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पुराने कद और नए चेहरे की जुगलबंदी, वीरपाल-महिपाल का साथ, तीन सीटों पर असर डाल सकती है बिथरी से डॉक्टर देवेंद्र यादव की उम्मीदवारी, जानिये कैसे

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नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली जिले की बिथरी चैनपुर विधानसभा सीट इस बार सिर्फ एक चुनावी मैदान नहीं, बल्कि बदलती सियासत का प्रतीक बन गई है। इस सीट को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता वीरपाल सिंह यादव के बेटे डॉक्टर देवेंद्र यादव की संभावित उम्मीदवारी को लेकर है। पहली बार चुनावी राजनीति में कदम रख रहे देवेंद्र यादव ने जिस तरह से अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है, उसने इस सीट को जिले की सबसे “हॉट सीट” बना दिया है।

वीरपाल सिंह यादव

डॉक्टर देवेंद्र यादव का प्रोफाइल पारंपरिक नेताओं से अलग है। वह एमबीबीएस की डिग्री हासिल कर चुके हैं और जल्द ही मेडिकल में पीजी भी पूरा करने वाले हैं। आज की राजनीति में जहां अक्सर बाहुबल और विवाद हावी रहते हैं, वहां एक पढ़ा-लिखा, शांत और सरल स्वभाव का चेहरा लोगों को आकर्षित कर रहा है। यही वजह है कि वह राजनीति में नए होने के बावजूद तेजी से चर्चा के केंद्र में आ गए हैं।
लेकिन देवेंद्र यादव की ताकत सिर्फ उनकी व्यक्तिगत छवि तक सीमित नहीं है। उनके पीछे एक मजबूत राजनीतिक विरासत खड़ी है। उनके पिता वीरपाल सिंह यादव बरेली में समाजवादी राजनीति के पितामह माने जाते हैं। करीब ढाई दशक तक उन्होंने पार्टी संगठन को बतौर जिला अध्यक्ष खड़ा किया और सैकड़ों कार्यकर्ताओं को तैयार किया। बरेली में समाजवादी पार्टी की जड़ें जितनी मजबूत दिखती हैं, उसमें वीरपाल सिंह का बड़ा योगदान माना जाता है। भूतपूर्व महानगर अध्यक्ष डॉ. मोहम्मद खालिद, पूर्व जिला अध्यक्ष शुभलेश यादव, ब्रह्मस्वरूप सागर, फहीम साबिर, पूर्व ब्लॉक प्रमुख आदेश यादव गुड्डू, पूर्व ब्लॉक प्रमुख डॉ. जीराज सिंह यादव, मलखान सिंह यादव जैसे न जाने कितने नेता वीरपाल सिंह यादव की सियासी पाठशाला से ही निकले हैं।

महिपाल सिंह यादव

दूसरी ओर, देवेंद्र यादव के ससुर और आंवला विधानसभा सीट से पूर्व विधायक महिपाल सिंह यादव भी अपने क्षेत्र में एक मजबूत राजनीतिक पहचान रखते हैं। आंवला, फरीदपुर, बिथरी और आसपास के इलाकों में उनका प्रभाव आज भी कायम है। इस तरह देवेंद्र यादव के पास दो मजबूत सियासी स्तंभों का समर्थन है, जो उन्हें अन्य दावेदारों से अलग और मजबूत बनाता है।
बिथरी चैनपुर, आंवला और फरीदपुर—इन तीनों विधानसभा सीटों पर यादव मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं। इसके अलावा मीरंगज, नवाबगंज, बहेड़ी, भोजीपुरा विधानसभा सीट पर भी यादव मतदाताओं की अच्छी-खासी संख्या बताई जाती है। कुछ यादव मतदाता बरेली कैंट और शहर विधानसभा सीट पर भी हैं। और बरेली में वीरपाल सिंह यादव एवं महिपाल सिंह यादव से बड़ा यादव नेता फिलहाल कोई अन्य नहीं है। यह सामाजिक समीकरण समाजवादी पार्टी के लिए हमेशा से अहम रहा है। इसी वोट बैंक के सहारे वीरपाल यादव ने एक दौर में जिले की नौ में सात सीटें जीतने का रिकॉर्ड भी अपने नाम दर्ज कराया था। वीरपाल सिंह के जिला अध्यक्ष पद से हटने के बाद समाजवादी पार्टी कभी जीरो पर सिमट गई तो कभी दो सीटों पर। ऐसे में इस यादव परिवार के दबदबे का अंदाजा खुद-ब-खुद लगाया जा सकता है। ऐसे में अगर देवेंद्र यादव को टिकट मिलता है, तो यह सिर्फ एक सीट की लड़ाई नहीं होगी, बल्कि तीन सीटों पर असर डालने वाली रणनीति बन सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम सपा के लिए “मल्टी-लेयर” फायदा देने वाला हो सकता है।
दिलचस्प बात यह है कि देवेंद्र यादव ने अपनी सियासी जमीन तैयार करने में जल्दबाजी नहीं की। पिछले लगभग तीन साल से वह लगातार बिथरी चैनपुर क्षेत्र में सक्रिय हैं। गांव-गांव जाकर लोगों से मिलना, उनकी समस्याएं समझना और उन्हें हल कराने की कोशिश करना, यह उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है। वह रोजाना कई गांवों में जाकर लोगों से सीधे संवाद करते हैं। यही वजह है कि क्षेत्र में उनकी पहचान सिर्फ “नेता के बेटे” के रूप में नहीं, बल्कि “अपना आदमी” के तौर पर बनने लगी है।

उनकी पत्नी कंचन यादव का जिला पंचायत सदस्य होना भी उनके लिए एक बड़ा प्लस पॉइंट साबित हुआ है। स्थानीय चुनावों के दौरान देवेंद्र यादव ने जिस तरह सक्रिय भूमिका निभाई, उससे उन्हें जमीनी राजनीति की बारीकियां समझने का मौका मिला। इससे उनका नेटवर्क भी मजबूत हुआ और जनता से सीधा जुड़ाव भी बढ़ा।
वीरपाल सिंह यादव ने भी अपने बेटे को लेकर एक अलग रणनीति अपनाई। उन्होंने शुरुआत से ही देवेंद्र को राजनीति से दूर रखते हुए पढ़ाई पर ध्यान देने को कहा। उनका मानना रहा कि आज के दौर में पढ़ा-लिखा और समझदार नेतृत्व ही समाज को सही दिशा दे सकता है। अब जब देवेंद्र यादव शिक्षा पूरी कर चुके हैं और सामाजिक तौर पर भी सक्रिय हैं, तो वीरपाल सिंह चाहते हैं कि उन्हें राजनीति में आगे बढ़ाया जाए।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि अंतिम फैसला अखिलेश यादव का होगा, और पार्टी जिसे भी उम्मीदवार बनाएगी, वह उसे जिताने के लिए पूरी ताकत लगाएंगे। यह बयान यह भी दिखाता है कि सपा संगठन इस सीट को लेकर पूरी गंभीरता से रणनीति बना रहा है।
बिथरी चैनपुर की राजनीति का एक और महत्वपूर्ण पहलू है यहां का बदलता मतदाता रुझान। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने डॉक्टर राघवेंद्र शर्मा को उम्मीदवार बनाकर एक नया प्रयोग किया था। यह कदम सफल भी रहा, क्योंकि जनता ने पारंपरिक दबंग छवि वाले नेताओं को पीछे छोड़ते हुए एक शिक्षित और सरल उम्मीदवार को चुना। इससे यह साफ संकेत मिला कि अब मतदाता “साफ छवि” और “शिक्षित नेतृत्व” को प्राथमिकता देने लगे हैं। जबकि एक दौर था जब बिथरी की राजनीति में तमंचा और पिस्तौल का बोलबाला हुआ करता था। अब यह ट्रेंड बदलने लगा है।
इसी बदले हुए माहौल में देवेंद्र यादव की एंट्री को देखा जा रहा है। उनकी छवि एक ऐसे युवा नेता की बन रही है, जो न सिर्फ पढ़ा-लिखा है, बल्कि जमीनी स्तर पर भी सक्रिय है। वह विवादों से दूर रहते हैं और संवाद की राजनीति पर भरोसा करते हैं। यही वजह है कि बिथरी चैनपुर में अन्य दावेदारों की तुलना में वह तेजी से आगे निकलते दिख रहे हैं।
हालांकि, उनके सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। पहली चुनौती टिकट हासिल करने की है, क्योंकि सपा में इस सीट पर कई दावेदार हैं। दूसरी चुनौती यह होगी कि अगर उन्हें टिकट मिलता है, तो वह अपने परिवार की विरासत को वोट में कितनी प्रभावी तरीके से बदल पाते हैं।
फिलहाल, बिथरी चैनपुर की सियासत एक नए मोड़ पर खड़ी है। यहां अब सिर्फ जातीय समीकरण या पारंपरिक राजनीति ही नहीं, बल्कि “नई सोच बनाम पुरानी शैली” की भी लड़ाई देखने को मिल सकती है। अगर डॉक्टर देवेंद्र यादव को मौका मिलता है और वह अपनी छवि व जनसंपर्क को वोट में बदलने में सफल रहते हैं, तो यह न सिर्फ उनकी व्यक्तिगत जीत होगी, बल्कि बरेली की राजनीति में एक नई दिशा का संकेत भी होगा। साफ है कि इस बार बिथरी चैनपुर सीट पर मुकाबला सिर्फ उम्मीदवारों के बीच नहीं, बल्कि बदलती राजनीति और नई उम्मीदों के बीच होगा।

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