बरेली। बरेली में तालाबों, पोखरों, जलभराव क्षेत्रों और सरकारी जमीनों पर कथित कब्जे को लेकर एक ऐसी शिकायत सामने आई है, जिसने प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है। शिकायतकर्ता जिला सहकारी संघ के पूर्व चेयरमैन और वरिष्ठ भाजपा नेता महेश पांडेय ने नगर निगम बरेली के वर्तमान और पूर्व अधिकारियों तथा कर्मचारियों पर भूमाफियाओं से कथित मिलीभगत कर सरकारी संपत्तियों और जलस्रोतों को नुकसान पहुंचाने, अवैध निर्माणों को संरक्षण देने और शिकायतों पर प्रभावी कार्रवाई न करने जैसे बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह शिकायत केवल स्थानीय प्रशासन तक सीमित नहीं रखी गई है। शिकायत की प्रतियां राजस्व परिषद के अध्यक्ष, प्रधान न्यायाधीश सुप्रीम कोर्ट, सचिव डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल एंड ट्रेनिंग एंड पब्लिक ग्रीवांसेज, मुख्य न्यायाधीश इलाहाबाद हाईकोर्ट, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, जिलाधिकारी बरेली, मंडलायुक्त बरेली और उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव तक भेजी गई हैं।
दिनांक 25 अगस्त 2026 की इस शिकायत में आरोपों की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें कई स्थानों पर तालाबों और सरकारी जमीनों की कथित रूप से बदल दी गई स्थिति का उल्लेख करते हुए मामले की उच्चस्तरीय जांच और दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की मांग की गई है।
‘तालाब बचाने के आदेशों की उड़ाई जा रही धज्जियां’
शिकायत में सुप्रीम कोर्ट द्वारा हिंचलाल तिवारी बनाम कमला देवी मामले में वर्ष 2001 में दी गई कानूनी व्यवस्था और तालाबों, पोखरों तथा जलस्रोतों के संरक्षण से जुड़े शासनादेशों का हवाला दिया गया है। शिकायतकर्ता महेश पांडेय का आरोप है कि नगर निगम बरेली में तैनात अधिकारियों और कर्मचारियों द्वारा इन आदेशों और निर्देशों का समुचित पालन नहीं किया गया।
शिकायत में कहा गया है कि सार्वजनिक उपयोग में आने वाले तालाबों, पोखरों और जलमग्न क्षेत्रों से संबंधित शिकायतों का निस्तारण कथित रूप से मनमाने तरीके से किया गया। आरोप है कि जिन स्थानों पर अवैध निर्माण हुए, वहां कार्रवाई करने के बजाय कुछ मामलों में कब्जेदारों को संरक्षण मिला और सरकारी अभिलेखों से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों को सामने लाने में भी गंभीर लापरवाही बरती गई।
हालांकि, शिकायत में लगाए गए इन आरोपों की स्वतंत्र आधिकारिक जांच या पुष्टि होना अभी बाकी है।
तीन बड़े मामलों का जिक्र, हजारों करोड़ की संपत्ति का दावा
शिकायत में बरेली शहर और उसके आसपास स्थित कई राजस्व गांवों की जमीनों का उल्लेख करते हुए गंभीर सवाल उठाए गए हैं। शिकायतकर्ता ने विशेष रूप से तीन मामलों को उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत किया है।
सिविल लाइंस क्षेत्र में तालाब की जमीन का मामला
शिकायत के अनुसार, सिविल लाइंस क्षेत्र में स्थित एक भूमि, जो पूर्व में राजस्व ग्राम कसरा हाथीपुर से संबंधित बताई गई है और गाटा संख्या 488 का उल्लेख किया गया है, कभी तालाब के रूप में दर्ज थी।
शिकायतकर्ता महेश पांडेय ने आरोप लगाया है कि उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन कानून से पहले की स्थिति से जुड़े इस तालाब क्षेत्र में बाद के वर्षों में बदलाव हुआ और भूमि पर बस्तियां तथा निर्माण विकसित हो गए। शिकायत में नगर निगम और बरेली विकास प्राधिकरण के कुछ अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं।
महेश पांडेय का आरोप है कि यदि संबंधित राजस्व अभिलेखों और भूमि की मूल प्रकृति की निष्पक्ष जांच की जाए तो बड़े स्तर पर सरकारी संपत्ति और जलस्रोत संरक्षण से जुड़े तथ्य सामने आ सकते हैं।
ब्रह्मपुर में विशाल जलमग्न क्षेत्र पर सवाल
दूसरे उदाहरण के रूप में शिकायत में राजस्व ग्राम ब्रह्मपुर की गाटा संख्या 155 से 170 तक की भूमि का उल्लेख किया गया है। महेश पांडेय के अनुसार यह क्षेत्र सैकड़ों बीघा और लाखों वर्ग गज भूमि से जुड़ा हुआ है, जिसे कभी जलमग्न क्षेत्र और तालाब बताया गया है।
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि इस भूमि के संबंध में कथित रूप से प्रमाण पत्र जारी किए गए और बाद में प्लॉटिंग जैसी गतिविधियां हुईं। नगर निगम और अन्य संबंधित विभागों में तैनात अधिकारियों पर शिकायतकर्ता ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि लगातार शिकायतें किए जाने के बावजूद प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि यदि शिकायत में वर्णित भूमि की मूल प्रकृति वास्तव में तालाब या जलमग्न क्षेत्र की पाई जाती है तो उसके संरक्षण, कब्जे और निर्माण से जुड़े सवाल बेहद गंभीर कानूनी मुद्दा बन सकते हैं।
85 हजार वर्ग मीटर क्षेत्र और ‘10 हजार करोड़’ से ज्यादा की संपत्ति का दावा
तीसरे मामले में महेश पांडेय ने राजस्व ग्राम विश्रामपुर नगला की गाटा संख्या 130, 131, 132 और 133 का उल्लेख किया है। शिकायत में करीब 85 हजार वर्ग मीटर क्षेत्र को तालाब क्षेत्र बताया गया है।
आरोप है कि इस जमीन पर भूमाफियाओं द्वारा कथित रूप से कब्जे और बिक्री की गतिविधियां की गईं तथा इस पूरे मामले में सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका संदिग्ध रही। शिकायत में यह भी कहा गया है कि इस प्रकार की संपत्तियों का कुल बाजार मूल्य दस हजार करोड़ रुपये से अधिक हो सकता है।
शिकायतकर्ता ने दावा किया है कि इस मामले से जुड़े कुछ विवाद न्यायालयों तक पहुंचे और वहां सरकार को नुकसान उठाना पड़ा। शिकायत में संबंधित अधिकारियों पर न्यायालयों के समक्ष सही तथ्यों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत न करने समेत कई गंभीर आरोप लगाए गए हैं।
हालांकि, दस हजार करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति संबंधी दावा शिकायतकर्ता का है और इसकी स्वतंत्र वित्तीय अथवा सरकारी पुष्टि होना आवश्यक है।
अक्षर विहार तालाब समेत ‘करीब 100 अन्य तालाबों’ का भी जिक्र
शिकायत में केवल तीन स्थानों का ही उल्लेख नहीं है। इसमें दावा किया गया है कि बरेली नगर निगम की सीमा में स्थित अक्षर विहार तालाब, सिविल लाइंस समेत लगभग 100 अन्य तालाबों की स्थिति भी गंभीर है।
शिकायतकर्ता का आरोप है कि नगर निगम के अधिकारियों और कर्मचारियों की कथित निष्क्रियता अथवा मिलीभगत के चलते कई तालाबों और सरकारी जमीनों पर भूमाफियाओं का कब्जा हुआ।
अगर यह आरोप जांच में सही पाए जाते हैं तो मामला केवल जमीन कब्जाने का नहीं, बल्कि शहर के पर्यावरण और जल संरक्षण से जुड़े बड़े संकट का भी हो सकता है। तेजी से फैलते शहरीकरण के बीच तालाबों और प्राकृतिक जल निकासी क्षेत्रों का खत्म होना भविष्य में जलभराव, भूजल संकट और पर्यावरणीय असंतुलन का कारण बन सकता है।
पुरानी जांचों और CBI जांच की संस्तुति का भी हवाला
शिकायत की एक महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें पूर्व में हुई जांचों का भी उल्लेख किया गया है। शिकायतकर्ता के अनुसार तत्कालीन मंडलायुक्त अमल कुमार वर्मा द्वारा विधानमंडल दल की आश्वासन समिति के निर्देश पर कराई गई जांच की रिपोर्ट शासन को भेजी गई थी।

इसके अलावा शिकायत में तत्कालीन नगर मुख्य अधिकारी शरद शेखर सिंह के कार्यकाल में कथित रूप से दोषी पाए गए अधिकारियों और कर्मचारियों की सूची शासन को भेजे जाने का भी उल्लेख है।
शिकायतकर्ता ने यह भी कहा है कि तत्कालीन निदेशक स्थानीय निकाय तथा तत्कालीन नगर आयुक्त शैलेंद्र चौधरी द्वारा सरकारी जमीनों से जुड़े मामलों की जांच सीबीआई से कराए जाने की संस्तुति शासन को भेजी गई थी।
शिकायत में सवाल उठाया गया है कि यदि पूर्व में जांच रिपोर्टें, जिम्मेदार अधिकारियों की सूची और उच्चस्तरीय जांच की संस्तुतियां शासन तक पहुंच चुकी थीं तो फिर इन मामलों में आगे क्या कार्रवाई हुई?
शिकायतकर्ता ने लगाए शिकायतों को दबाने और धमकी देने के आरोप
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि मामले को उठाने और शिकायतें करने के बावजूद प्रकरण को कथित रूप से ठंडे बस्ते में डालने का प्रयास किया गया। शिकायतकर्ता ने कुछ अधिकारियों और भूमाफियाओं पर दबाव बनाने तथा विभिन्न प्रकार की धमकियां देने का भी आरोप लगाया है।
इन आरोपों की भी स्वतंत्र जांच होना आवश्यक है। लेकिन शिकायतकर्ता ने जिस तरह से देश और प्रदेश के शीर्ष संवैधानिक एवं प्रशासनिक पदों तक अपनी शिकायत पहुंचाई है, उससे साफ है कि वह स्थानीय स्तर पर कार्रवाई से संतुष्ट नहीं है और पूरे मामले की निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच चाहता है।
राजस्व परिषद से संयुक्त जांच टीम बनाने की मांग
शिकायतकर्ता महेश पांडेय ने राजस्व परिषद के अध्यक्ष से मांग की है कि मामले की गंभीरता को देखते हुए एक संयुक्त जांच टीम गठित की जाए।
मांग की गई है कि जांच में नगर निगम, राजस्व विभाग और अन्य संबंधित विभागों की भूमिका की पड़ताल की जाए तथा दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों की जवाबदेही तय की जाए।
शिकायत में यह भी मांग की गई है कि भ्रष्टाचार निवारण कानून और भारतीय न्याय संहिता की संबंधित धाराओं के तहत आवश्यक आपराधिक कार्रवाई की जाए। साथ ही कथित रूप से भ्रष्टाचार से अर्जित संपत्ति और अवैध कब्जों से जुड़ी अचल संपत्तियों की जांच कर उन्हें जब्त करने की कार्रवाई की जाए।
अवैध निर्माण ध्वस्त कर तालाबों को पुनर्स्थापित करने की मांग
शिकायतकर्ता महेश पांडेय की सबसे बड़ी मांगों में से एक यह है कि जिन तालाबों और जलस्रोतों पर कथित रूप से अवैध निर्माण किए गए हैं, उनकी वास्तविक स्थिति की जांच कराई जाए और यदि कब्जे अथवा निर्माण अवैध पाए जाते हैं तो उन्हें हटाकर तालाबों को उनके मूल स्वरूप में पुनर्स्थापित किया जाए।
यह मांग सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट द्वारा जलस्रोतों के संरक्षण को लेकर समय-समय पर दिए गए निर्देशों से जुड़ी हुई है।
अब सबसे बड़ा सवाल—क्या होगी जांच?
बरेली में सरकारी जमीनों और तालाबों से जुड़े विवाद कोई नया विषय नहीं हैं, लेकिन इस शिकायत ने एक साथ कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं—
- क्या जिन जमीनों का उल्लेख शिकायत में किया गया है, वे वास्तव में कभी तालाब या जलमग्न क्षेत्र थीं?
- क्या संबंधित राजस्व अभिलेखों में समय के साथ बदलाव हुआ?
- क्या नगर निगम और विकास प्राधिकरण के अधिकारियों की भूमिका की कभी निष्पक्ष जांच हुई?
- पूर्व में हुई जांचों और शासन को भेजी गई रिपोर्टों में क्या निष्कर्ष निकले?
- CBI जांच की संस्तुति का दावा कितना सही है और उस पर शासन स्तर पर क्या निर्णय हुआ?
- लगभग 100 तालाबों के संबंध में शिकायतकर्ता द्वारा किए गए दावे की वास्तविक स्थिति क्या है?
- और सबसे बड़ा सवाल—यदि सरकारी जमीन और जलस्रोतों पर अवैध कब्जे हुए हैं तो उनकी जिम्मेदारी आखिर किसकी तय होगी?
25 अगस्त 2026 को भेजी गई इस शिकायत ने बरेली के प्रशासनिक ढांचे पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। अब निगाहें मुख्यमंत्री कार्यालय, मुख्य सचिव, राजस्व परिषद और न्यायिक संस्थाओं की ओर हैं कि इतने गंभीर आरोपों वाली शिकायत पर जांच के आदेश होते हैं या मामला फिर फाइलों में दबकर रह जाता है।




