झारखण्ड

किसान पिता ने काफी कष्ट सहकर बनाया रेलवे अधिकारी

बोकारो थर्मल। कुमार अभिनंदन
बेरमो अनुमंडल अतंगर्त नावाडीह प्रंखड। ऐसे तो यह प्रखंड पलायन व उग्रवाद के लिए जाना जाता है, लेकिन रंजन प्रसाद महतो ने यही की माटी पर भरोसा करते हुए बमुश्किल परिस्थितियों में किसानी कर अपने बेटे को रेलवे अधिकारी बनाया। रंजन प्रसाद महतो ने बताया कि 80 के दशक में हर झंझावतों को झलते हुए नावाडीह के स्कूलों में पढ़ाया। हर एक वक्त का पेट काटकर उसे तालिम दिलायी। उस समय खेती के साधन भर के लिए हल और बैल ही रहा करता था। उसी के सहारे घर भी चलाना पड़ता था और बच्चों की पढ़ाई भी। 2008 को जब को मेरे बेटा का लखनउ (गोरखपुर) रेलवे से ज्वानिंग पत्र आया था। पत्र जब पढ़े तो हमदोनों पति-पत्नि की आखों से खूशी से आंसू टपक गए थे। 25 अगस्त 2008 को योगेश कुमार ने बतौर सहायक पर्यवेक्षक के पद पर पदास्थापित हुए। आज रांची जोन में एरिया आॅफिसर पद पर कार्यरत है। योगेश कुमार कहते है कि रविवार को फादर्स डे है। कोरोना ड्यूटी को लेकर बहुत मिस करूंगा। हर साल फादर्स डे पर घर पर पिता और मां के साथ रहता था। उसने कहा कि मेरे लिए सबकुछ पिता जी है। मेरे आदर्श है। कोरोना काल को लेकर विशेष रूप से मुझे डिपूट किया गया है। रांची से जाने वाली झारखंड व बिहार की हर श्रमिक टेन मेरी निगरानी में जांतोपंरात यहां से खुलती है। खेती के बारें में कहते है कि जब भी मुझे गांव में रहने का मौका मिलता है। सुबह-शाम खेत को निहारने जरूर जाता हुॅ। तब जाकर मन में सुकून मिलती है।


रंजन प्रसाद महतो के दो बेटे और एक बेटी है. बडा बेटा योगेश कुमार रेलवे में एरिया पदाधिकारी, बेटी मीना कुमारी शिक्षिका है और छोटा बेटा शेखर रंजन रेलवे में ही पेट्रीकार मैनेजर है। आज भी इस परिवार के लोग पूरी लगन से खेती करते आ रहें है। अपने जमाने में रंजन महतो खूद स्कूल के टाॅपर रहा करते थे। आर्थिक तंगी के बावजूद मैट्रीक तक पढ़ाई किए थे।

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