झारखण्ड

दुर्लभ प्रजाति का एक उल्लू मिला, ग्रामीणों ने इलाज कर जंगल में छोड़ दिया

बोकारो थर्मल। रामचंद्र कुमार अंजाना 
नावाडीह प्रखंड अतंगर्त ऊपरघाट में ठंड की मार इस कदर असर है कि क्या आदमी, क्या जानवर सब ठिठुर रहें है। सोमवार को कंजकिरो पंचायत के पिलपिलो (कटहरडीह) गांव में सफेद मुंह के एक दुर्लभ प्रजाति ऊल्लू घर में घुस गया। ऊल्लू ठंड से ठिठुर रहा था। न सिर्फ देखने में अद्भुत है बल्कि वन विभाग के मुताबिक इससे पहले कभी ऐसे ऊल्लू क्षेत्र में नजर नहीं आए थे। दुर्लभ प्रजाति के एक पिलपिलो गांव के समाजसेवी मोतीलाल महतो के घर ऊल्लू घुसने की सुचना पर पूरे गांव के लोग देखने पहुंच गए। सफेद मुंह वाला ऊल्लू न सिर्फ देखने में अद्भुत है बल्कि वन विभाग के मुताबिक इससे पहले बेरमो में कभी ऐसा ऊल्लू न तो देखा गया है और न ही इसके बारे में सुना गया। वैसे तो ऊल्लू की अधिकांश प्रजाति खत्म होती जा रही है। इससे अब सभी दुर्लभ हो गए हैं, मगर यह सफेद मुंह वाला ऊल्लू काफी दुर्लभ है। सफेद मुंह वाला ऊल्लू बॉर्न ऊल्लू कहलाता है। यह पक्षी मनुष्य को आर्थिक लाभ पहुंचाता है। इसकी वर्ल्ड में क्म् उपप्रजाति है, जिसमें से तीन उप प्रजाति इंडिया में पाई जाती है। यह जंगली कौए की तरह लगता है। पीठ की ओर से गोल्डन और भूरे रंग का होता है। नीचे पेट की तरफ सफेद रंग का होता है। इनका चेहरा मास्क के समान लगता है। ये सूखी जगह, पुराने मकान, घर और खंडहर के साथ पुराने किलों में निवास करते हैं। ये पक्षी पीपल, बरगद, गूलर जैसे बड़े पेड़ों पर खोखले भाग में भी निवास करते हैं। इस ऊल्लू को वल्र्ड में कई नाम से जाना जाता है। कहीं इसे मंकी फेस्ड ऊल्लू कहीं इसे गोल्डेन आउल तो कहीं इसे डेथ आउल और स्कीच ऊल्लू के नाम से जाना जाता है। बॉर्न ऊल्लू फसलों के लिए शुभ माना जाता है, क्योंकि यह चूहे और उन कीटों को अपना भोजन बनाता है, जो फसल के लिए हानिकारक होते हैं। किंग कोबरा के सुप्रीमो श्यामसुंदर महतो ने वन विभाग को सुचित कर यहां पर ऊल्लू का प्राथमिक उपचार करवाया। बेरमो रेंज वन क्षेत्र के रेंजर डीके श्रीवास्तव ने बताया कि ऊल्लू दुर्लभ पक्षी है। एक दुर्लभ प्रजाति के ऊल्लू का गांव में आ जाना चर्चा का विषय बना रहा। ऊल्लू का इलाज के बाद पिलपिलो जंगल में सुरक्षित छोड़ दिया गया।
दीपावाली में बढ़ जाती है डिमांडः आम सीजन में साधारण पक्षी समझे जाने वाले ऊल्लू की डिमांड अचानक दिवाली आते ही बढ़ जाती है। दिवाली में तांत्रिक ऊल्लू की पूजा करते हैं। इससे न सिर्फ इनकी डिमांड बढ़ती है बल्कि इनकी कीमत भी कई गुना बढ़ जाती है। ऊल्लू जितना दुर्लभ प्रजाति का होता है, कीमत भी उतनी अधिक लगती है। इसी कारण दिन बीतने के साथ ऊल्लू की तादाद लगातार कम होती जा रही है। अन्य जानवरों की तरह ऊल्लू भी धीरे-धीरे विलुप्त होने की कगार पर पहुंच रहा है।

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