नीरज सिसौदिया, बरेली
बिथरी चैनपुर विधानसभा सीट पर 2027 के चुनाव की आहट के साथ भाजपा के भीतर उम्मीदवार बदलने की चर्चा तेज होने लगी है। मौजूदा विधायक डॉ. राघवेंद्र शर्मा के सामने अब पिछली बार जैसी परिस्थितियां नहीं हैं। समाजवादी पार्टी में पूर्व सांसद धर्मेंद्र कश्यप की बढ़ती सक्रियता और उनकी बेटी कीर्ति कश्यप को बिथरी सीट का प्रभारी बनाए जाने से मुकाबले के समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं। ऐसे में भाजपा के सामने सवाल है कि क्या वह राघवेंद्र शर्मा पर फिर दांव लगाएगी या पूर्व विधायक राजेश कुमार मिश्रा उर्फ पप्पू भरतौल को मैदान में उतारकर मुकाबले को नई धार देगी?
बिथरी की सियासत को करीब से जानने वाले लोगों के बीच पप्पू भरतौल का नाम एक बार फिर गूंजने लगा है। इसकी वजह केवल उनका पुराना विधायक होना नहीं, बल्कि उनकी दबंग छवि, कार्यकर्ताओं के बीच पकड़ और क्षेत्र में बनी राजनीतिक पहचान है। उनके समर्थकों का मानना है कि धर्मेंद्र कश्यप जैसे दबंग छवि वाले नेता की राजनीतिक चुनौती का मुकाबला करने के लिए भाजपा को भी पप्पू भरतौल जैसे मजबूत और आक्रामक तेवर वाले चेहरे की जरूरत होगी।

अगम मौर्य के मुकाबले में भी राघवेंद्र को लगानी पड़ी थी पूरी ताकत
वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने पप्पू भरतौल का टिकट काटकर डॉ. राघवेंद्र शर्मा को मैदान में उतारा था। समाजवादी पार्टी ने अगम मौर्य को उम्मीदवार बनाया। उस चुनाव में राघवेंद्र शर्मा को जीत दिलाने के लिए भाजपा के कई बड़े नेताओं को सक्रिय होना पड़ा था। स्थानीय राजनीतिक आकलन के मुताबिक, दो मौजूदा सांसदों और दो पूर्व सांसदों की सक्रियता भी उनके चुनाव अभियान के लिए अहम रही थी।
उस समय धर्मेंद्र कश्यप भाजपा में थे और उन्होंने राघवेंद्र शर्मा को जिताने के लिए पूरी ताकत लगाई थी। अब तस्वीर बदल चुकी है। धर्मेंद्र कश्यप भाजपा छोड़कर सपा की ओर बढ़ चुके हैं। उनकी बेटी कीर्ति कश्यप को सपा ने बिथरी विधानसभा सीट का प्रभारी घोषित कर दिया है। इससे उनकी दावेदारी मजबूत हुई है, हालांकि अंतिम टिकट की औपचारिक घोषणा को अलग तथ्य के रूप में देखा जाना चाहिए।

इस बदलाव का सीधा राजनीतिक अर्थ है कि राघवेंद्र शर्मा को अगला चुनाव लड़ने की स्थिति में पिछली बार जैसी मदद धर्मेंद्र कश्यप से मिलने की उम्मीद नहीं होगी। उलटे, धर्मेंद्र कश्यप अपनी बेटी के पक्ष में राजनीतिक ताकत झोंक सकते हैं। ऐसे में भाजपा के लिए चुनौती केवल विपक्षी उम्मीदवार का मुकाबला करना नहीं, बल्कि अपने पुराने सहयोगी के राजनीतिक प्रभाव का सामना करना भी होगी।
संतोष गंगवार राज्यपाल, पूर्व सांसद भी अपने बेटों की तैयारी में
राघवेंद्र शर्मा की मदद करने वाले प्रमुख नेताओं में तत्कालीन सांसद संतोष गंगवार की भूमिका भी चर्चा में रही थी। अब संतोष गंगवार झारखंड के राज्यपाल हैं। संवैधानिक पद पर रहते हुए उनसे पहले जैसी प्रत्यक्ष चुनावी सक्रियता की अपेक्षा नहीं की जा सकती। इससे राघवेंद्र शर्मा के सामने अपने बूते संगठन और जनसंपर्क मजबूत करने की जरूरत और बढ़ जाती है।
दूसरी ओर, जिन दो पूर्व सांसदों की सक्रियता को 2022 में राघवेंद्र शर्मा के पक्ष में अहम माना गया था, वे भी अब अपने-अपने बेटों को चुनाव लड़ाने की तैयारी में जुटे बताए जा रहे हैं। इनमें एक के बेटे की उम्मीदवारी लगभग तय मानी जा रही है। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि ये नेता 2027 में अपने राजनीतिक हितों और दूसरे उम्मीदवारों की मदद के बीच किस तरह संतुलन बनाते हैं।
इस तरह पिछले चुनाव में राघवेंद्र शर्मा के पक्ष में सक्रिय रहे कई बड़े चेहरों की भूमिका इस बार बदल सकती है। भाजपा यदि फिर उन्हीं पर भरोसा करती है, तो उसे यह भी देखना होगा कि बदले हुए राजनीतिक समीकरण में उनके लिए किस तरह का समर्थन उपलब्ध रहेगा।
पप्पू भरतौल का दौर, जब गूंजता था ‘न तमंचा, न पिस्तौल’
पप्पू भरतौल की चर्चा की सबसे बड़ी वजह उनकी वह राजनीतिक पहचान है, जो विधायक पद से हटने के पांच साल बाद भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई। उनके समर्थक उन्हें ऐसे दौर का नेता बताते हैं, जब बिथरी चैनपुर की राजनीति में तमंचे और पिस्तौल के दम पर दबदबा कायम करने की कोशिशें चर्चा में रहती थीं। उनके मुताबिक, पप्पू भरतौल ने इस तरह की सियासत को चुनौती देते हुए अपनी अलग पहचान बनाई थी।
उनके समर्थन में प्रचलित नारा—‘न तमंचा, न पिस्तौल, बिथरी में पप्पू भरतौल’—आज भी उनकी राजनीतिक छवि के साथ जोड़ा जाता है। यह नारा भले ही समर्थकों की भावना को व्यक्त करता हो, लेकिन इतना जरूर है कि पप्पू भरतौल का नाम बिथरी की राजनीति में अब भी एक पहचाने जाने वाले चेहरे के रूप में लिया जाता है।
वर्ष 2017 में भाजपा के टिकट पर विधायक बने पप्पू भरतौल को 2022 में पार्टी ने दोबारा मौका नहीं दिया। इसके बावजूद उनकी राजनीतिक चर्चा समाप्त नहीं हुई। उनके समर्थक दावा करते हैं कि विधायक रहते हुए उन्होंने लोगों की समस्याएं सुनने और अधिकारियों तक उनकी बात पहुंचाने के लिए लगातार सक्रियता दिखाई। टिकट कटने के बाद भी लोगों से उनका संपर्क बना रहा।
स्थानीय राजनीतिक बहस में एक तर्क यह भी दिया जाता है कि अपेक्षाकृत शांत स्वभाव वाले राघवेंद्र शर्मा के लिए बिथरी जैसी सीट पर चुनाव जीतने का माहौल बनाने में पप्पू भरतौल की पुरानी राजनीतिक पकड़ और उनके समर्थकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही थी। हालांकि, इस आकलन की पुष्टि के लिए अलग-अलग नेताओं के योगदान और चुनावी आंकड़ों को देखना जरूरी है।

धर्मेंद्र कश्यप की दबंग छवि के सामने भाजपा को चाहिए वैसा ही चेहरा
बिथरी में इस बार मुकाबला केवल दो उम्मीदवारों के बीच नहीं, बल्कि दो अलग राजनीतिक शैलियों के बीच भी हो सकता है। एक तरफ धर्मेंद्र कश्यप की राजनीतिक विरासत और उनकी बेटी कीर्ति कश्यप की संभावित उम्मीदवारी होगी, तो दूसरी तरफ भाजपा को अपने संगठन, मौजूदा विधायक के कामकाज और स्थानीय नेतृत्व की ताकत के आधार पर चुनाव लड़ना होगा।
धर्मेंद्र कश्यप की छवि को देखते हुए भाजपा के सामने ऐसे उम्मीदवार की जरूरत का तर्क दिया जा रहा है, जो राजनीतिक दबाव का मुकाबला कर सके, कार्यकर्ताओं को एकजुट रख सके और क्षेत्र में अपनी स्वतंत्र पहचान के आधार पर चुनाव लड़ सके। पप्पू भरतौल के समर्थक उन्हें इसी कसौटी पर सबसे उपयुक्त मानते हैं।

राघवेंद्र शर्मा के सामने पांच साल के कामकाज का हिसाब
पप्पू भरतौल की वापसी की मांग के बीच डॉ. राघवेंद्र शर्मा के सामने अपनी उपलब्धियां सामने रखने की चुनौती भी है। किसी मौजूदा विधायक के लिए दोबारा टिकट की दावेदारी केवल पुराने चुनावी समीकरणों पर निर्भर नहीं करती। उसे यह भी बताना होता है कि पांच साल में क्षेत्र में कौन-से प्रमुख विकास कार्य हुए, किन समस्याओं का समाधान किया गया और जनता के बीच उसकी व्यक्तिगत पकड़ कितनी मजबूत हुई।
बिथरी चैनपुर में सड़क, बिजली, जलभराव और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े मुद्दे मतदाताओं के लिए महत्वपूर्ण रहेंगे। यदि भाजपा राघवेंद्र शर्मा को दोबारा उम्मीदवार बनाती है, तो उनके कार्यकाल का मूल्यांकन स्वाभाविक रूप से पप्पू भरतौल के पिछले कार्यकाल और संभावित सपा उम्मीदवार की राजनीतिक चुनौती के साथ होगा।
यहीं भाजपा के लिए उम्मीदवार चयन का सवाल अहम हो जाता है। पार्टी को यह तय करना होगा कि मौजूदा विधायक के अनुभव और संगठनात्मक निरंतरता पर भरोसा किया जाए या फिर पप्पू भरतौल जैसे पुराने चेहरे को सामने लाकर चुनावी मुकाबले की रणनीति बदली जाए।

बिथरी में फिर क्यों गूंज रहा है पप्पू भरतौल का नाम?
धर्मेंद्र कश्यप की बेटी कीर्ति कश्यप की बढ़ती राजनीतिक सक्रियता ने बिथरी में भाजपा की रणनीति को लेकर नई बहस छेड़ दी है। पिछले चुनाव में राघवेंद्र शर्मा के साथ खड़े रहे कई बड़े नेताओं की भूमिका बदलने की संभावना और धर्मेंद्र कश्यप के सपा खेमे में जाने से यह मुकाबला पहले से अधिक दिलचस्प हो सकता है।
ऐसे में भाजपा के सामने दो रास्ते हैं। पहला, मौजूदा विधायक डॉ. राघवेंद्र शर्मा पर भरोसा कायम रखते हुए उनके कामकाज और संगठन के दम पर चुनाव लड़ना। दूसरा, पप्पू भरतौल को फिर से मौका देकर उनकी पुरानी राजनीतिक पहचान, जनसंपर्क और समर्थकों की सक्रियता को चुनावी ताकत में बदलने की कोशिश करना।
पप्पू भरतौल के समर्थकों की दलील साफ है—जब विपक्ष की ओर से धर्मेंद्र कश्यप जैसे प्रभावशाली नेता की राजनीतिक ताकत जुड़ने की संभावना है, तो भाजपा को भी मुकाबले के अनुरूप चेहरा उतारना चाहिए। उनके मुताबिक, पप्पू भरतौल इस भूमिका में फिट बैठते हैं।
हालांकि, भाजपा ने अभी तक बिथरी चैनपुर के लिए किसी उम्मीदवार के नाम पर अंतिम फैसला घोषित नहीं किया है। लेकिन 2027 की चुनावी बिसात पर धर्मेंद्र कश्यप की नई भूमिका, कीर्ति कश्यप की दावेदारी और राघवेंद्र शर्मा के कार्यकाल को लेकर उठ रहे सवालों ने पप्पू भरतौल को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। अब देखना होगा कि भाजपा पुराने चेहरे की मांग को कितना महत्व देती है और बिथरी के बदलते समीकरणों में किसे अपना उम्मीदवार बनाती है।




