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बुझे हुए चिरागों से रोशन नहीं होगी सपा, फरीदपुर विधानसभा सीट पर हार की हैट्रिक लगा चुके विजयपाल से यादव नाराज, सत्ता में आने पर पुलिस वालों को पेशाब पिलाने की धमकी अब तक नहीं भूले हैं पुलिसकर्मी, जानिये इस बार उम्मीदवार बदलने की तैयारी क्यों कर रही है समाजवादी पार्टी?

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नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली की फरीदपुर विधानसभा सीट पर समाजवादी पार्टी इस बार बड़ा फैसला लेने के मूड में दिखाई दे रही है। तीन बार लगातार हार का बोझ ढो रहे विजयपाल सिंह के चेहरे पर दांव लगाना पार्टी को अब भारी पड़ता नजर आ रहा है। यही वजह है कि पार्टी के अंदरखाने में साफ-साफ चर्चा शुरू हो चुकी है कि अगर इस सीट को जीतना है, तो “बुझे हुए चिराग” से उम्मीद छोड़नी ही पड़ेगी। फरीदपुर में सपा के पूर्व प्रत्याशी विजयपाल सिंह की हार की कहानी सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें नाराजगी, पुराने विवाद और खराब छवि जैसे कई पहलू जुड़े हुए हैं।
फरीदपुर विधानसभा सीट बरेली जिले की अहम सीटों में गिनी जाती है। लेकिन पिछले दो चुनावों में यह सीट सपा के हाथ से फिसलती रही है। वर्ष 2017 में डॉक्टर सियाराम सागर तो 2022 में विजयपाल सिंह को यहां से बतौर सपा उम्मीदवार हार मिली। 2022 की हार के पीछे सबसे बड़ा कारण जिस चेहरे को माना जा रहा है, वह है विजयपाल सिंह। विजयपाल सिंह का राजनीतिक रिकॉर्ड देखें तो साफ हो जाता है कि उनके नाम पर लगातार हार जुड़ती चली गई है। वह दो बार बसपा के टिकट पर और एक बार समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव हार चुके हैं। यानी उनकी हार की हैट्रिक पूरी हो चुकी है। उनके खाते में सिर्फ एक जीत है, जो 2007 में बसपा की लहर के दौरान आई थी। यानी यह जीत भी उनकी व्यक्तिगत पकड़ से ज्यादा उस समय की राजनीतिक हवा का नतीजा मानी जाती है।
2012 का चुनाव विजयपाल के लिए बड़ा झटका साबित हुआ था। उस चुनाव में सपा के डॉक्टर सियाराम सागर ने उन्हें करारी शिकस्त दी थी। हालत यह हो गई थी कि विजयपाल तीसरे नंबर पर खिसक गए थे। दूसरे स्थान पर भाजपा के श्याम बिहारी लाल रहे। इसके बाद 2017 का चुनाव आया, तब भी तस्वीर ज्यादा नहीं बदली। भाजपा के श्याम बिहारी लाल ने जीत हासिल की, जबकि विजयपाल फिर तीसरे स्थान पर ही रह गए। सपा के उम्मीदवार डॉक्टर सियाराम सागर दूसरे स्थान पर रहे। यानी साफ था कि फरीदपुर की जनता विजयपाल को स्वीकार करने के मूड में नहीं थी। दिलचस्प बात यह है कि विजयपाल सिंह की हार का अंतर उक्त दो चुनावों में चुनाव दर चुनाव कम होने की जगह बढ़ता ही रहा। 2012 में जहां विजयपाल सिंह चुनाव जीतने वाले सियाराम सागर से लगभग 25 हजार वोटों से पीछे रहे तो वहीं 2017 के विधानसभा चुनाव में वह विधायक बनने वाले भाजपा उम्मीदवार श्याम बिहारी लाल से लगभग 45 हजार वोटों से पीछे रहे। दिलचस्प बात यह है कि इस चुनाव में दूसरे नंबर पर रहने वाले सपा उम्मीदवार सियाराम सागर से भी वह लगभग 21 हजार वोटों से पीछे रहे थे।
2022 का चुनाव सपा के लिए एक मौका लेकर आया था। डॉक्टर सियाराम सागर के निधन के बाद विजयपाल सिंह ने बसपा छोड़कर सपा का दामन थाम लिया और पार्टी ने उन्हें टिकट भी दे दिया। उस समय यह माना जा रहा था कि सपा इस सीट को आसानी से जीत सकती है, लेकिन नतीजा इसके उलट निकला। सपा महज 2900 वोटों से यह सीट हार गई। इस हार के पीछे सबसे बड़ी वजह यादव समाज की नाराजगी मानी गई।
बताया जाता है कि बसपा सरकार के दौरान विजयपाल सिंह पर आरोप लगे थे कि उन्होंने फरीदपुर के यादव समाज के लोगों के खिलाफ बड़ी संख्या में झूठे मुकदमे दर्ज करवाए थे। यही वजह है कि यादव वोट बैंक, जो सपा की सबसे बड़ी ताकत माना जाता है, विजयपाल से दूरी बनाकर बैठ गया। चुनाव में इसका सीधा असर देखने को मिला और सपा को हार का सामना करना पड़ा। अब हालात यह हैं कि यादव समाज की नाराजगी खत्म होने के बजाय और बढ़ती जा रही है। हाल ही में यादव समाज के प्रबुद्ध लोगों की कई बैठकें हो चुकी हैं, जिनमें खुलकर विजयपाल के विरोध की रणनीति बनाई जा रही है। खबर है कि आने वाले दिनों में नुक्कड़ बैठकों के जरिए इस विरोध को और तेज किया जाएगा। इतना ही नहीं, यादव समाज का एक प्रतिनिधिमंडल सपा प्रमुख अखिलेश यादव से मिलकर साफ-साफ मांग करने की तैयारी में है कि इस बार विजयपाल सिंह को टिकट न दिया जाए।
विजयपाल के खिलाफ सिर्फ सामाजिक नाराजगी ही नहीं, बल्कि उनकी छवि भी बड़ा मुद्दा बन चुकी है। पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान उनका एक वीडियो खूब वायरल हुआ था, जिसमें वह पुलिसकर्मियों को “पेशाब पिलाने” जैसी धमकी देते नजर आए थे। दरअसल उनकी पत्नी सुनीता ब्लॉक प्रमुख पद का चुनाव हार गई थीं। इसी दौरान उनकी पुलिसकर्मियों से बहस हो गई और वह कहते नजर आए, “जब हमारी सरकार थी तो तुम लोगों को पेशाब पिलाया करते थे, आगे भी सरकार आने दो फिर बताएंगे।” इस बयान ने न सिर्फ आम लोगों को चौंकाया, बल्कि पुलिस विभाग में भी गहरी नाराजगी पैदा कर दी थी। बताया जा रहा है कि पुलिसकर्मी इस बयान को अभी तक भूले नहीं हैं और अंदर ही अंदर इसका विरोध बना हुआ है। समाजवादी पार्टी को वैसे भी भाजपा नेता गुंडों की पार्टी बताते रहते हैं। ऐसे में अगर विजयपाल सिंह को सपा अबकी बार भी टिकट देती है तो भाजपा इस मुद्दे को पूरे चुनाव भुनाएगी और सपा अपनी जिस छवि को सुधारने की कोशिश में जुटी है विजयपाल की वही छवि उसके गले की फांस बन जाएगी।
अगर चुनाव में पुलिसकर्मियों और उनके परिवारों की नाराजगी भी जुड़ जाती है, तो यह सपा के लिए बड़ा नुकसान साबित हो सकता है। क्योंकि चुनाव सिर्फ जातीय समीकरणों से नहीं, बल्कि माहौल और छवि से भी प्रभावित होते हैं। ऐसे में विजयपाल सिंह की विवादित छवि पार्टी के लिए एक बड़ी बाधा बनती जा रही है। बताया जाता है कि पार्टी सुप्रीमो अखिलेश यादव तक भी यह मामला पहुंच चुका है और वह इस बार विजयपाल सिंह की उम्मीदवारी के पक्ष में नहीं हैं। इसलिए उनकी पहली प्राथमिकता डॉक्टर सियाराम सागर के परिवार को बताया जा रहा है।
विजयपाल के खिलाफ बढ़ते विरोध का अंदाजा एक और घटना से लगाया जा सकता है। कुछ महीने पहले उनके एक कार्यक्रम में खाने-पीने की पूरी व्यवस्था की गई थी, लेकिन भोजन के नाम पर भी उम्मीद के अनुरूप भीड़ नहीं जुट पाई और कई कुर्सियां खाली रह गईं। ये खाली कुर्सियां सिर्फ एक कार्यक्रम की नाकामी नहीं थीं, बल्कि यह संकेत थीं कि जनता का एक बड़ा वर्ग उनसे दूरी बना चुका है जिसमें उनका अपना जाटव समाज भी शामिल है।
अब सवाल यह है कि क्या सपा इस बार जोखिम उठाएगी या फिर नया चेहरा मैदान में उतारेगी? पार्टी के सामने साफ चुनौती है- अगर जीत चाहिए, तो समीकरण बदलने होंगे। सिर्फ पुराने चेहरे के भरोसे चुनाव लड़ना अब आसान नहीं है। खासकर तब, जब वही चेहरा लगातार हार का कारण बनता रहा हो।
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि फरीदपुर सीट पर सपा के लिए उम्मीदवार बदलना ही सबसे सुरक्षित विकल्प हो सकता है। क्योंकि यहां मुकाबला कड़ा है और छोटी-सी चूक भी हार में बदल सकती है। इसकी एक वजह यह भी है कि वर्ष 2022 में यहां से चुनाव जीतकर विधायक बनने वाले श्याम बिहारी लाल का भी निधन हो चुका है और भाजपा अपने विधायक के निधन के बाद उपजी सहानुभूति को वोटों में बदलने का प्रयास कर रही है। अगर समाजवादी पार्टी यादव वोट बैंक को फिर से अपने पक्ष में करना चाहती है, तो उसे उनकी नाराजगी दूर करनी होगी और इसके लिए उम्मीदवार बदलना जरूरी कदम हो सकता है।
कुल मिलाकर, फरीदपुर की राजनीति इस बार दिलचस्प मोड़ पर खड़ी है। एक तरफ सपा के सामने पुराना चेहरा है, तो दूसरी तरफ जीत की जरूरत। ऐसे में पार्टी क्या फैसला लेती है, यह आने वाले दिनों में साफ हो जाएगा। लेकिन इतना तय है कि अगर सपा ने समय रहते सही फैसला नहीं लिया, तो “बुझे हुए चिराग” के भरोसे यह सीट फिर हाथ से निकल सकती है।

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