विचार

प्रज्ञा यादव की कविताएं – 6

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एहसास…

थाम कर बादलों का काफिला
मन हुआ छुप जाऊं मैं उनके तले
देख लूंगा ओट से उस चांद को
मखमली सी चांदनी बिखेरते
कहते हो तुम लुकाछिपी क्या खेल है ?
शोभता है क्या तुम्हें ये खेलना
मिलो जीवन के यथार्थ से
समझो क्या है जगत की वेदना
सुनो ! बात तुमने है कही सही
ख्वाब का आंचल पकड़ करके हमें
जिंदगी को न कभी है तोलना
खुद के ख्वाबों में कभी करनी नहीं
परिजनों के सुख-दुख की अवहेलना
पर तुम ही कहो ये भी कोई बात है?
स्वप्न देखा है जिसने नहीं
कल्पना की उड़ान पर जो न उड़ा
दूसरों का दर्द समझेगा क्या भला ?
जिसके मन-मस्तिष्क से मर गई संवेदना !
सो निर्भय हो के ऊंचे तुम उड़ो
सपनों की चांदनी को तुम चखो
पर लौटना तो, पांव धरातल पर हों खड़े
है करना अब हम सबको यही जतन
जीवन में कैसे हो इनका संतुलन.

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