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सपा के साथ गठबंधन की तैयारी कर रही सर्वजन आम पार्टी, फरीदपुर विधानसभा सीट से गठबंधन के उम्मीदवार हो सकते हैं एसएपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जयप्रकाश भास्कर, बरेली के पूर्व मंत्री और विधायक सहित कई सपाई दिग्गज तैयार कर रहे हैं एसपी और एसएपी के गठबंधन की जमीन, पढ़ें क्या है पूरा मामला?

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नीरज सिसौदिया, बरेली

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों के बीच छोटे राजनीतिक दलों की भूमिका और सामाजिक समीकरणों को लेकर चर्चाएं तेज होने लगी हैं। इसी क्रम में धोबी समाज की राजनीति को केंद्र में रखकर सक्रिय हुई सर्वजन आम पार्टी और समाजवादी पार्टी के बीच संभावित गठबंधन को लेकर सियासी अटकलें जोर पकड़ रही हैं। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि बरेली समाजवादी पार्टी के कुछ प्रभावशाली नेता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जयप्रकाश भास्कर को सपा के साथ लाने के प्रयास में जुटे हैं। बताया जा रहा है कि इनमें एक पूर्व मंत्री, एक मौजूदा विधायक और संगठन से जुड़े कुछ अन्य नेता शामिल हैं।
यदि यह गठबंधन आकार लेता है तो इसका असर केवल बरेली या रुहेलखंड की राजनीति तक सीमित रहने के बजाय प्रदेश के कुछ अन्य क्षेत्रों में भी दिखाई दे सकता है। इसकी वजह यह है कि सर्वजन आम पार्टी खुद को धोबी समाज की राजनीतिक आवाज के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रही है और पिछले करीब एक वर्ष में संगठन के विस्तार का दावा कर रही है। पार्टी का कहना है कि उसने उत्तर प्रदेश के 50 से अधिक जिलों में कमेटियां गठित कर ली हैं और 38 जिलों में संगठन सक्रिय रूप से विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटा है।
हालांकि, प्रदेश की राजनीति में किसी भी नए दल के प्रभाव का वास्तविक आकलन केवल संगठन के विस्तार से नहीं किया जा सकता। चुनावी सफलता के लिए बूथ स्तर का नेटवर्क, स्थानीय नेतृत्व, प्रत्याशी की स्वीकार्यता और गठबंधन की सामाजिक इंजीनियरिंग सबसे महत्वपूर्ण होगी। ऐसे में 2027 के चुनाव से पहले सर्वजन आम पार्टी का सपा के साथ संभावित गठबंधन एक दिलचस्प राजनीतिक प्रयोग हो सकता है।
सर्वजन आम पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जयप्रकाश भास्कर जल्द ही लखनऊ में एक बड़ा सम्मेलन आयोजित करने की तैयारी में हैं। इसमें प्रदेशभर के पार्टी कार्यकर्ताओं और सभी जिलों के जिलाध्यक्षों को बुलाए जाने की बात कही जा रही है। माना जा रहा है कि सम्मेलन में संगठन की मौजूदा स्थिति, आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों और संभावित गठबंधन पर चर्चा होगी।
भास्कर के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि पार्टी 2027 में अकेले मैदान में उतरेगी या किसी बड़े राजनीतिक दल के साथ मिलकर चुनाव लड़ेगी। उनके बयानों से फिलहाल संकेत मिलता है कि वह भाजपा को हराने के लिए विपक्षी वोटों के बिखराव को रोकने के पक्ष में हैं। उनका कहना है कि यदि समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन होता है तो वह उसके साथ चुनाव लड़ने को तैयार हैं। गठबंधन नहीं होने की स्थिति में पार्टी अपने दम पर चुनाव मैदान में उतरेगी।
यही बयान इस संभावित गठबंधन को लेकर राजनीतिक चर्चा का आधार बन रहा है। सपा के लिए भी किसी ऐसे दल को साथ जोड़ना रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है, जो किसी विशिष्ट सामाजिक समूह के बीच अपनी राजनीतिक पहचान बनाने का दावा कर रहा हो। हालांकि, गठबंधन की वास्तविक उपयोगिता इस बात पर निर्भर करेगी कि सर्वजन आम पार्टी अपने दावे के अनुसार कितने वोटों को चुनाव में एकजुट कर पाती है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय आंकड़ों को लेकर लंबे समय से राजनीतिक दलों की रणनीति बनती रही है। हालांकि, राज्य में जातिवार जनगणना के अभाव में धोबी समाज की मौजूदा सटीक आबादी का कोई आधिकारिक और अद्यतन आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। 2011 की जनगणना में अनुसूचित जातियों से संबंधित आंकड़ों में ‘धोबी’ को अलग जाति के रूप में दर्ज किया गया है, लेकिन उस आधार पर 2027 के लिए वर्तमान मतदाता संख्या का सीधा अनुमान लगाना उचित नहीं होगा। जनगणना के आधिकारिक आंकड़ों में उत्तर प्रदेश के लिए धोबी समुदाय को अलग श्रेणी में दर्ज किया गया है और जिला स्तर पर भी अनुसूचित जातियों की आबादी का विवरण उपलब्ध है।
यही वजह है कि राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों द्वारा धोबी समाज की आबादी को लेकर अलग-अलग अनुमान सामने आते रहे हैं। कुछ राजनीतिक दावों में इसे प्रदेश की आबादी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बताया जाता है, लेकिन इन दावों की स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि नहीं है। इसलिए चुनावी विश्लेषण में सटीक प्रतिशत बताने के बजाय इतना कहना अधिक सुरक्षित है कि धोबी समाज उत्तर प्रदेश की अनुसूचित जाति आबादी के भीतर एक अलग सामाजिक समूह है और कुछ विधानसभा क्षेत्रों में इसका स्थानीय प्रभाव महत्वपूर्ण हो सकता है।
यहां एक महत्वपूर्ण राजनीतिक पहलू यह भी है कि उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति का वोट एकसमान नहीं है। जाटव, पासी, कोरी, वाल्मीकि, धोबी और अन्य दलित समुदायों के अपने अलग सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरण हैं। ऐसे में किसी एक दल या संगठन का किसी एक समुदाय पर प्रभाव होने का दावा तभी चुनावी रूप से महत्वपूर्ण बनता है, जब वह प्रभाव मतदान के समय व्यापक रूप से दिखाई दे।
जयप्रकाश भास्कर ने आगामी विधानसभा चुनाव में बरेली जिले की फरीदपुर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की तैयारी शुरू कर दी है। उनका दावा है कि फरीदपुर विधानसभा क्षेत्र में धोबी समाज के करीब 34 हजार मतदाता हैं। इसी सामाजिक आधार को वह अपनी चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं।
हालांकि, इस संख्या की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध आधिकारिक चुनावी आंकड़ों से नहीं होती। निर्वाचन आयोग की मतदाता सूची में जातिवार मतदाताओं का अलग से आंकड़ा प्रकाशित नहीं किया जाता। इसलिए 34 हजार की संख्या को फिलहाल भास्कर का दावा मानकर ही देखा जाना चाहिए।
इसके बावजूद फरीदपुर का चुनावी समीकरण इस दावे को राजनीतिक रूप से दिलचस्प बनाता है। आरक्षित विधानसभा सीट होने के कारण यहां अनुसूचित जाति के मतदाता स्वाभाविक रूप से चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। ऐसे में यदि सर्वजन आम पार्टी अपने संगठन के माध्यम से धोबी समाज के मतदाताओं को एकजुट करने में सफल होती है तो वह चुनावी समीकरण को प्रभावित करने की स्थिति में आ सकती है।
लेकिन यहां सबसे बड़ी चुनौती भी यही है। किसी समुदाय की अनुमानित संख्या और उसका एकमुश्त मतदान व्यवहार दो अलग-अलग बातें हैं। समुदाय के भीतर भी पार्टी, उम्मीदवार, स्थानीय मुद्दे और नेतृत्व को लेकर मतभेद हो सकते हैं। इसलिए भास्कर के सामने अपने सामाजिक आधार को वास्तविक वोट में बदलने की चुनौती होगी।

सपा के लिए क्या हो सकता है फायदा?

समाजवादी पार्टी पिछले कुछ चुनावों में अपने पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण को मजबूत करने पर जोर देती रही है। ऐसे में धोबी समाज की राजनीति करने वाली किसी पार्टी के साथ गठबंधन सपा की इसी रणनीति के अनुरूप माना जा सकता है।
सर्वजन आम पार्टी यदि वास्तव में धोबी समाज के बीच अपना प्रभाव बढ़ाने में सफल होती है तो सपा को कुछ सीटों पर अतिरिक्त सामाजिक समर्थन मिल सकता है। खासकर उन सीटों पर जहां अनुसूचित जाति के भीतर विभिन्न समुदायों के वोट चुनाव परिणाम को प्रभावित करने की स्थिति में हैं।
लेकिन सपा के सामने एक दूसरा सवाल भी होगा—गठबंधन के बदले सर्वजन आम पार्टी को कितनी सीटें दी जाएंगी? यदि पार्टी केवल कुछ चुनिंदा सीटों पर प्रभावी है तो सपा उसे सीमित सीटों पर मैदान में उतार सकती है। दूसरी तरफ, यदि भास्कर अपने संगठन और सामाजिक आधार के बल पर अधिक सीटों की मांग करते हैं तो सीट बंटवारा बातचीत का सबसे कठिन मुद्दा बन सकता है।

गठबंधन हुआ तो सीटों पर बढ़ेगी खींचतान

संभावित गठबंधन में सबसे अहम सवाल सीटों का होगा। सर्वजन आम पार्टी के लिए यह पहला बड़ा विधानसभा चुनाव हो सकता है। ऐसे में उसे अपने संगठन की वास्तविक ताकत साबित करने के लिए पर्याप्त सीटें चाहिए होंगी। वहीं सपा के लिए चुनौती यह होगी कि वह अपने मौजूदा दावेदारों और संभावित सहयोगी दल के बीच संतुलन कैसे बनाए।
बरेली और रुहेलखंड क्षेत्र में यह समीकरण और जटिल हो सकता है। यदि भास्कर फरीदपुर से खुद चुनाव लड़ते हैं तो यह सीट स्वाभाविक रूप से गठबंधन की बातचीत में प्रमुख मुद्दा बन सकती है। सपा के स्थानीय नेताओं और संभावित दावेदारों के लिए सीट छोड़ना आसान नहीं होगा। ऐसे में गठबंधन की स्थिति में भी टिकट वितरण को लेकर स्थानीय स्तर पर असंतोष की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

क्या सर्वजन आम पार्टी सपा के लिए ‘वोट ट्रांसफर’ कर पाएगी?

किसी भी गठबंधन की सबसे बड़ी परीक्षा वोट ट्रांसफर होती है। दो दल कागज पर साथ आ सकते हैं, लेकिन उनके समर्थक मतदाता भी एक-दूसरे के उम्मीदवार को वोट देंगे, यह जरूरी नहीं है।
सर्वजन आम पार्टी के लिए 2027 का चुनाव इसी लिहाज से महत्वपूर्ण होगा। अगर पार्टी सपा के साथ गठबंधन करती है और उसके उम्मीदवार को धोबी समाज के साथ-साथ अन्य सामाजिक समूहों का भी समर्थन मिलता है, तो गठबंधन का प्रभाव बढ़ सकता है। लेकिन यदि उसका प्रभाव केवल सीमित क्षेत्रों या कुछ स्थानीय नेताओं तक रहता है तो सपा के लिए इसका चुनावी लाभ अपेक्षाकृत कम हो सकता है।
दूसरी ओर, अकेले चुनाव लड़ने की स्थिति में सर्वजन आम पार्टी को अपनी वास्तविक ताकत का अंदाजा भी हो सकता है। पार्टी के प्रदर्शन से यह स्पष्ट होगा कि उसका संगठन कितने वोटों को मतदान केंद्र तक ले जाने में सक्षम है।

2027 से पहले छोटे दलों की बढ़ेगी अहमियत

उत्तर प्रदेश की राजनीति में छोटे दल अक्सर बड़े चुनावी समीकरणों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। निषाद पार्टी, अपना दल और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी जैसे दलों के उदाहरण बताते हैं कि यदि कोई छोटा दल किसी खास सामाजिक समूह में प्रभावी आधार बना लेता है तो वह बड़े दलों के लिए गठबंधन का उपयोगी सहयोगी बन सकता है।
हालांकि, सर्वजन आम पार्टी की स्थिति इन दलों से अलग है। उसका संगठन अभी अपेक्षाकृत नया है और उसे पहली बार बड़े स्तर पर चुनावी परीक्षा से गुजरना होगा। इसलिए 2027 में उसकी भूमिका इस बात पर निर्भर करेगी कि वह संगठन विस्तार को वोट में कितना बदल पाती है।
फिलहाल जयप्रकाश भास्कर का लखनऊ सम्मेलन इस लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वहां यदि पार्टी औपचारिक रूप से सपा के साथ गठबंधन की दिशा में आगे बढ़ती है और संभावित सीटों को लेकर कोई संकेत देती है तो उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में इस नए समीकरण पर चर्चा और तेज हो सकती है।
कुल मिलाकर, सर्वजन आम पार्टी और समाजवादी पार्टी के बीच संभावित गठबंधन को केवल एक छोटे दल के बड़े दल के साथ जुड़ने के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसके पीछे सामाजिक प्रतिनिधित्व, अनुसूचित जातियों के भीतर राजनीतिक हिस्सेदारी, फरीदपुर जैसे आरक्षित क्षेत्रों का स्थानीय समीकरण और 2027 में विपक्षी वोटों को एकजुट करने की रणनीति भी जुड़ी हुई है। यदि भास्कर अपने संगठन को जमीनी वोट में बदलने में सफल होते हैं तो सपा के साथ उनका गठबंधन कुछ सीटों पर निर्णायक प्रभाव डाल सकता है। लेकिन यदि संगठन का विस्तार वोट में तब्दील नहीं होता, तो यह गठबंधन राजनीतिक रूप से उतना प्रभावी साबित नहीं होगा। इसलिए 2027 से पहले होने वाला लखनऊ सम्मेलन केवल एक संगठनात्मक बैठक नहीं, बल्कि सर्वजन आम पार्टी की भविष्य की चुनावी दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हो सकता है।

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