यूपी

चौकी छोड़ी, ट्रांसफार्मर छोड़ा और दूसरी तरफ का बाजार भी छोड़ा, फिर जीआरएम स्कूल की दीवार क्यों तोड़ी, अर्द्धवार्षिक परीक्षा से ठीक पहले 5000 बच्चों के भविष्य से क्यों किया गया खिलवाड़? कहीं मेयर उमेश गौतम के पारिवारिक विवाद और अहम की भेंट तो नहीं चढ़ गई स्कूल की बाउंड्रीवॉल और पुराने ‘समधिजी’ की प्रतिष्ठा? जानियेे क्या है पूरा मामला?

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नीरज सिसौदिया, बरेली

झुमका नगरी के सबसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में शामिल गुलाबराय मेमोरियल (जीआरएम) पब्लिक स्कूल की दीवार पर नगर निगम का बुलडोजर चलने के बाद अब यह मामला केवल सड़क चौड़ीकरण या सीएम ग्रिड परियोजना तक सीमित नहीं रह गया है। शहर में सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि आखिर पुलिस चौकी को छोड़ दिया गया, बिजली विभाग का ट्रांसफार्मर जस का तस खड़ा है, सड़क के दूसरी ओर मौजूद बाजार भी नहीं हटाया गया, लेकिन कार्रवाई केवल जीआरएम स्कूल की 65 साल पुरानी दीवार पर ही क्यों हुई? यदि उद्देश्य वास्तव में सड़क चौड़ीकरण था तो फिर कार्रवाई एकतरफा क्यों दिखाई दी?

जीआरएम स्कूल की बाउंड्रीवॉल से भी आगे सड़क की ओर लगा ट्रांसफार्मर जिसे शिफ्ट किए बिना सड़क का चौड़ीकरण संभव नहीं है।

यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि स्कूल खुलने के बाद अभी एक महीने का समय भी पूरा नहीं हुआ है और अर्द्धवार्षिक परीक्षाओं की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। ऐसे समय में स्कूल परिसर की सुरक्षा व्यवस्था प्रभावित होने और परिसर में निर्माण कार्य शुरू होने से लगभग पांच हजार विद्यार्थियों की पढ़ाई पर सीधा असर पड़ा है। कुछ अभिभावकों का कहना है कि स्कूल प्रबंधन की ओर से परिस्थितियों को देखते हुए कुछ दिनों के लिए विद्यालय का संचालन प्रभावित करना पड़ा, जिससे छात्रों की पढ़ाई और परीक्षा की तैयारी पर प्रतिकूल असर पड़ा है।

जीआरएम स्कूल के पास सड़क किनारे बनी पुलिस चौकी जिसे तोड़े बिना सड़क चौड़ीकरण नहीं हो सकता।

नगर निगम का तर्क है कि यह कार्रवाई सीएम ग्रिड परियोजना और सड़क चौड़ीकरण और सौंदर्यीकरण के तहत की गई है, लेकिन शहर में चर्चा का विषय कुछ और ही है। नगर निगम के कई मौजूदा पार्षद, जिन्होंने नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर बातचीत की, दावा करते हैं कि यह कार्रवाई केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि राजनीतिक और व्यक्तिगत कारणों से प्रेरित है।
इन पार्षदों का कहना है कि जिस दीवार को तोड़ा गया, उसकी ईंटों पर वर्ष 1960 अंकित है। यानी यह दीवार करीब 65 वर्ष पुरानी है।

जीआरएम स्कूल की बाउंड्रीवॉल की 1960 की बनी ईंट।

उनका कहना है कि यदि वास्तव में यह अतिक्रमण था तो नगर निगम ने छह दशक तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं की जबकि पिछले लगभग आठ साल से खुद उमेश गौतम ही मेयर हैं? और यदि सड़क चौड़ीकरण की आवश्यकता पहले से थी तो गर्मी की छुट्टियों के दौरान, जब स्कूल बंद था, तब यह कार्रवाई क्यों नहीं की गई? उस समय कार्रवाई होती तो हजारों छात्रों की पढ़ाई प्रभावित नहीं होती।
नगर निगम के कुछ पार्षद दावा करते हैं कि जीआरएम स्कूल के संचालक राजेश जौली सरकारी परियोजना में सहयोग देने के लिए तैयार थे। उनका कहना है कि प्रबंधन ने कभी सड़क चौड़ीकरण का विरोध नहीं किया। विवाद इस बात को लेकर पैदा हुआ कि उन्हें अतिक्रमण की वास्तविक स्थिति स्पष्ट नहीं बताई गई। कभी कहा गया कि पांच फुट भूमि पर अतिक्रमण है तो कभी दस फुट बताया गया लेकिन लिखित में कभी स्पष्ट ही नहीं किया गया। पार्षदों का आरोप है कि स्कूल प्रबंधन को दिए गए नोटिस में भी स्पष्ट रूप से यह नहीं बताया गया कि कितनी भूमि पर कथित अतिक्रमण है और उसका आधार क्या है।
इसी बीच एक और चर्चा शहर की राजनीति में तेजी से फैल रही है। मेयर उमेश गौतम के एक करीबी माने जाने वाले पार्षद का दावा है कि जीआरएम स्कूल के संचालक राजेश जौली और मेयर उमेश गौतम के बीच लगभग डेढ़ साल पुराना पारिवारिक विवाद चल रहा है। बताया जाता है कि दोनों कभी समधी थे, लेकिन बाद में उनके बच्चों के बीच रिश्तों में खटास आ गई और दोनों अलग हो गए। आरोप है कि यही व्यक्तिगत विवाद अब प्रशासनिक कार्रवाई के रूप में सामने आया है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इन्हीं चर्चाओं ने सबसे अधिक जोर पकड़ रखा है। पार्षद का कहना है कि यदि नगर निगम वास्तव में निष्पक्ष कार्रवाई करता तो समान रूप से अतिक्रमण हटाया जाता। केवल स्कूल की दीवार तोड़ देने से सड़क चौड़ीकरण का उद्देश्य कैसे पूरा होगा, यह सवाल अब आम नागरिक भी उठा रहे हैं।
सबसे गंभीर पहलू यह है कि इस कार्रवाई का असर सीधे बच्चों पर पड़ा है। करीब पांच हजार विद्यार्थियों वाले इस विद्यालय में अर्द्धवार्षिक परीक्षाओं की तैयारियां चल रही थीं। ऐसे समय में परिसर की दीवार टूटने, सुरक्षा व्यवस्था प्रभावित होने के कारण विद्यालय का सामान्य संचालन बाधित हुआ। अभिभावकों का कहना है कि यदि कार्रवाई कुछ सप्ताह पहले या गर्मी की छुट्टियों में होती तो बच्चों को इस परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता।

नगर निगम द्वारा तोड़ा गया जीआरएम पब्लिक स्कूल का गेट।

शहर के कई शिक्षाविद भी मानते हैं कि विकास कार्य आवश्यक हैं, लेकिन उनके क्रियान्वयन का समय और तरीका भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। यदि किसी सरकारी परियोजना के कारण हजारों विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित होती है तो प्रशासन को वैकल्पिक व्यवस्था और उपयुक्त समय का चयन करना चाहिए।
नगर निगम की कार्रवाई पर सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं क्योंकि जिस स्थान पर बुलडोजर चला, उसके आसपास कई अन्य स्थायी निर्माण भी मौजूद हैं। लोगों का कहना है कि पुलिस चौकी अपनी जगह पर बनी हुई है, बिजली विभाग का ट्रांसफार्मर भी नहीं हटाया गया और सड़क के दूसरी ओर स्थित बाजार पर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई। ऐसे में केवल एक दीवार को हटाने से सड़क चौड़ीकरण का दावा लोगों के गले नहीं उतर रहा।
इस पूरे विवाद का राजनीतिक पहलू भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। ऐसे समय में शहर के प्रभावशाली सामाजिक और व्यावसायिक वर्ग से जुड़े व्यक्ति के संस्थान पर हुई कार्रवाई को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं। राजेश जौली सवर्ण समाज में प्रभाव रखने वाले व्यक्ति माने जाते हैं और शहर के अनेक सामाजिक आयोजनों से जुड़े रहते हैं।
जिस परिसर की दीवार तोड़ी गई, उसी के अंदर हर वर्ष शहर का प्रसिद्ध होली मिलाप मेला और फ्लावर शो जैसे आयोजन होते रहे हैं जिनमें कभी खुद मेयर उमेश गौतम भी अतिथि के तौर पर शामिल होते रहे हैं। यह आयोजन केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इस मंच पर वर्षों से विभिन्न राजनीतिक दलों के वरिष्ठ नेता एक साथ दिखाई देते रहे हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं वर्तमान झारखंड के राज्यपाल संतोष गंगवार, वन राज्य मंत्री एवं शहर विधायक अरुण कुमार सक्सेना, कैंट विधायक संजीव अग्रवाल, पूर्व सांसद वीरपाल सिंह यादव सहित विभिन्न दलों के अनेक जनप्रतिनिधि इस आयोजन में शामिल होते रहे हैं। ऐसे में चुनाव से पहले इस कार्रवाई के राजनीतिक संदेश और उसके संभावित प्रभाव को लेकर भी चर्चाएं हो रही हैं।
नगर निगम की ओर से अभी तक यही कहा गया है कि कार्रवाई नियमानुसार और परियोजना के तहत की गई है। दूसरी ओर, नगर निगम के भीतर और शहर के राजनीतिक हलकों में इसे लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं कि यदि उद्देश्य केवल विकास कार्य था तो कार्रवाई समान रूप से क्यों नहीं हुई। क्या प्रशासन के पास ऐसा कोई सर्वे है जो यह साबित करता हो कि केवल जीआरएम स्कूल की दीवार हटाने से ही परियोजना पूरी हो जाएगी? यदि ऐसा है तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए ताकि लोगों के मन में उठ रहे संदेह दूर हो सकें।
यह भी उल्लेखनीय है कि प्रशासनिक कार्रवाई में पारदर्शिता उतनी ही आवश्यक होती है जितनी कानूनी वैधता। जब कार्रवाई एकतरफा दिखाई देती है तो स्वाभाविक रूप से उसके पीछे के कारणों को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो जाती हैं। जीआरएम स्कूल प्रकरण में भी फिलहाल यही स्थिति दिखाई दे रही है।
फिलहाल शहर में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वास्तव में यह कार्रवाई केवल सीएम ग्रिड परियोजना का हिस्सा थी या फिर इसके पीछे कोई और कारण भी था? क्या 65 वर्ष पुरानी दीवार वास्तव में अतिक्रमण थी या वह व्यक्तिगत विवादों की भेंट चढ़ गई? इन सवालों के स्पष्ट जवाब अभी सामने नहीं आए हैं।

बता दें कि उमेश गौतम पर पहले भी प्रतिष्ठा की जंग में नगर निगम के बुलडोजर के आरोप लगते रहे हैं। सबसे चर्चित मामला तो डॉक्टर अनुपमा राघव की दुकानें गिराने का रहा था। जिसमें हाईकोर्ट ने नगर निगम को दुकानें फिर से बनवाने का आदेश भी दिया था। इसके अलावा भी कुछ मामले समय-समय पर सामने आते रहे हैं।
इस संबंध में मेयर उमेश गौतम और जीआरएम स्कूल के संचालक राजेश जौली का पक्ष जानने का प्रयास किया गया, लेकिन खबर लिखे जाने तक दोनों से संपर्क नहीं हो सका। उनका पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।

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