नीरज सिसौदिया, बरेली
कहते हैं कि राजनीति में जीत का अंतर हमेशा बड़ा नहीं होता, लेकिन उसका असर बहुत बड़ा होता है। कई बार कुछ सौ या हजार वोट पूरे समीकरण को बदल देते हैं और वही नेता बाजी मार लेता है, जो इन बारीकियों को समय रहते समझ ले। फरीदपुर विधानसभा सीट की राजनीति भी कुछ ऐसी ही है, जहां छोटे-छोटे सामाजिक समूह मिलकर बड़ा राजनीतिक असर पैदा करते हैं। यही कारण है कि समाजवादी पार्टी के संभावित प्रत्याशी और बाबा साहब अंबेडकर वाहिनी के राष्ट्रीय सचिव चंद्रसेन सागर इन दिनों अपनी रणनीति को नए सिरे से गढ़ते नजर आ रहे हैं।
चंद्रसेन सागर की राजनीति का केंद्र अब बड़े जातीय समीकरणों के साथ ही उन छोटी-छोटी जातियों की ओर भी शिफ्ट होता दिख रहा है, जिन्हें अक्सर मुख्यधारा की राजनीति में नजरअंदाज कर दिया जाता है। लेकिन सागर इस बात को भली-भांति समझते हैं कि फरीदपुर जैसी सीटों पर यही छोटे समूह चुनावी जीत-हार का फैसला करते हैं। यही वजह है कि उन्होंने इन वर्गों के बीच जाकर सीधे संवाद स्थापित करने का अभियान शुरू कर दिया है।
दरअसल, वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव ने समाजवादी पार्टी और खासतौर पर चंद्रसेन सागर जैसे नेताओं को एक बड़ा सबक दिया। उस चुनाव में पार्टी को महज 2921 वोटों के अंतर से हार का सामना करना पड़ा था। चुनावी विश्लेषण में यह बात सामने आई कि जिन छोटी जातियों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया, अगर उनके वोट एकजुट हो जाते तो नतीजा बिल्कुल अलग हो सकता था। यही वह बिंदु है, जहां से चंद्रसेन सागर की नई राजनीतिक रणनीति की शुरुआत होती है।
फरीदपुर विधानसभा क्षेत्र में गूजर, मुरांव, नट, कंजर समेत करीब 15 से 20 ऐसी जातियां हैं, जिनकी संख्या अलग-अलग गांवों में कम जरूर है, लेकिन कुल मिलाकर उनका वोट बैंक 8 से 10 हजार तक पहुंच जाता है। इनमें कुछ जातियों के 4000-5000 वोट हैं तो कुछ के दो सौ से पांच सौ वोट भी हैं। यह संख्या किसी भी करीबी मुकाबले में निर्णायक भूमिका निभा सकती है। चंद्रसेन सागर इस गणित को समझते हैं और इसी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने अपने जनसंपर्क अभियान की दिशा तय की है।
उनका यह अभियान सिर्फ औपचारिक मुलाकातों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह गांव-गांव, घर-घर जाकर लोगों से संवाद स्थापित कर रहे हैं। शनिवार को उन्होंने तिराहा, गौसगंज तराई, गोपालपुर और हृदयपुर गांवों का दौरा किया। उनके लगातार दौरे इस बात का संकेत हैं कि वह इस बार कोई चूक नहीं करना चाहते। खास बात यह है कि समाजवादी पार्टी के अन्य दावेदारों के मुकाबले सागर का यह प्रयास उन्हें अलग पहचान दिला रहा है।
पूर्व ब्लॉक प्रमुख चंद्रसेन सागर की सबसे बड़ी ताकत उनका जमीनी अनुभव है। करीब चार दशक के राजनीतिक जीवन में उन्होंने क्षेत्र के हर वर्ग के साथ काम किया है और हर मोहल्ले, हर गांव की सामाजिक संरचना को नजदीक से समझा है। यही वजह है कि वह जानते हैं कि कौन सा वर्ग किस मुद्दे से प्रभावित होता है और किस तरह उसे राजनीतिक रूप से जोड़ा जा सकता है।

उनकी रणनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि वह सिर्फ वोट मांगने नहीं जा रहे, बल्कि लोगों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जोड़ने का प्रयास भी कर रहे हैं। उन्होंने इन छोटी जातियों के लोगों के वोट बनवाने में भी सक्रिय भूमिका निभाई है। अब जब अंतिम मतदाता सूची जारी हो चुकी है, तो वह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि कोई भी पात्र व्यक्ति मतदान से वंचित न रहे।
यह पहल सिर्फ राजनीतिक लाभ तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका एक सामाजिक संदेश भी है। अक्सर छोटी जातियों के लोग खुद को राजनीतिक रूप से उपेक्षित महसूस करते हैं। ऐसे में जब कोई नेता उनके घर तक पहुंचता है, उनकी समस्याएं सुनता है और उन्हें महत्व देता है, तो एक भरोसा बनता है। यही भरोसा चुनाव के समय वोट में बदल सकता है।
फरीदपुर की राजनीति में यह पहली बार नहीं है कि छोटे वोट बैंक निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं, लेकिन इस बार जिस तरह से चंद्रसेन सागर ने इसे अपनी रणनीति का केंद्र बनाया है, वह खास है। यह एक तरह से पारंपरिक राजनीति से हटकर माइक्रो-मैनेजमेंट की ओर बढ़ने का संकेत भी है, जहां हर वोट की कीमत समझी जाती है।

सागर का यह अभियान यह भी दिखाता है कि वह चुनाव को सिर्फ एक राजनीतिक मुकाबले के रूप में नहीं देख रहे, बल्कि इसे सामाजिक जुड़ाव के अवसर के रूप में भी ले रहे हैं। वह इन समुदायों के बीच जाकर उनके मुद्दों को समझने और उन्हें अपने एजेंडे में शामिल करने की कोशिश कर रहे हैं। इससे न केवल उनकी राजनीतिक पकड़ मजबूत हो रही है, बल्कि क्षेत्र में उनकी एक अलग छवि भी बन रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर चंद्रसेन सागर अपनी इस रणनीति को प्रभावी ढंग से लागू कर पाते हैं, तो यह फरीदपुर सीट के समीकरण को पूरी तरह बदल सकती है। खासतौर पर तब, जब मुकाबला कड़ा हो और हर वोट की अहमियत बढ़ जाती हो। ऐसे में 8 से 10 हजार वोटों का यह समूह किसी भी उम्मीदवार के लिए गेम चेंजर साबित हो सकता है।
हालांकि, यह राह आसान नहीं है। छोटी जातियों को एकजुट करना और उनका विश्वास जीतना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। इसके लिए लगातार संवाद, भरोसा और जमीनी काम की जरूरत होती है। लेकिन चंद्रसेन सागर के अब तक के प्रयास यह संकेत देते हैं कि वह इस चुनौती को गंभीरता से ले रहे हैं।
आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि उनकी यह रणनीति कितना असर डालती है और क्या वह इन छोटे-छोटे वोट समूहों को एक मजबूत राजनीतिक ताकत में बदल पाते हैं। अगर ऐसा होता है, तो यह न सिर्फ उनकी व्यक्तिगत जीत होगी, बल्कि फरीदपुर की राजनीति में एक नया ट्रेंड भी स्थापित कर सकता है।

कुल मिलाकर, फरीदपुर विधानसभा सीट पर इस बार का चुनाव सिर्फ बड़े चेहरों या बड़ी जातियों के बीच का मुकाबला नहीं होगा, बल्कि यह उन छोटे-छोटे सामाजिक समूहों की भूमिका को भी परिभाषित करेगा, जिन्हें अब तक नजरअंदाज किया जाता रहा है। और चंद्रसेन सागर इस बदलाव के केंद्र में खुद को स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं।





