायक थे।
यही कारण है कि फरीदपुर के राजनीतिक गलियारों में आज भी कई लोग इसे डॉ. सियाराम सागर का चुनावी संयोग कहते हैं। यह संयोग इसलिए चर्चा का विषय बनता है क्योंकि उनकी चुनावी जीतों के दौरान प्रदेश की राजनीति में समाजवादी नेतृत्व सत्ता तक पहुंचा। हालांकि राजनीतिक विश्लेषक इसे केवल एक संयोग मानते हैं, न कि इसका प्रत्यक्ष कारण।
दूसरी ओर, जब डॉ. सियाराम सागर चुनाव नहीं जीत सके, तब ऐसा संयोग दोबारा देखने को नहीं मिला। वर्ष 1996 में समाजवादी पार्टी के नंदराम विधायक बने, लेकिन मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री नहीं बन सके। इसी प्रकार अन्य चुनावों में भी परिस्थितियां अलग रहीं। इसलिए यदि कोई यह दावा करे कि फरीदपुर से जिस पार्टी का विधायक जीतता है, उसी पार्टी की सरकार बनती है, तो वह इतिहास की कसौटी पर सही नहीं उतरता।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि चुनावी मंचों से इतिहास का उल्लेख करते समय तथ्यों की शुद्धता सबसे अधिक महत्वपूर्ण होती है। अधूरी जानकारी कई बार गलत राजनीतिक संदेश देती है। फरीदपुर विधानसभा का इतिहास यह बताता है कि यहां कई चुनावी संयोग जरूर रहे हैं, लेकिन उन्हें तथ्य और कारण के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।
वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के बीच फरीदपुर सीट एक बार फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में है। पूर्व ब्लॉक प्रमुख चंद्रसेन सागर समाजवादी पार्टी के टिकट के प्रबल दावेदारों में माने जा रहे हैं। ऐसे समय में उनके बड़े भाई स्वर्गीय डॉ. सियाराम सागर के चुनावी इतिहास और उससे जुड़े इस अनोखे राजनीतिक संयोग की चर्चा भी क्षेत्र में तेज हो गई है।
फरीदपुर विधानसभा के पांच दशक के चुनावी इतिहास का निष्पक्ष अध्ययन यही बताता है कि सामान्य राजनीतिक नारों से अलग वास्तविक चुनावी रिकॉर्ड कहीं अधिक दिलचस्प है। एक ओर “जिसका विधायक, उसकी सरकार” वाला दावा कई बार गलत साबित होता है, वहीं दूसरी ओर डॉ. सियाराम सागर की चुनावी जीतों और समाजवादी नेतृत्व के सत्ता तक पहुंचने का संयोग आज भी राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है। इतिहास के पन्नों में दर्ज यह संयोग भले ही राजनीतिक कारण न हो, लेकिन फरीदपुर की राजनीति का एक उल्लेखनीय अध्याय अवश्य है।




