नीरज सिसौदिया, नई दिल्ली
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अभी कई महीने बाकी हैं, लेकिन विपक्षी खेमे में सत्ता की लड़ाई से पहले साझेदारी की शर्तों को लेकर संघर्ष शुरू होता दिखाई देने लगा है। कांग्रेस के उत्तर प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम का यह कहना कि “कांग्रेस की मदद के बिना अखिलेश यादव कभी मुख्यमंत्री नहीं बन सकते” सपा-कांग्रेस गठबंधन के भीतर बदलते शक्ति-संतुलन का संकेत है। यह बयान ऐसे समय आया है जब दोनों दल 2027 के विधानसभा चुनाव में साथ लड़ने की बात तो कर रहे हैं, लेकिन सीटों का बंटवारा अभी शुरू भी नहीं हुआ है।
दरअसल, कांग्रेस का मौजूदा रुख 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद बदला है। उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में सपा ने 37 और कांग्रेस ने छह सीटें जीती थीं। दोनों दलों का संयुक्त आंकड़ा 43 सीटों का रहा, जबकि भाजपा 33 पर सिमट गई। सपा का वोट शेयर 33.59 प्रतिशत और कांग्रेस का 9.46 प्रतिशत रहा।
यही प्रदर्शन कांग्रेस को अब विधानसभा चुनाव में पहले से ज्यादा सीटों पर दावा करने का राजनीतिक आधार दे रहा है।
कांग्रेस अब ‘छोटे भाई’ की भूमिका में नहीं
राजेंद्र पाल गौतम के बयान की सबसे महत्वपूर्ण बात सीटों की संख्या नहीं, बल्कि उसमें छिपा राजनीतिक संदेश है। कांग्रेस यह संकेत दे रही है कि गठबंधन में उसे केवल सपा के साथ चलने वाली कनिष्ठ सहयोगी की भूमिका स्वीकार नहीं है।
गौतम पहले ही विधानसभा की करीब आधी सीटों पर कांग्रेस की दावेदारी का संकेत दे चुके हैं। उन्होंने ‘दो भाइयों’ के बीच बराबर हिस्सेदारी की बात कही थी और कांग्रेस को 170 सीटों का दावेदार बताया था।
अब उनका यह कहना कि कांग्रेस के सम्मान के बिना अखिलेश मुख्यमंत्री नहीं बन सकते, दरअसल **सीट बंटवारे को मुख्यमंत्री पद से जोड़कर दबाव बनाने की रणनीति** भी माना जा सकता है।
कांग्रेस का संदेश साफ है—अगर अखिलेश को विपक्षी गठबंधन का चेहरा बनना है तो कांग्रेस को भी उसकी राजनीतिक कीमत और सम्मान देना होगा।
सपा के लिए सबसे बड़ी परेशानी क्या है?
सपा के सामने दुविधा यह है कि 2024 की सफलता का सबसे बड़ा श्रेय उसके अपने प्रदर्शन को जाता है। 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा ने 111 सीटें और 32.06 प्रतिशत वोट हासिल किए थे, जबकि कांग्रेस सिर्फ दो सीटों और 2.33 प्रतिशत वोट पर सिमट गई थी।
इसलिए सपा के लिए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन के आधार पर बहुत बड़ी हिस्सेदारी देना आसान नहीं होगा।
सपा यह तर्क दे सकती है कि विधानसभा का चुनाव लोकसभा से अलग होता है, यहां बूथ स्तर पर संगठन, स्थानीय उम्मीदवार और क्षेत्रीय समीकरण अधिक महत्वपूर्ण होते हैं।
यहीं से सीटों की बातचीत कठिन हो सकती है।
कांग्रेस की रणनीति सिर्फ सीटें हासिल करना नहीं
कांग्रेस का दूसरा बड़ा कदम संगठन को मजबूत करना है। गौतम ने कहा है कि जिला कमेटियों से लेकर प्रदेश और बूथ स्तर तक संगठन खड़ा किया जाएगा।
इसका अर्थ यह है कि कांग्रेस गठबंधन की बातचीत के साथ-साथ 403 विधानसभा क्षेत्रों में अपनी स्वतंत्र राजनीतिक क्षमता भी तैयार करना चाहती है।
यह सपा के लिए महत्वपूर्ण संकेत है। अगर कांग्रेस पहले से संगठन तैयार करती है और संभावित उम्मीदवारों की पहचान करती है तो सीट बंटवारे के समय उसके पास केवल राजनीतिक दावे नहीं, बल्कि संभावित उम्मीदवारों और संगठन का आधार भी होगा।
यानी कांग्रेस का लक्ष्य केवल सपा से ज्यादा सीटें लेना नहीं, बल्कि भविष्य में उत्तर प्रदेश में स्वतंत्र राजनीतिक ताकत बनना भी हो सकता है।
मायावती का नाम क्यों महत्वपूर्ण है?
राजेंद्र पाल गौतम का मायावती को गठबंधन में आने का खुला निमंत्रण इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है।
2024 में बसपा कोई लोकसभा सीट नहीं जीत सकी, लेकिन उसे उत्तर प्रदेश में 9.39 प्रतिशत वोट मिले थे। यह वोट प्रतिशत बताता है कि बसपा का सामाजिक आधार पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।
अगर मायावती विपक्षी गठबंधन का हिस्सा बनती हैं तो सपा-कांग्रेस गठबंधन का सामाजिक आधार व्यापक हो सकता है। लेकिन इसके साथ ही सीटों और नेतृत्व का सवाल और जटिल हो जाएगा।
सपा के लिए यह इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि उसका मौजूदा पीडीए मॉडल पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक मतदाताओं को साथ लाने पर केंद्रित है। बसपा के आने पर दलित राजनीति में हिस्सेदारी का सवाल सीधे गठबंधन के भीतर उठेगा।
दूसरी ओर कांग्रेस के लिए मायावती का साथ आना राजनीतिक रूप से दोहरा लाभ हो सकता है—एक तरफ भाजपा के खिलाफ विपक्षी वोटों का बिखराव कम होगा, दूसरी तरफ कांग्रेस सपा पर निर्भरता घटाने की स्थिति में आ सकती है।
लेकिन मायावती आएंगी तो क्या सपा मजबूत होगी या कमजोर?
यह सबसे बड़ा सवाल है।
अगर बसपा सपा-कांग्रेस के साथ आती है और उसका वोट बड़े पैमाने पर गठबंधन उम्मीदवारों को ट्रांसफर होता है तो विपक्षी गठबंधन का सामाजिक आधार निश्चित रूप से बढ़ेगा।
लेकिन उत्तर प्रदेश की राजनीति में वोट ट्रांसफर अपने आप नहीं होता। 2019 में सपा-बसपा गठबंधन इसका उदाहरण है। दोनों दल साथ आए, लेकिन दोनों के पारंपरिक वोटों का पूरी तरह एक-दूसरे में स्थानांतरण नहीं हो सका।
इसलिए 2027 में केवल दलों का गठबंधन पर्याप्त नहीं होगा। कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं के बीच तालमेल भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा।
भाजपा के लिए सबसे बड़ा फायदा कहां?
मौजूदा हालात में भाजपा के लिए सबसे अच्छी स्थिति यह होगी कि सपा और कांग्रेस सीटों के सवाल पर आमने-सामने आ जाएं।
2022 में भाजपा ने 255 सीटें और 41.29 प्रतिशत वोट हासिल किए थे, जबकि सपा 111 सीटों और 32.06 प्रतिशत वोट पर रही थी।
2024 में लोकसभा चुनाव का समीकरण बदल गया, लेकिन विधानसभा चुनाव में उस प्रदर्शन को दोहराना अपने आप तय नहीं है।
अगर सपा और कांग्रेस अलग-अलग चुनाव लड़ती हैं, तो कई सीटों पर मुस्लिम, दलित, पिछड़े और कांग्रेस समर्थक वोटों का विभाजन भाजपा को लाभ पहुंचा सकता है।
लेकिन यदि दोनों दल समय रहते सीटों पर समझौता करते हैं और कार्यकर्ताओं के स्तर पर वोट ट्रांसफर सुनिश्चित कर लेते हैं, तो 2024 का लोकसभा मॉडल विधानसभा चुनाव में भी भाजपा के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।
इस समय किसे फायदा?
राजनीतिक सौदेबाजी में फिलहाल कांग्रेस को फायदा दिखाई दे रहा है। उसने बातचीत शुरू होने से पहले ही अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है—सम्मानजनक सीट बंटवारा, संगठन का विस्तार और मुख्यमंत्री पद के सवाल में अपनी भूमिका।
सपा के लिए फायदा यह है कि विपक्षी गठबंधन का सबसे बड़ा घटक अभी भी वही है। 2024 में 37 लोकसभा सीटों की जीत और विधानसभा स्तर पर कांग्रेस से कहीं बड़ा संगठन अखिलेश यादव की सबसे बड़ी ताकत है।
लेकिन चुनावी फायदा अंततः उस पार्टी को होगा जो गठबंधन के भीतर अपने वोट को दूसरे दल के वोट से जोड़ पाएगी।
राजेंद्र पाल गौतम का बयान सपा-कांग्रेस गठबंधन में टूट का संकेत नहीं, बल्कि गठबंधन की नई शर्तों की शुरुआत ज्यादा लगता है।
2024 में कांग्रेस को सपा की जरूरत थी। 2027 में कांग्रेस का आकलन है कि सपा को भी कांग्रेस की जरूरत है। इसी बदले हुए आकलन ने कांग्रेस को अधिक सीटों और अधिक सम्मान की मांग करने का आत्मविश्वास दिया है।
अब असली परीक्षा अखिलेश यादव की है। उन्हें तय करना होगा कि कांग्रेस को कितनी राजनीतिक जगह दी जाए और किस सीमा तक। कांग्रेस के सामने भी चुनौती कम नहीं है—जितनी बड़ी हिस्सेदारी वह मांग रही है, उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी उसे अपने संगठन और वोट को जमीन पर साबित करने की होगी।
और सबसे महत्वपूर्ण बात—अगर दोनों दल इस खींचतान को बातचीत से सुलझा लेते हैं तो भाजपा के सामने मजबूत विपक्ष खड़ा हो सकता है। लेकिन अगर सीटों और नेतृत्व का विवाद सार्वजनिक टकराव में बदलता है, तो उसका सबसे सीधा फायदा भाजपा को मिल सकता है।
यही कारण है कि आने वाले कुछ महीने उत्तर प्रदेश में सिर्फ सीट बंटवारे के नहीं, बल्कि सपा-कांग्रेस गठबंधन के भीतर वास्तविक शक्ति-संतुलन तय करने के महीने होंगे।




