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फरीदपुर : आपस में ही लड़ रहे समाजवादी यादव, सपा के बरेली जिला अध्यक्ष शुभलेश यादव के भाई सुधीर यादव ने भरी मीटिंग से लोहिया वाहिनी के निवर्तमान विधानसभा अध्यक्ष रवींद्र यादव को भगाया, महिपाल सिंह का समर्थक होने की मिली सजा, पढ़ें क्या है पूरा मामला?

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नीरज सिसौदिया, बरेली

पुरानी कहावत है कि “जब सैंया भए कोतवाल तो फिर डर काहे का”। बरेली जिले की फरीदपुर विधानसभा सीट पर इन दिनों समाजवादी पार्टी के भीतर जो घटनाक्रम सामने आ रहा है, वह इस कहावत को चरितार्थ करता नजर आ रहा है। जिस संगठनात्मक बदलाव से कार्यकर्ताओं को उम्मीद थी कि पार्टी में नए जोश का संचार होगा और लंबे समय से उपेक्षित नेताओं व कार्यकर्ताओं को सम्मान मिलेगा, वहीं अब उसी बदलाव के बाद संगठन के भीतर टकराव, गुटबाजी और सार्वजनिक अपमान के आरोप सामने आने लगे हैं। सबसे अधिक चर्चा उस घटना की है, जिसमें समाजवादी पार्टी के बरेली जिला अध्यक्ष शुभलेश यादव के भाई और पूर्व विधानसभा प्रत्याशी विजयपाल सिंह के करीबी माने जाने वाले सुधीर यादव पर आरोप है कि उन्होंने समाजवादी लोहिया वाहिनी के निवर्तमान विधानसभा अध्यक्ष रवींद्र यादव को भरी बैठक में अपमानित कर बाहर जाने के लिए कह दिया। इसके बाद मामला संगठन की चारदीवारी से निकलकर सोशल मीडिया और कार्यकर्ताओं के बीच खुली बहस का विषय बन गया।

फरीदपुर विधानसभा क्षेत्र में पहले से ही पूर्व प्रत्याशी विजयपाल सिंह को लेकर कार्यकर्ताओं के एक वर्ग में असंतोष की चर्चा होती रही है। ऐसे में जिला अध्यक्ष पद पर शुभलेश यादव की ताजपोशी के बाद यह उम्मीद जताई जा रही थी कि संगठन में यादव समाज के कार्यकर्ताओं को सम्मान मिलेगा और पुराने विवाद खत्म होंगे। लेकिन घटनाक्रम इसके बिल्कुल उलट दिशा में जाता दिखाई दे रहा है। अब स्थिति यह है कि यादव बिरादरी के नेता और कार्यकर्ता ही आमने-सामने खड़े नजर आ रहे हैं। जिस संगठन को आगामी विधानसभा चुनाव से पहले बूथ स्तर तक मजबूत करने की कवायद चल रही है, उसी संगठन की बैठकों में विवाद खड़ा होना पार्टी के लिए चिंता का विषय माना जा रहा है।

पूरा विवाद ग्राम खजुरिया सम्पत में आयोजित बूथ कमेटी की बैठक से शुरू हुआ। जानकारी के अनुसार यहां समाजवादी पार्टी की ओर से बूथ कमेटियों को सक्रिय करने और आगामी चुनावी रणनीति तैयार करने के उद्देश्य से बैठक आयोजित की गई थी। बैठक में विभिन्न गांवों के कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों को बुलाया गया था। आरोप है कि समाजवादी लोहिया वाहिनी के निवर्तमान विधानसभा अध्यक्ष रवींद्र यादव निर्धारित समय से लगभग आधा घंटा देर से पहुंचे। इसी बात को लेकर सुधीर यादव नाराज हो गए और उन्होंने बैठक में मौजूद लोगों के सामने रवींद्र यादव को फटकार लगाते हुए बैठक से बाहर जाने के लिए कह दिया। इतना ही नहीं, समर्थकों का आरोप है कि उन्हें जोन अथवा सेक्टर प्रभारी की जिम्मेदारी से भी हटा दिया गया।

बताया जाता है कि रवींद्र यादव फरीदपुर विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले ग्राम अंधरपुरा के निवासी हैं और उन्हें संगठन की ओर से एक जोन की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। बैठक में हुई घटना के बाद उन्होंने अपनी नाराजगी छिपाने के बजाय खुलकर सामने रखी। समाजवादी विचारधारा फरीदपुर ब्लॉक नामक व्हाट्सएप ग्रुप पर उन्होंने लिखा कि केवल आधा घंटा देरी से पहुंचने के कारण उन्हें जोन प्रभारी के पद से हटा दिया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि यह कार्रवाई सुधीर यादव द्वारा की गई है। साथ ही उन्होंने यह भी लिख दिया कि अब वह अपनी पूरी टीम को बैठक में नहीं जाने देंगे। रवींद्र यादव की इस पोस्ट ने पूरे संगठन में हलचल मचा दी और देखते ही देखते मामला कार्यकर्ताओं के बीच चर्चा का प्रमुख विषय बन गया।

रवींद्र यादव के समर्थकों का कहना है कि संगठन में अनुशासन जरूरी है, लेकिन किसी पदाधिकारी का सार्वजनिक अपमान करना किसी भी हालत में उचित नहीं कहा जा सकता। उनका सवाल है कि यदि कोई कार्यकर्ता या पदाधिकारी देर से पहुंचता है तो उसे कारण बताओ नोटिस दिया जा सकता है या संगठनात्मक प्रक्रिया अपनाई जा सकती है, लेकिन सबके सामने अपमानित कर बैठक से बाहर निकाल देना संगठनात्मक मर्यादा के खिलाफ है। समर्थकों का यह भी आरोप है कि सुधीर यादव ने अपनी सीमा से बाहर जाकर फैसला लिया और उन्हें यह अधिकार किसने दिया कि वे अपनी इच्छा से किसी को हटाकर दूसरे व्यक्ति को जिम्मेदारी सौंप दें।

सूत्रों के अनुसार बैठक में रवींद्र यादव की जगह केसरपुर निवासी रमेश सिंह यादव को प्रभारी घोषित किए जाने की भी चर्चा रही। यही बात विवाद को और गहरा करने वाली साबित हुई। कार्यकर्ताओं के बीच यह सवाल उठने लगा कि क्या संगठन में नियुक्ति और जिम्मेदारियों का निर्धारण तय प्रक्रिया के तहत हो रहा है या फिर व्यक्तिगत पसंद और नापसंद के आधार पर फैसले लिए जा रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने पार्टी के अंदर नेतृत्व शैली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

हालांकि इस विवाद की असली कहानी केवल बैठक में हुई बहस तक सीमित नहीं बताई जा रही। पार्टी से जुड़े सूत्रों का दावा है कि इसके पीछे आगामी जिला पंचायत चुनाव की राजनीति भी अहम भूमिका निभा रही है। बताया जाता है कि समाजवादी पार्टी के जिला अध्यक्ष शुभलेश यादव अपनी पत्नी को जिला पंचायत के वार्ड नंबर 50 से चुनाव लड़ाना चाहते हैं। दूसरी ओर लोहिया वाहिनी के रवींद्र यादव के रिश्तेदार, जिनका नाम भी रवींद्र यादव बताया जा रहा है और जो परातासपुर गांव के निवासी हैं, वे भी इसी वार्ड से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। चूंकि लोहिया वाहिनी के रवींद्र यादव अपने रिश्तेदार के समर्थन में सक्रिय बताए जा रहे हैं, इसलिए दोनों पक्षों के बीच पहले से ही राजनीतिक खींचतान चल रही थी।

सूत्रों का दावा है कि यही राजनीतिक प्रतिस्पर्धा अब संगठनात्मक विवाद के रूप में सामने आ गई है। आरोप लगाया जा रहा है कि इसी नाराजगी के चलते बैठक में रवींद्र यादव के साथ सख्त व्यवहार किया गया। यदि यह आरोप सही साबित होते हैं तो यह मामला केवल अनुशासनात्मक कार्रवाई का नहीं बल्कि व्यक्तिगत और स्थानीय राजनीतिक हितों के टकराव का बन जाता है। यही कारण है कि कार्यकर्ताओं के बीच भी इस विवाद को केवल देर से आने की घटना नहीं बल्कि भविष्य की राजनीतिक रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।

इस पूरे घटनाक्रम का एक और महत्वपूर्ण पहलू जिला पंचायत के संभावित परिसीमन और आरक्षण से जुड़ा बताया जा रहा है। सूत्रों के अनुसार वर्तमान में सुधीर यादव की पत्नी वार्ड नंबर 48 से जिला पंचायत सदस्य हैं। लेकिन यदि यह वार्ड अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हो जाता है तो सुधीर यादव की नजर वार्ड नंबर 52 पर है। यही वार्ड वर्तमान में पूर्व विधायक महिपाल सिंह यादव की पुत्रवधू के पास है। ऐसे में राजनीतिक समीकरण और भी जटिल हो जाते हैं।

रवींद्र यादव को पूर्व विधायक महिपाल सिंह यादव का समर्थक माना जाता है। इसलिए अब यह विवाद केवल सुधीर यादव और रवींद्र यादव के बीच का नहीं रह गया है। राजनीतिक गलियारों में इसे शुभलेश यादव खेमे और महिपाल सिंह यादव खेमे के बीच बढ़ती दूरी के रूप में भी देखा जाने लगा है। महिपाल सिंह यादव का पार्टी संगठन में लंबा अनुभव रहा है और वे पूर्व जिला अध्यक्ष के साथ-साथ वरिष्ठ नेता वीरपाल सिंह के समधी भी हैं। ऐसे में यदि दोनों खेमों के बीच दूरी और बढ़ती है तो इसका असर केवल जिला पंचायत चुनाव तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि विधानसभा चुनाव की तैयारियों पर भी पड़ सकता है।

फरीदपुर विधानसभा सीट समाजवादी पार्टी के लिए हमेशा राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रही है। पार्टी यहां बूथ स्तर तक संगठन मजबूत करने के अभियान में जुटी हुई है। ऐसे समय में यदि बूथ कमेटी की बैठकों से ही विवाद और असंतोष की खबरें बाहर आने लगें तो विपक्ष को भी पार्टी पर सवाल उठाने का मौका मिलेगा। चुनावी राजनीति में संगठन की मजबूती सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है, लेकिन जब संगठन के भीतर ही पदाधिकारी एक-दूसरे के खिलाफ मोर्चा खोल दें तो इसका सीधा असर कार्यकर्ताओं के मनोबल पर पड़ता है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि समाजवादी पार्टी के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती भाजपा से मुकाबला करने की नहीं बल्कि अपने कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच समन्वय बनाए रखने की है। यदि स्थानीय स्तर पर गुटबाजी इसी तरह खुलकर सामने आती रही तो बूथ प्रबंधन से लेकर चुनाव प्रचार तक हर स्तर पर इसका असर दिखाई दे सकता है। पार्टी नेतृत्व को यह समझना होगा कि व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और स्थानीय चुनावी समीकरणों को यदि समय रहते नियंत्रित नहीं किया गया तो विधानसभा चुनाव में इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या संगठन में फैसले तय प्रक्रिया के तहत लिए जा रहे हैं या व्यक्तिगत प्रभाव के आधार पर। यदि किसी पदाधिकारी के खिलाफ कार्रवाई करनी थी तो उसके लिए संगठन के अधिकृत मंच और प्रक्रिया मौजूद है। लेकिन यदि आरोपों के मुताबिक सार्वजनिक रूप से अपमानित कर बाहर का रास्ता दिखाया गया है तो इससे कार्यकर्ताओं के बीच गलत संदेश जाना स्वाभाविक है।

फिलहाल फरीदपुर की राजनीति में यह विवाद चर्चा का सबसे बड़ा विषय बना हुआ है। एक तरफ सुधीर यादव और उनके समर्थक संगठनात्मक अनुशासन की बात कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर रवींद्र यादव और उनके समर्थक इसे राजनीतिक प्रतिशोध और व्यक्तिगत नाराजगी का परिणाम बता रहे हैं। आने वाले दिनों में पार्टी नेतृत्व इस मामले को किस तरह सुलझाता है, इस पर सभी की निगाहें टिकी हैं।

इतना तय है कि यदि समय रहते इस विवाद का समाधान नहीं निकला तो फरीदपुर विधानसभा में समाजवादी पार्टी की सबसे बड़ी ताकत मानी जाने वाली यादव राजनीति ही उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकती है। जिस समय पार्टी को विभिन्न सामाजिक वर्गों को जोड़कर मजबूत चुनावी रणनीति बनानी चाहिए, उसी समय अपने ही नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच बढ़ती खाई भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं मानी जा सकती। अब देखना होगा कि समाजवादी पार्टी का शीर्ष नेतृत्व इस बढ़ते विवाद को केवल स्थानीय असंतोष मानकर छोड़ देता है या फिर हस्तक्षेप कर संगठन में फिर से एकजुटता कायम करने की कोशिश करता है।

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