नीरज सिसौदिया, बरेली
समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष श्यामलाल पाल का 15 जुलाई को फरीदपुर विधानसभा क्षेत्र का प्रस्तावित दौरा राजनीतिक गलियारों में सामान्य संगठनात्मक कार्यक्रम नहीं माना जा रहा है। पार्टी के भीतर इस कार्यक्रम को आगामी 2027 विधानसभा चुनाव के लिए उम्मीदवार चयन और संगठन की जमीनी ताकत परखने की बड़ी कवायद के रूप में देखा जा रहा है। यही कारण है कि सम्मेलन से पहले ही टिकट के प्रमुख दावेदारों ने अपनी-अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने की तैयारी तेज कर दी है।
सूत्रों के अनुसार, प्रदेश अध्यक्ष का फरीदपुर दौरा दरअसल समाजवादी पार्टी की उस नई रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत प्रदेश नेतृत्व विधानसभा चुनाव से काफी पहले प्रत्येक महत्वपूर्ण सीट का अलग-अलग मूल्यांकन कर रहा है। पार्टी पहले ही कई विधानसभा क्षेत्रों में आंतरिक सर्वे करा चुकी है। अब प्रदेश अध्यक्ष और अन्य वरिष्ठ नेताओं के दौरे के दौरान मिलने वाले फीडबैक को सर्वे रिपोर्ट के साथ मिलाकर अंतिम राजनीतिक रिपोर्ट तैयार की जा रही है।
पार्टी के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि इस बार केवल यह नहीं देखा जाएगा कि कौन नेता कितना बड़ा है, बल्कि यह भी परखा जाएगा कि किसकी जनता के बीच वास्तविक पकड़ है, कौन बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय रख सकता है और किस उम्मीदवार की जीत की संभावना सबसे अधिक है।
श्यामलाल पाल इन दिनों प्रदेश की अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित विधानसभा सीटों का लगातार दौरा कर रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसके पीछे समाजवादी पार्टी की स्पष्ट चुनावी रणनीति है। 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी और उसके सहयोगियों को दलित और पिछड़े वर्ग के वोटों का अपेक्षाकृत बेहतर समर्थन मिला था। इसके बाद पार्टी अब विधानसभा चुनाव में इस सामाजिक आधार को और मजबूत करना चाहती है। विशेष रूप से अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों पर मजबूत उम्मीदवार उतारकर भाजपा को सीधी चुनौती देने की तैयारी है।
फरीदपुर भी ऐसी ही सुरक्षित और महत्वपूर्ण सीटों में शामिल है, जहां सामाजिक समीकरण हमेशा चुनावी परिणामों को प्रभावित करते रहे हैं। यही वजह है कि प्रदेश अध्यक्ष का यह दौरा केवल कार्यकर्ता सम्मेलन नहीं बल्कि संगठनात्मक समीक्षा का महत्वपूर्ण चरण माना जा रहा है।
सिर्फ भाषण नहीं, बंद कमरे में होगी असली समीक्षा
सूत्र बताते हैं कि सम्मेलन के मंच से राजनीतिक संदेश देने के अलावा श्यामलाल पाल स्थानीय पदाधिकारियों, सेक्टर प्रभारियों, बूथ अध्यक्षों और वरिष्ठ नेताओं से अलग-अलग मुलाकात भी करेंगे। इन बैठकों में संगठन की सक्रियता, बूथ प्रबंधन, स्थानीय गुटबाजी, संभावित उम्मीदवारों की स्वीकार्यता और विपक्ष की स्थिति पर विस्तार से चर्चा होगी।
पार्टी नेतृत्व यह जानना चाहता है कि क्षेत्र में किस नेता की वास्तविक पकड़ है और कौन नेता केवल सोशल मीडिया या पोस्टर राजनीति तक सीमित है। पिछले कुछ वर्षों में पार्टी ने यह अनुभव किया है कि कई क्षेत्रों में संगठन की रिपोर्ट और जमीनी हकीकत में बड़ा अंतर रहा। इस बार प्रदेश नेतृत्व उसी गलती को दोहराना नहीं चाहता।
जल्द उम्मीदवार घोषित करने की तैयारी
समाजवादी पार्टी के भीतर लगातार यह चर्चा चल रही है कि इस बार कई विधानसभा सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा पहले की तुलना में काफी पहले कर दी जाएगी। पार्टी का मानना है कि समय रहते प्रत्याशी घोषित होने से उसे क्षेत्र में लगातार सक्रिय रहने, बूथ समितियों को मजबूत करने और मतदाताओं तक पहुंच बनाने का पर्याप्त समय मिलेगा।
सूत्रों का कहना है कि प्रदेश अध्यक्ष के दौरे के बाद जिन सीटों पर संगठनात्मक रिपोर्ट लगभग स्पष्ट होगी, वहां उम्मीदवारों के नाम पर तेजी से मंथन शुरू हो सकता है। हालांकि अंतिम फैसला राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की मंजूरी के बाद ही होगा।
फरीदपुर में टिकट के लिए बढ़ी हलचल
श्यामलाल पाल के दौरे ने फरीदपुर विधानसभा में टिकट की राजनीति को अचानक तेज कर दिया है। पार्टी के प्रमुख दावेदार सम्मेलन में अधिक से अधिक समर्थकों के साथ पहुंचने की तैयारी कर रहे हैं। इस समय पूर्व ब्लॉक प्रमुख चंद्रसेन सागर का नाम प्रमुख दावेदारों में लिया जा रहा है। भूतपूर्व विधायक डॉ. सियाराम सागर के छोटे भाई होने के साथ-साथ वह लंबे समय से क्षेत्र में सक्रिय हैं। उनके समर्थकों का दावा है कि दलित समाज ही नहीं सर्वसमाज के बीच उनकी मजबूत पकड़ है और संगठन के पुराने कार्यकर्ताओं का भी उन्हें समर्थन प्राप्त है।
दूसरी ओर लगातार तीन चुनाव हार चुके समाजवादी पार्टी के पूर्व प्रत्याशी विजयपाल सिंह भी अपनी दावेदारी मजबूत करने में जुटे हैं। सूत्र बताते हैं कि विजयपाल ने पार्टी संगठन के कुछ पदाधिकारियों को सेट किया हुआ ताकि प्रदेश अध्यक्ष के समक्ष माहौल अपने पक्ष में दिखाया जा सके क्योंकि लगातार तीन बार मिली चुनावी हार के बाद उनका जनाधार लगभग शून्य हो चुका है। इसलिए वह पार्टी पदाधिकारियों की सिफारिश के बूते एक बार फिर विधानसभा के मैदान में उतरना चाहते हैं। सम्मेलन में दोनों नेताओं के समर्थकों की संख्या पर राजनीतिक नजरें रहेंगी।
हालांकि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि इस बार केवल भीड़ के आधार पर टिकट नहीं मिलेगा। भीड़ एक संकेत जरूर होगी, लेकिन अंतिम निर्णय संगठन की रिपोर्ट, सर्वे, सामाजिक समीकरण और जीत की संभावना को ध्यान में रखकर लिया जाएगा।
क्या गुटबाजी खत्म कर पाएगा प्रदेश नेतृत्व?
बरेली जिले में समाजवादी पार्टी के भीतर समय-समय पर अलग-अलग गुटों की चर्चा होती रही है। ऐसे में प्रदेश अध्यक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठन को एकजुट रखने की भी होगी। सूत्रों के अनुसार प्रदेश नेतृत्व की कोशिश है कि टिकट घोषित होने से पहले ही सभी प्रमुख नेताओं को साथ लेकर चला जाए, ताकि चुनाव के समय किसी प्रकार की अंदरूनी नाराजगी सामने न आए। पिछले चुनावों में कई सीटों पर आंतरिक असंतोष का नुकसान पार्टी को उठाना पड़ा था। इस बार नेतृत्व पहले से सतर्क दिखाई दे रहा है।
पिछले चुनावों का संदेश भी अहम
फरीदपुर सीट पर पिछले विधानसभा चुनावों ने यह साबित किया है कि यहां केवल जातीय समीकरण जीत की गारंटी नहीं होते। स्थानीय सक्रियता, उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि और संगठन की मजबूती भी निर्णायक भूमिका निभाती है। इन चीजों की कमी की वजह से ही वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में फरीदपुर सीट से सपा उम्मीदवार विजयपाल सिंह को हार का सामना करना पड़ा था। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि समाजवादी पार्टी इस सीट पर समय रहते मजबूत उम्मीदवार घोषित कर देती है और संगठन को एकजुट रखने में सफल रहती है, तो मुकाबला काफी रोचक हो सकता है। यही कारण है कि प्रदेश नेतृत्व इस सीट को लेकर अतिरिक्त सावधानी बरत रहा है।
पीडीए के जरिए भाजपा को चुनौती की तैयारी
समाजवादी पार्टी का पूरा चुनावी अभियान इस समय पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) सामाजिक गठजोड़ को मजबूत करने पर केंद्रित है। पार्टी का मानना है कि यदि इस सामाजिक समीकरण को विधानसभा स्तर तक प्रभावी ढंग से संगठित किया गया तो भाजपा को कड़ी चुनौती दी जा सकती है। फरीदपुर जैसी अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटें इस रणनीति का अहम हिस्सा हैं। प्रदेश अध्यक्ष का दौरा इसी व्यापक चुनावी योजना की कड़ी माना जा रहा है।
टिकट के दावेदारों की बड़ी परीक्षा
पार्टी सूत्रों का कहना है कि 15 जुलाई का सम्मेलन केवल कार्यकर्ताओं का जमावड़ा नहीं होगा। यह उन नेताओं के लिए भी परीक्षा होगी जो टिकट की दौड़ में हैं। प्रदेश अध्यक्ष यह देखेंगे कि कौन नेता कितने कार्यकर्ताओं को सक्रिय कर सकता है, किसकी बात संगठन में सुनी जाती है और किसके पक्ष में स्वाभाविक माहौल दिखाई देता है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सम्मेलन खत्म होने के बाद भी असली राजनीतिक चर्चा मंच पर दिए गए भाषणों की नहीं, बल्कि बंद कमरे में हुई बैठकों और प्रदेश अध्यक्ष द्वारा जुटाए गए फीडबैक की होगी। यही रिपोर्ट आगे चलकर फरीदपुर से समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार के चयन की दिशा तय कर सकती है।
इस लिहाज से देखा जाए तो 15 जुलाई का फरीदपुर दौरा केवल एक सम्मेलन नहीं, बल्कि समाजवादी पार्टी के लिए 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारी का महत्वपूर्ण “टिकट टेस्ट” साबित होने जा रहा है।




